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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

चाबी वाला पत्थर और कस्तूरी की खुश्बू : गुजरात की ओर

ई महीनों से गुजरात यात्रा करने विचार था लेकिन कोई न कोई अवरोध यात्रा में उत्पन्न होने के कारण जाना नहीं हो पा रहा था। पिछले 14 दिसम्बर को मित्र नामदेव जी ने गुजरात जाने की बात कही और मैं सहर्ष तैयार हो गया। अभी नवम्बर में ही हमने एक लम्बी यात्रा की थी, तब भी जाने का मन बना लिया। 15 तारीख को टिकिट ली, गुजरात जाने वाली सभी गाड़ियाँ फ़ुल पैक थी। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस कांड के बाद हावड़ा रुट से आने वाली सभी गाड़ियाँ रास्ते में रोक दी जाती हैं। जिससे वे 8 से 10 घंटे विलम्ब से चला करती हैं। रेल्वे की वेब साईट में इनका चलने का सही समय  नहीं बताया जाता। जिसके कारण समस्या खड़ी हो जाती है। इसलिए हमने पुरी अहमदाबाद एक्सप्रेस से टिकिट ली। इस ट्रेन से जाने की सलाह एक जानकार मित्र ने दी। यही ट्रेन रायपुर से सही समय पर चलती है। स्लीपर में टिकिट लेने पर ईमरजेंसी कोटे से कन्फ़र्म होने की गारंटी रहती है। एक बार हमने एसी फ़र्स्ट की टिकिट लेकर स्लीपर में दिल्ली से रायपुर तक सफ़र किया और उसमें भी बैठने की जगह नहीं मिली। इसलिए तब से चेत गए और स्लीपर की टिकिट ही लेने लगे, क्योंकि स्लीपर की बोगियाँ अधिक होने के कारण टिकिट कन्फ़र्म होने की संभावना अधिक रहती है। 15 तारीख को पी एन आर ईमरजेंसी कोटे में लगाया और 16 को स्टेशन पहुंच गए। एक सीट कन्फ़र्म मिली, एक सीट का इंतजाम ट्रेन में ही कर लेगें, पता चला कि पुरी अहमदाबाद में रायपुर से सिर्फ़ एक ही बर्थ का कोटा है।

सुबह जल्दी उठकर अपना सामान लेकर रायपुर पहुंचें। बाईक अशोक भाई के यहाँ छोड़ी और महेन्द्र ने स्टेशन पहुंचाया। रायपुर से जब ट्रेन में चढे तो भारी भीड़ का सामना करना पड़ा। हावड़ा रुट की ट्रेन लेट होने के कारण रायपुर से अहमदाबाद की सभी सवारियाँ इसी ट्रेन में जाना पसंद करती हैं। रायपुर स्टेशन में अब काफ़ी बदलाव हो रहे हैं। नई बिल्डिंग के साथ 1 नम्बर प्लेटफ़ार्म पर मॉल बनाने का काम भी जारी है। ट्रेन चलने पर नाश्ता करने की याद आई, नामदेव जी को दुर्ग से बैठना था। हमने थोड़ा सा नास्ता किया और अपनी दैनिक टेबलेट लेकर दुर्ग स्टेशन का इंतजार करने लगे। दुर्ग स्टेशन में नामदेव जी पहुंचे, उन्हे बोगी एवं सीट नम्बर बता दिया था। हर सीट पर दो-दो एक्स्ट्रा सवारी थी। हमारी सीट का भी वही हाल था। नामदेव जी ने बैग से गर्मा गर्म रोटी और सब्जी निकाली और कहा कि फ़टाफ़ट खा लो ठंडी हो जाएगीं। अंटी जी ने आपके लिए सुबह का नाश्ता भेजा है। हमने कुछ रोटियाँ गर्मागरम सब्जी के साथ खाई। साथ ही सहयात्रियों की बात सुनते रहे। एक गुज्जु जोड़ा चढा दुर्ग से उसकी भी एक ही बर्थ थी। बीबी बैठ गयी सीट पर मियां खड़ा रहा। ट्रेन चलने पर वह भी उसी सीट पर समाहित हो गया।

की स्टोन याने चाबी वाला पत्थर
सुबह मैने जब मोबाईल देखा तो उसमें दो मेसेज थे, सुर्यकांत गुप्ता जी ने पाय लागी लिख रखी थी। उन्हे फ़ोन करने पर पता चला कि वे नागपुर में ही हैं। हमने उन्हे गुजरात जाने की सूचना दी तो उन्होने नागपुर ट्रेन पहुंचने का समय पूछा। फ़िर संध्या शर्मा जी का फ़ोन आया, उन्होने कहा कि खाने में क्या लेगें। नो फ़ार्मेलिटी, मैने कहा कि खाने में तो बहुत कुछ साथ ही बांध रखा है। वे जिद पर अड़ी रही तो मैने चावल खाने की इच्छा जाहिर की। सामने साईड लोवर बर्थ पर एक सज्जन दुर्ग से ही चढे थे। हाव भाव से मिलेट्री या पैरा मिलेट्री फ़ोर्स से संबंधित लग रहे थे। सहयात्रियों को उनका प्रवचन जारी था। नामदेव जी पेशे से इंजीनियर हैं। उनके साथ पहले के निर्माणों की चर्चा हो रही थी कि कैसे मेहराब पर चाबी वाला पत्थर लगाया जाता था जिससे चाबी वाले पत्थर के कारण मेहराब के वजन पर पुरी इमारत खड़ी रहती थी। नामदेव जी कहने लगे कि अभी के इंजीनियर्स को पता भी नही कीस्टोन (चाबी वाला पत्थर) क्या होता है। तभी वाणगंगा पर अंग्रेजों का बनाया पुराना पुल आ गया, जिसमें कीस्टोन लगा था। हमने पुल देख कर कैमरा क्लिक किया और कीस्टोन हमारे कब्जे में था।

सूर्यकांत गुप्ता जी
शनै शनै चलते हुए आस पास झोंपड़ पट्टियाँ नजर आने लगी, समझ गए कि नागपुर आने वाला है। रायपुर से आते समय नागपुर स्टेशन के पहले बाएं की तरफ़ एक बौद्ध विहार बना हुआ है। जिसमें बुद्ध की बहुत बड़ी प्रतिमा लगी है। यह दो निशानियाँ नागपुर पहुंचने की सूचना देती हैं। संध्या जी और सूर्यकांत गुप्ता जी का फ़ोन आ चुका था कि वे स्टेशन पर पहुंच चुके हैं। यहाँ ट्रेन के ठहराव मात्र 10  मिनट का है। इसलिए मैं पहले ही दरवाजे पर आ गया। ट्रेन रुकने पर दरवाजे उतरते ही सामने देखा तो संध्या जी सपति उपस्थित थीं। उनसे नमस्ते ही हुई थी इतनी देर में सूर्यकांत गुप्ता जी भी अपने साथी ठाकुर साहब के साथ पहुंच गए। उन्होने तुरंत एक पैकेट थमाया और कहा कि -"जुड़ के दवई हे, बिहनिया, मंझनिया अउ रतिया तीन खुराक लेबे।" मैने उन्हे धन्यवाद देकर पैकेट लिया। संध्या जी गर्मागरम पुलाव बना कर लाई थी। उनका पैकेट भी ग्रहण किया। शर्मा जी से मुलाकात अच्छी रही। कुछ बात कर पाते तब तक ट्रेन ने सीटी बजा दी। हमने मित्रों से विदा ली और सवार हो गए पुन: गाड़ी में। 2 बज रहे थे, चावल देखकर भूख लगने लगी। दो डिब्बों में गर्मागरम उम्दा पुलाव था, छोटा डिब्बा नामदेव जी ने संभाला और बड़ा डिब्बा हमने। फ़टाफ़ट सारा पुलाव चट कर गए। बड़ा ही लजीज खाना था। संध्या जी ने मीठे में सिर्फ़ दो ही लड्डू दिए थे। लगा कि खाने का बहुत ख्याल रखती हैं। उनका यह काम पसंद आया।

सहयात्री
भोजन करने के पश्चात कुछ देर आराम करने की इच्छा हुई। नामदेव जी सोना चाहते थे, साईड अपर बर्थ खाली थी। हम खैनी घिसते हुए बर्थ पर बैठे फ़ौजी नुमा व्यक्ति के पास पहुंच गए, वे खाली बैठे थे। हमने खैनी ऑफ़र की और चर्चा शुरु हो गयी। नामदेव जी उपर की बर्थ पर सो गए। हमारी बर्थ पर और लोग एडजेस्ट हो गए। फ़ौजी नुमा व्यक्ति हमारे गांव के पास के शर्मा जी निकले। उनके घर से लेकर पुरी रिश्तेदारी तक की चर्चा हो गयी। वे मेहसाणा के ओएनजीसी प्लांट में सीआईएसएफ़ के मुलाजिम सिक्योरिटी ऑफ़िसर हैं। अब उनसे चर्चा होते रही। ट्रेन आगे बढती रही। उन्होने बताया कि सारे भारत का भ्रमण किया है, कहीं भी 4 साल से अधिक नौकरी नहीं की। 4 साल बाद ट्रांसफ़र हो ही जाता है। अभी मेहसाणा में पदस्थ हैं छत्तीसगढिया परम्परानुसार उन्होने चावल की बोरी साथ बांध रखी थी क्योंकि छत्तीसगढ जैसे चावल और कहीं नहीं मिलते। हमें तो यहीं के चावल पसंद है, अगर दिन में एक बार चावल खाने नहीं मिला तो दिन खराब हो जाता है और दो बार मिल गया तो समझो पौ बारह। इसीलिए हमने संध्या जी से चावल खिलाने का आग्रह किया था। चावल के प्रति दीवानगी का यह आलम है कि एक बार श्रीमती जी ने चावल नहीं बनाए तो मैने होटल में जाकर खाए थे। अन्यथा अतृप्ति महसूस होते रहती, रात की नींद हराम हो जाती।

कस्तुरी का थोक चलित विक्रय केन्द्र
विनोद गुप्ता जी का फ़ोन आ गया, उन्होने बताया कि गेस्ट हाऊस बुक कर दिया है और सुबह 7 बजे स्टेशन पर गाड़ी लेने पहुंच जाएगी। आराम से स्नान ध्यान करना फ़िर मिलते हैं। गाड़ी का नम्बर और ड्रायवर का फ़ोन एसएमएस करता हूँ। लो जी अहमदाबाद में सारी व्यवस्था हो चुकी थी। अब रात को चैन की नींद लेकर सुबह अहमदाबाद पहुंच जाएगें। इधर शाम हो चुकी थी। हमने और महाराज ने एक-एक चाय ली और नामदेव जी को जगाया। वे मस्त नींद में थे, समय का सार्थक उपयोग सोना ही है। सफ़र में जब मन करे सो जाओ, सफ़र कट जाएगा। तभी एक औरत बच्चे को गोदी में लटकाए, बड़ा सा गांधी झोला टांगे कस्तूरी बेच रही थी। महाराज के पूछने पर उसने 300 रुपए जोड़े में बेचना बताया। महाराज से हमारी बात छत्तीसगढी में चल रही थी। महाराज ने मुझसे कहा कि सौ रुपए में मांग के देखते हैं अगर दे दे तो। मैने कहा कि 50 में भी मागोंगे तो दे देगी। उससे अधिक मत बोलना। महाराज ने 50 रुपए जोड़ी कहे तो वह आगे बढ गयी। फ़िर वापस आकर 50 रुपए जोड़ी में ही कस्तूरी दे दी। मैने उसके बैग को पहले ही टटोल कर देख लिया था। उसमें लगभग 200 से अधिक कस्तूरी होगी। इससे विश्वास हो गया था कि नकली है। 

येल्लो जी भुसावल आ गया
वह कस्तूरी देकर चली गयी तो महाराज ने उसे हथेली पर रगड़ कर देखा तो उस पर लगा काला रंग निकलने लगा। एक कस्तूरी सफ़ेद रंग की थी और एक काले रंग की। खुश्बू तो अच्छी आ रही थी। कस्तूरी वाली ने कस्तूरी की पहचान करने का तरीका दिखाया था कि उसे हाथ की मुट्ठी में बांध कर हथेली की उल्टी तरफ़ से कहीं भी रगड़ने से उस स्थान पर खुश्बू आ जाती है। महाराज संतुष्ट थे 50 रुपए में दो कस्तूरी खरीद कर। भोजन का समय होने पर अब हमने साथ ही खाना खाया, छत्तीसगढी में कहते हैं "मार सगा सगा ला, अउ काट सगा सगा ला।" महाराज की खपुर्री रोटी मेरे काम आई और मेरे गोभी के पराठे जबरदस्ती महाराज को टिका दिए। अब 4 तरह की सब्जी और आम के मीठे मुरब्बे के साथ 3 तरह का आचार 2 तरह के लड्डू और साथ में केले। शाही भोजन हो गया। लड्डू मैने नहीं खाए, पर भोजनोपरांत केले का स्वाद जरुर लिया। रात बढती जा रही थी। भुसावल पहुंचने के बाद सुबह का इंतजार था, जब चौधरी की चाय के साथ नींद खुले। क्रमश..........आगे पढें
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भूतों का बनाया मंदिर और गरम जलेबियाँ

प्रारंभ से पढें
सुबह स्नान ध्यान के पश्चात वृंदावन दर्शन करने का विचार था, ठंडे पानी से स्नान और सुबह की गुलाबी ठंड याद रहेगी। तपोभूमि में सुबह खिचड़ी का प्रात:राश था इसलिए हमने बाहर जाकर नाश्ता करने का विचार बनाया। सुबह-सुबह गर्म जलेबियाँ मिल जाए दूध या दही के साथ तो फ़िर क्या कहने। हम सड़क पर होटल तलाशने लगे जहाँ तई में कोई हलवाई गर्म जलेबियाँ तलता दिख जाए। थोड़ी देर की मेहनत के बाद एक जगह गर्म जलेबियाँ तलता हलवाई दिख ही गया। कहने लगा -"5 मिनट रुकिए बाबूजी, आपको गर्म गर्म बेड़ई के साथ गर्म जलेबियाँ खिलाता हूँ। हमने आधा किलो जलेबी का आर्डर दिया और उससे पाव भर दही का इंतजाम करने कहा। एक लड़का दही ले आया। दही भी उम्दा था, न खट्टा न मीठा, मन माफ़िक स्वाद पाया। मैने और गुरुजी ने डट कर नाश्ता किया। गरमा गरम जलेबियों ने तो क्षूधा शांत करने के साथ तन-मन को आनंद से भर दिया। मैने खुशी से हलवाई को 10 रुपए दिए तो मालिक मेरी तरफ़ देख रहा था। शायद सोच रहा कि हलवाई को भी टिप देकर बिगाड़ने वाले मिल गए।

वहीं से हम ऑटो रिक्शा से वृंदावन की ओर चल पड़े। तपोभूमि से ऑटो रिक्शा का किराया 10 रुपए प्रति सवारी है। वृंदावन पहुंच कर राधे-राधे की मधुर ध्वनि सुनाई दी। ऑटो वाले ने हमे नगर पालिका के पास उतार दिया। वृंदावन में गंदगी चारों ओर बिखरी पड़ी है। कहीं भी हगो मूतो। नगर पालिका का भवन ही सामने से चकाचक दिखाई दे रहा था। तिराहे से हम आगे बढे श्री रंगनाथ जी के मंदिर दर्शन करने के लिए। सड़क दोनो तरफ़ नास्ते के होटल और रहड़ियाँ लगी हैं, सड़क पर आकर होटल वाले ग्राहकों को आमंत्रित करते हैं। श्री रंगनाथ जी के मंदिए पहुंचे तो पुजारियों ने बताया कि अभी दर्शन नहीं होगें। हमने भी सोचा कि कोई बात नहीं। मंदिर का शिल्प ही देख लेगें। हमने मंदिर के गलियारों का एक चक्कर लगाया। काफ़ी पर्यटक यहाँ पहुंचे हुए थे। कुछ गुज्जु भाई बहन डांडिया कर रहे थे। एक गाईड उनके साथ था, वह उन्हे वृंदा राक्षसी के विषय में जानकारी दे रहा था, जिसके नाम पर वृंदावन है। उसे राक्षस जलंधर की पत्नी बताया।

सारे गुज्जु भाई गाईड का प्रवचन सुन रहे थे, हम भी थोड़ी देर खड़े हो गए उनके पास, मुफ़्त का ज्ञान लेने। इतिहास पर बोलते-बोलते गाईड दर्शन पर चले गया। कहने लगा कि दुनिया क्षण भंगुर है। क्या लेकर आए थे जो साथ ले जाओगे। माया-ममता तो ध्यान और प्रभु मिलन के रास्ते में बाधा है। सिर्फ़ एक चीज ही मनुष्य के साथ जाती है वह है उसका कर्म, जो दान करता है वह सुख पाता है। मैं समझ गया था कि पंडे गाईड का जाने का समय हो गया और अब इसे दक्षिणा चाहिए इसलिए वैराग दर्शन दे रहा है। गुज्जु भाई भी अर्ध श्रद्धापूर्वक ज्ञानरंजन कर रहे थे। कुछ माताएं राधे-राधे जप रही थी। बिहारी कहीं दिख नहीं रहे थे। राधे-राधे का संकीर्तन जारी था, जय श्री कृष्ण का उद्घोष गगन गुंजित कर रहा था। पिछले दरवाजे पर भक्त जन दर्शन के लिए कतार लगाए हुए थे। पंडे पुजारी भगवान एवं भक्त की राह का रोड़ा बने हुए थे।

 श्रीरंगनाथ मंदिर का गुंबद
हमने दिव्य चक्षुओं से दर्शन कर पुजारियों को 10-20 की दक्षिणा का झटका दे दिया। भगवान और भक्त के बीच में बाधा उत्पन्न करने वाले को तो दंड तो मिलना ही चाहिए। श्री रंगनाथ मंदिर का मुख्य भाग दक्षिण भारतीय मीनाक्षी मंदिर शैली में बना है। प्रवेश द्वार राजस्थान की जयपुरी शैली में निर्मित है। जोधपुर के लाल पत्थरों पर जालीदार नक्काशी का काम हुआ है। यह उत्तर भारत का सबसे विशाल मंदिर है। श्री रंगनाथ मंदिर में जन्माष्टी के दूसरे दिन नंदोत्सव की धूम रहती है। यहां सुप्रसिद्ध लट्ठामेले का आयोजन होता है। जब भगवान रथ पर विराजमान होकर पश्चिम द्वार पर आते हैं तो लट्ठे पर चढने वाले पहलवान भगवान को दंडवत कर विजय श्री का आशीर्वाद लेते हैं फ़िर लट्ठ पर चढना शुरु करते हैं।35 फ़िट ऊंचे लट्ठ पर जब पहलवान चढते हैं तो ग्वाल बाल उन पर तेल और पानी की बौछार करते हैं। घंटो की रस्साकसी के पश्चात कोई न कोई पहलवान तो विजय श्री प्राप्त कर लेता है। इस रोमांच को देखने के लिए देश विदेश से लोग आते हैं और लट्ठामेले का आनंद उठाते हैं।

मंदिर प्रांगण में
श्री रंगनाथमंदिर का निर्माण सेठ लक्ष्मीचंद ने अपने गुरु आचार्य रंगदेशिकस्वामी की प्रेरणा से कराया था और निर्माण कार्य सन् 1849में पूरा हुआ था।किवदंतीके अनुसार मंदिर का निर्माण पूरा होने और उसमें सामान्य पूजा दर्शन प्रारंभ होने के कुछ ही दिन बाद एक बालक तथा एक बालिका ने रात में स्वामीजीसे स्वप्न में कहा कि आपने सब कुछ तो किया परन्तु हमारे लिए लड्डुओं के भोग की व्यवस्था तो की ही नहीं। बालक-बालिका ने अपना परिचय देते हुए कहा कि हम गोदा रंगनाथ हैं। प्रात:जागने के बाद स्वामीजीने तुरंत बेसन के लड्डुओं की व्यवस्था कर दी जो आज भी चल रही है।

बाबा साहब (गुरुजी)
दक्षिण भारतीय शैली पर निर्मित वृंदावन का विशाल मंदिर है जिसके मुख्य द्वार का निर्माण राजस्थानी शैली पर आधारित है। मंदिर प्रांगण में लगभग 50फुट ऊंचा स्वर्ण गरूडस्तंभ है। इस मंदिर में पूजा सेवा पारंपरिक वेशभूषा में दक्षिणी ब्राह्मणोंद्वारा की जाती है। हम बेमौसम पहुंचे थे, इसलिए हम लट्ठामेले का आयोजन न देख सके। फ़िर कभी देखेगें। गुरुजी आज बाबा साहब के गेटअप में थे, सिर एक संविधान की हाथ में देने एवं उंगली आसमान की ओर उठाने पर मामला फ़िट हो जाता। गलियारे में खड़े होकर एक फ़ोटो गुरुजी की लेने के बाद हम गोविंद देव जी के मंदिर के दर्शन करने के लिए बढे।

श्री गोविंद देव मंदिर मथुरा
गोविंद देव जी का मंदिर भी जोधपुरी लाल पत्थरों द्वारा निर्मित है। इसकी भव्यता का अंदाजा दूर से ही हो जाता है। किवदन्ती है कि इसे 2100 साल पहले भूतों ने बनाया था। किसी के चक्की चलाने की आहट सुनकर भूत इसे अधुरा छोड़ कर भाग गए। तब से यह मंदिर अधुरा ही है, गाईड बताते हैं कि इस मंदिर की 4 मंजिलों को औरंगजेब ने ध्वस्त करवा दिया था और इसमें जड़े हीरे जवाहरात निकाल ले गया। बताया जाता है कि इस मंदिर में जब दीयों की रोशनी की जाती थी तो दिल्ली तक दिखाई देती थी। इसलिए औरंगजेब ने इसकी 4 मंजिलों को तुड़वाया। मंदिर के गर्भगृह में फ़ोटो लेने की मनाही है। यह मंदिर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सर्वेक्षण में है। इस मंदिर की असली प्रतिमा जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में स्थापित है, यहाँ पर उस मूर्ति की प्रतिकृति स्थापित है। जयपुर का गोविंद देव जी का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है।

गोविंद देव मंदिर का संरक्षण के पुर्व का चित्र - गुगल से साभार
गोविंद देव मंदिर से हम बांके बिहारी के दर्शन करने गए। यह मंदिर पुराने शहर के बीचों बीच स्थित है। मंदिर मार्ग भी संकीर्ण है। हमने नगरपालिका के पास से 20 रुपए में रिक्शा किया और बांके बिहारी मंदिर तक पंहुचे। वहां दर्शनार्थियों की भीड़ लगी थी। मंदिर प्रांगण में ही प्रवेश करना बड़ी मशक्कत का काम था। एक दिन पहले पंचकोशी परिक्रमा यात्रा थी, इसलिए श्रद्धालुओं की भीड़ अभी तक मौजुद थी। धक्के मुक्के खाकर हमने गर्भगृह में प्रवेशकर बांके बिहारी जी के दर्शन किए। मंदिर में पुष्पसज्जा देखते ही बनती थी। बांके बिहारी जी की पुष्पसज्जा अलौकिक लगी। अतिसुन्दर, नयनाभिराम। बांके बिहारी जी मंदिर से निकल कर हमने पुन: रिक्शा लिया।

बांके बिहारी मंदिर में दर्शनार्थियों  की भीड़
बस स्टैंड आ गए। क्योंकि समय कम था और आज हमें हरिद्वार के लिए जाना था। दो-तीन रातों की नींद ने घायल कर रखा था। इसलिए तपोभूमि पहुंचकर कुछ देर सोना चाहता था। हम तपोभूमि के लिए ऑटो से चल पड़े। ऑटो वाले ने 15 सवारी चढा ली, मतलब डेढ सौ रुपए का एक ट्रिप। उसने बताया कि खर्चा काट कर रोज 400-500 रुपए कमा लेता है। चर्चा करते हुए तपोभूमि पहुंच कर बिस्तर पर पड़ गया। जैसे ही झपकी आ रही थी वैसे ही आवाज आई - "पायलागी महाराज, सुत गेस का? आँख खोल कर देखा तो तेजराम ने मेरी नींद की वाट लगा दी, आशीर्वाद देने की बजाए उसे जोर से गाली देने की इच्छा हुई, पर क्या करता, खुश रहो, आनंद रहो की ही ध्वनि निकली। आगे चलेगें हरिद्वार की ओर……।
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गुरुवार, 23 जून 2011

बांधवगढ के किले तक पदयात्रा --- यात्रा - 3

हमें पेंड्रारोड़ के पड़ाव को छोड़ना था और जाना था  बांधवगढ की ओर। होटल पहुंच कर सामान उठाया चल पड़े मंजिल की ओर। वेंकट नगर से हमने मध्यप्रदेश में प्रवेश किया। अनूपपुर होते हुए शहडोल पहुंचे। रास्ते में चचाई पावर प्लांट के पास एक होटल में खाना खाया। उमरिया से बांधव गढ के लिए रास्ता है। 15 किलोमीटर की यह सड़क खराब है। रात को ढाई बजे हम ताला गांव याने बांधवगढ पहुंचे। यहां पहुंचने पर पता चला कि सभी रिजोर्ट और होटल फ़ुल चल रहे हैं। एक रिजोर्ट में गए तो उसने 2000 से कम कोई भी कमरा उपलब्ध नहीं है बताया। तब हमने उससे पूछा कि और किस जगह कमरा मिल सकता है। तो उसने नर्मदा लाज का पता बताया। हम नर्मदा लाज में पहुंचे वहां भी उसने 2000 और 1500 रुपए ही बताए। लेकिन मैने थोड़ा मोल भाव किया तो 800 रुपए में वह तैयार हो गया। ठंड इतनी अधिक थी कि पानी जम रहा था। इसलिए एसी रुम की जरुरत ही नहीं थी। अलबत्ता डबल कंबल के बिना ठंड नहीं रुकने वाली थी। इसलिए हमने और कम्बल लिए। 

बांधवगढ अभ्यारण्य का मेन गेट
बांधवगढ का किला वर्ष में एक बार कबीर दर्शन के नाम से खुलता है। इस दिन हजारों कबीर पंथी श्रद्धालु यहां दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। इस दिन यहां प्रवेश शुल्क की छूट रहती है। अन्य दिनों में 6 सवारियों के लिए 1200 रुपए की टिकिट और 2700 रुपए जिप्सी का चार्ज लगता है। किले तक नहीं ले जाया जाता। सिर्फ़ शेर दिखाया जाता है। हमें बताया गया कि किले तक की यात्रा पैदल करनी पड़ेगी। गाड़ी ले जाने की मनाही है। अभ्यारण होने के कारण उसके नियमों का पालन करना पड़ेगा। यहां के डायरेक्टर पाटिल ने सिर्फ़ एक ही गाड़ी ले जाने की अनुमति दी थी जिसमें दामाखेड़ा गद्दी के गुरु जी प्रकाश मुनि नाम साहेब जी ही जाएगें। हम 9 बजे करीब अभ्यारण के गेट पर पहुंचे तो वहां जाने वालों की कतार लगी हुई थी। सारी स्थिति को समझ कर हमने तय किया कि सबसे पहले पेट भर कर नास्ता किया जाए और पानी साथ में रख लिया जाए।

हमने डबल नास्ता किया और 4 बोतल पानी साथ में रख लिया। अनुमति पत्र तो मैं पहले ही बनवा चुका था। अभ्यारण में किले तक लगभग 6 किलो मीटर चलना पड़ता है फ़िर किले के लिए 4 किलोमीटर की पहाड़ी चढाई करनी पड़ती है। रास्ते में खाने पीने के लिए कुछ भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए बाहर से ही तैयार होकर जाना पड़ता है। हमने भी अंदर का हाल नहीं देखा था। फ़िर भी 10 बजे हमने पैदल यात्रा प्रारंभ की। जय कारा लगाया बोल बाबा की जय और चल पड़े। रास्ते में प्राकृतिक सौंदर्य का रस पान करते हुए आनंदित हो रहे थे। भक्तों का रेला छोटे बच्चों के साथ चल रहा था। किले के रास्ते को छोड़ कर अन्य रास्तों पर गार्ड लगे थे।

जहां शेर मौजुद था वहां हाथी खड़े कर रखे थे।हम भी गपशप करते चल रहे थे। किले में पहुंचते ही पहली चढाई पर पहाड़ में खोद कर बनाई हुई घुड़साल नजर आई। इसमें कई दरवाजे एक साथ हैं। मैने अंदाजा लगाया कि राजा लोग किले तक रथ या बैलगाड़ी से आते होगें। उसके बाद मैदान में बैलगाड़ी या रथ छोड़कर पहाड़ पर चढने लिए घोड़े का उपयोग करते होगें। इसलिए किले के प्रारंभ में ही घुड़साल बनाई गयी है। धीरे धीरे चढाई चढते रहे। सुमीत भी जोर आजमा रहा था। 103 किलो वजन होने के बाद भी उसकी हिम्मत काबिले तारीफ़ है। मैं शार्टकट के चक्कर में रास्ते को छोड़ कर सीधी चढाई चढ रहा था। एक बार सुमीत को भी चढाया लेकिन बाद में उसने हाथ खड़े कर दिए।

सुमीत दास, ललित शर्मा, शरद(गुड्डु) शेष शय्या के सामने
सबसे पहले शेषशय्या आती है। जहां 35 फ़ुट लम्बे पत्थर को तराश कर सात फ़नों वाले शेषनाग पर विष्णु भगवान लेटे हैं। विष्णु भगवान को समृद्धि और एश्वर्य का देवता माना जाता है। इस प्रतिमा को कलचुरी राजा युवराजदेव के मंत्री गोल्लक ने 10 वीं सदी ईसवीं में बनवाया था। यह मुर्ती बलुवा पत्थर से निर्मित है। मूर्ती के चरणों के पास से एक झरना झरना निकल रहा है इसे चरण गंगा का नाम दिया गया है। पुराणों में इसे वेत्रावली गंगा कहा गया है। चरण गंगा सदानीर जल स्रोत है यहां कई नाले आकर मिलते हैं यह बांधवगढ के वन्यजीवों के लिए जीवन धारा के समान है। चरणगंगा से ताला स्थित पर्यटक संकुल को एवं कई गावों को पानी मिलता है। इस कुंड में काई जमने से पानी हरा हो गया है।
 
यहां से सीधी चढाई शुरु हो जाती है। एक जगह पर मेरे हाथ के पास खुजली हुई। मैने मुड़ कर देखा तो एक पेड़ दिखाई दिया। जिसमें केंवाच की फ़ली लटकी हुई थी। उसे किसी ने हिला दिया था। उसके रेसे हवा में तैर रहे थे। मैं तो तुरंत ही भागा वहां से, कुछ लोग खड़े रहे  बाद में क्या हाल हुआ होगा उनका राम ही जाने। हम किले के मुख्य दरवाजे तक पहुंच गए। तो लगा कि अब पहुच ही गए। लेकिन यहां से दो किलोमीटर और चलना था कबीर तलैया तक। उबड़ खाबड़ रस्ते पर चलते हुए दुसरे दरवाजे तक पहुंचे तो वहां भग्न अवस्था में एक बजरंगबली का मंदिर दिखा। उसके बाद तीसरा दरवाजा आया वहां भी बजरंग बली का मंदिर था। 

इसके आगे चलने पर देखा की लोग एक पेड़ की पत्तियाँ तोड़ने में लगे हुए थे किसी ने इस पेड़ के विषय में कह दिया कि इसकी पत्तियाँ गठिया वात रोग के इलाज में काम आती है। बस फ़िर क्या था लोग लग गए तोड़ने। मैं उनकी फ़ोटो ले रहा था। तभी मुझे उस पेड़ में भी केंवाच की बेल दिखाई दी। लोगों को बताने के बाद भी नहीं माने। मेरे से  ही पूछ रहे थे कि केंवाच क्या होता है। भैया जब तक गोबर से नहीं नहा लेगें तब तक केंवाच ही केवांच रटते रहगें और खुजाते रहेगें। अब भीड़ को कौन समझाए। शायद वे लोग अभी तक खुजा रहे होगें और कह रहे होंगे की फ़ौजी की बात मान ही लेते तो यह दिन नहीं देखना पड़ता।
 
रास्ते में एक बड़ा पक्का तालाब मिला। इसका पानी भी निकासी नहीं होने के कारण हरा हो गया था। तभी मुझे उसमें तैरता हुआ एक मगरमच्छ दिखाई दिया। कैमरे को जूम करने के बाद भी उसकी फ़ोटो नहीं आई। तालाब बहुत बड़ा है। कहते हैं कि किले में 12 तालाब हैं जिसमें से 2 तो हमने देखे बाकी का पता नहीं। इन तालाबों में बारहों महीने पानी भरा रहता है। किले की इमारते तो उजड़ गयी है। लेकिन कुछ मंदिर अभी बचे हुए हैं। किंवदंती है कि रावण को मारने के बाद राम इस जंगल में से गुजरे थे तो उन्होने अपने भाई लक्ष्मण को भेंट करने के लिए इस किले का निर्माण कराया था। इसीलिए इसका नाम बांधवगढ पड़ा। 

घुड़साल में दो घोड़े
किंवदंती की बात छोड़ दें तो यह किला 552 एकड़ में फ़ैला है। समुद्र तल से 811 मीटर की उचाई पर स्थित है। इसका निर्माण तीसरी शताब्दी में हुआ था। तीसरी सदी से लेकर 20 वीं सदी तक वाकटक, कलचुरी, सोलंकी, कुरुवंशी और बघेल राजवंशों ने यहां से राज किया। सोलहवीं सदी में संत कबीर भी यहां कुछ वर्ष रहे थे। जब शेरशाह सूरी हूमायुं का पीछा कर रहा था तब किले में मुगल बादशाह हूमायुं की बेगम को भी शरण मिली थी। इसका अहसान चुकाते हुए हूमायुं के बेटे अकबर ने बांधवगढ के नाम से चांदी के सिक्के जारी किए थे। 1617 में बघेल अपने राज्य की राजधानी रींवा ले गए और उसके बाद इस किले को खाली कर दिया गया तब से इस पर वन्य जीवों का ही कब्जा है। शेर भी यहां घुमते रहते है।

आगे चलने पर हम कबीर तलैया पहुंचे। यहां पर लोग स्नान कर रहे थे। कोई मुंडन करवा रहा था। कोई इसका जल बोतल में भर कर ले जा रहा था जिससे वह इसका उपयोग गंगा जल की तरह पवित्री करण के लिए कर सके। कोई रास्ते में बैठकर भोजन कर रहा था। यहां पहुच कर तो मेला ही लगा हुआ था। हमें भी यहां पहुंच कर अहसास हुआ की कुछ भोजन सामग्री ले कर आना था। क्योंकि भूख लगने लगी थी और यहां कुछ मिलता नहीं है। दो आदमी एक जगह पर चूना पत्थर तोड़ रहे थे। उन्हे मैने भी देखा था तब गुड्डु ने बताया कि एक कह रहा था कि आधा आधा रख लेते हैं साल भर चंदन नहीं खरीदना पड़ेगा। सुनने वाले और हम हँस पड़े। कबीर दास जी ने जिस पाखंड का विरोध किया था। उसका अनुशरण करना छूटा नहीं है।

कबीर गुफ़ा पर श्रद्धालु
जिस स्थान पर कबीरदास जी निवास करते थे वहां एक गुफ़ा है। उस गुफ़ा में दर्शन करने वालों का तांता लगा हुआ था। उसके पास ही महंत लोग बैठे थे अपने-अपने जजमान को मुड़ने के लिए। एक गाड़ी में पानी लाया गया था उसके लिए लोग मारा मारी कर रहे थे। प्रशासन को यहां कम से कम पानी की व्यवस्था तो करनी ही चाहिए थी। हमारे साथ यात्रा पर एक बूढी माई भी थी, जिनकी उम्र 94 वर्ष थी वे झुकी कमर से पैदल चल कर यहां तक पहुंची थी। एक थानेदार ने उन्हे अपनी जिप्सी में बैठा लिया और खाने का पैकेट दिया। उसे आश्वस्त किया कि जब वे नीचे जाएंगे तो अपने साथ उसे गाड़ी में ले जाएगें। 

94 वर्षीय माई और थानेदार धुर्वे
आस्था बलवान होती है। उस आस्था के बल पर माई इतनी दूर पैदल चली आई।अब वापसी की तैयारी थी। सुमीत चित्त हो रहा था लेकिन वापिस तो जाना ही था। वापसी में कबीर तलैया की दुसरी तरफ़ धनी धर्मदास और आमीन माता का स्थान बना हुआ है। बताते हैं कि यहां पर कबीर दास जी उन्हे उपदेश दिया करते थे। यहां पर भी हम गए। श्रद्धालु इस स्थान पर नारियल और अगरबत्ती जला रहे थे। किले में मुझे बजरंगबली के कई मंदिरों के भग्नावेश दिखाई दिए। इससे महसूस हुआ कि तत्कालीन राजा हनुमान जी के बड़े भक्त रहे होगें। एक जगह पर हनुमान जी के मंदिर के सामने एक लोहे का गदानुमा सामान पड़ा था जिसे उठाकर लोग जोर आजमाईश कर रहे थे। मैने उठाया लेकिन उसका हत्था छोटा होने के कारण हाथ से फ़िसल जाता था। यहां पर राजाओं द्वारा बनाई गयी सैनिक छावनी के भी अवशेष दिखाई दिए। लेकिन राजा के रहने के महल इत्यादि का ठिकाना नहीं मिल सका। पूरे किले में घना जंगल खड़ा हुआ है। कहां से कौन जानवर निकल आए पता नहीं। इसलिए हमने मुख्य मार्ग छोड़कर अन्य कहीं तलाश करने का यत्न नही किया।

अचिंत दास
कबीर पंथ गुरु गद्दी दामाखेड़ा के गद्दीनशीन प्रकाश मुनि नाम साहेब के मुख्य कार्य सहयोगी अचिंत दास से सुबह बांधवगढ में मुलाकात हुई। इस आयोजन के लिए इन्होने बहुत मेहनत की। शासकीय अनुमति से लेकर श्रद्धालुओं के हाल चाल पुछने तक। अभ्यारण्य के डायरेक्टर पाटिल ने इन्हे सिर्फ़ एक ही वाहन किले तक ले जाने की अनुमति दी। ये मंत्री से लेकर संत्री तक फ़ोन लगाते रहे कि और वाहनों की अनुमति मिल जाए। लेकिन उन्हे प्रयास में सफ़लता नहीं मिली। हमारे रुम में ही सदा मुस्कुराने वाले इनके मनमोहक चेहरे का दीदार सुबह ही हो गया था। हमने साथ-साथ ही प्रातराश लिया और ये हमारे साथ अभ्यारण्य के मुख्यद्वार तक आए। अचिंत दास विगत 25 वर्षों से दामाखेड़ा गुरु गद्दी की सेवा में लगे हैं। साहेब बंदगी साहेब
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शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

जवान कांवडीया चल बसा रास्ते में---यात्रा--12

सुबह5 बजे उठकर स्नान किया और नास्ता करके 6 बजे सबने पूजा करके जल उठाया और रामपुर की ओर चल पड़े। मैं और दिनेश यात्रा में आगे ही चल रहे थे। तभी रामपुर में एक होटल से हमे किसी ने पुकारा, देखा तो देवी और नीनी महाराज एक तखत पर पड़े हैं। हमारे को देखते ही वे चढ बैठे, कहने लगे कि तुम लोगों ने हमें चुतिया बना दिया। हम लोग परेशान हो गए, रात को खाना नहीं मिला। यहां सुनसान में लूट-पाट का खतरा अलग से है। बस मत पूछो हमारी अच्छी धुनाई कर दी। नीनी महाराज को रात को बुखार चढ गया था और दवाई मेरे पास थी। मैने उन्हे मनाकर दवाईयाँ दी और उनके साथ चाय पी। अब हम लोग यात्रा के सबसे मुस्किल पड़ाव की ओर बढ रहे थे। रामपुर से नहर के उपर चलना था सड़क को छोड़कर।

रामपुर से नहर का रास्ता कुमरसार तक बहुत खराब है, नहर के उपर नुकीली रोड़ियाँ निकली हुई हैं और चिकनी मिट्टी के कारण फ़िसलन भी बहुत है। यह यात्रा का सबसे कठिन चरण है, इसे पार कर लिया तो और कोई बड़ी कठिनाई सामने नहीं आती, ऐसे लगता है कि हम देवघर पहुंच गए। रोड़ियों पर नंगे पैर नहीं रखे जा सकते। हमने चलते समय तय किया था कि कुमरसार पार करके नदी के किनारे सब मिलेंगे और वहीं पर साथ में भोजन करेंगे। दिनेश महाराज ने नहर पर अपनी चलने की गति बढा दी और मेरे से बहुत आगे निकल गए मैं भी अकेला उनके पीछे-पीछे चलता रहा, कुछ देर के बाद वे मेरी नजरों से ओझल हो गए। यह 9 किलो मीटर का रास्ता मैने 1 घंटा 20 मिनट में तय कर लिया और कुमरसार पहुच कर एक होटल में पीछे आने वालों का इंतजार करने लगा। दिनेश महाराज बिना रुके आगे निकल लिए।

जब ये सब पहुंचे तो इन्होने कहा कि नदी के उस पार रुकेंगे। मैं भी उठकर चल पड़ा, फ़िर रुका नहीं,नदी पार कर लिया। नदी में घुट्नों तक पानी था। कुछ लोग नदी के पार पर बैठ कर टोली में ग़ांजे की चिलम खींच रहे थे और हम आगे बढ रहे थे। विश्वकर्मा टोला पहुंच कर एक होटल में लेमन टी ली और आधा घंटा विश्राम करके आगे बढे, अब दिनेश महाराज का कहीं पता नहीं था और न डॉक्टर लोगों का। मैं अकेला ही बढा जा रहा था। विश्वकर्मा टोला से महादेव नगर और फ़िर चंदरनगर, चंदरनगर से जिलेबिया रोड़। मैं अकेले ही जिलेबिया रोड़ 12:30 को पहुंच चुका था। रास्ते में बहुत बढिया-बढिया होटल थे लेकिन इनका इंतजार करने के लिए किसी अच्छी जगह की तलाश में बस्ती पार कर रहा था, तभी सामने जा रहा एक कांवडीया बम चक्कर खा कर गिरा, लोग उस पर पानी छिड़कने लगे। लेकिन फ़िर वह उठा ही नहीं। उसके प्राण पखेरु वहीं उड़ गए थे। उनके दल को तलाश करने पर पता चला कि वह गोहाटी से आया था। जवान लड़का चल बसा था। 

मेरा मन खट्टा हो गया और वहीं एक होटल के तखत पर पड़ा हुआ इनका इंतजार करने लगा। लगभग 3 बजे जोर की मुसलाधार वर्षा होने लगी। मैने उसी समय खाना खाया। ये सभी लोग भी लोग भी भिगते हुए वहां पहुंचे, हम भी चल पड़े इनके साथ। हमारा रात्रि विश्राम 8 किलोमीटर दूर सुईया में था। आज हम लोग बहुत चल लिए थे। काफ़ी थक गए थे। जांघों की चमड़ी भी छिल गयी थी, चला नहीं जा रहा था। इस विषम परिस्थिति में भी हमने जिलेबिया पहाड़ पार किया। पुलिस वाले हमें जल्दी पहाड़ पार करने की सलाह दे रहे थे। क्योंकि शाम रात को लूट-पाट का खतरा बढ जाता है और फ़िर बिहार पुलिस कहां तक सुरक्षा दे सकती है। हम पहाड़ के बाद जंगल से होते हुए टगेश्वरनाथ पार करते हुए सुईया पहुंचे तब रात के 9 बज रहे थे। यहां डेरा ढुंढने लगे रुक कर, लेकिन शरीर में इतनी जान नहीं बची थी कि आगे चलकर कोई जगह रुकने लिए ढुंढ ली जाए। चलना कोई नहीं चाहता था। सब एक दूसरे को मुंह से आदेश देते थे लेकिन हाथ पैर किसी का काम नहीं कर रहा था। हमने एक बड़े से टैंट में लगे होटल में खाने और रुकने की व्यवस्था देखकर डेरा लगाने का विचार बनाया। वहां पर बढिया पंखे चल रहे थे तो लगा कि रात को आराम अच्छे से हो जाएगा। फ़िर पता चला कि वे रात को पंखे बंद कर देते हैं। ये पंखे तो 11 बजे तक ग्राहक फ़ंसाने के लिए चलाए जाते हैं। 40 रुपए प्रति तखत के हिसाब से सोने का किराया तय हुआ। देवी और नीनी महाराज नहीं पहुंचे थे। अब हम लोग पड़ते ही सो गए।
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शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

सुल्तान गंज से प्रस्थान और मच्छरों को रक्तदान यात्रा 11

सुबह 9 बजे हम सुल्तान गंज पहुंच चुके थे। रेल्वे स्टेशन के रिटायरिंग रुम में हमने स्नान किया, घर से लाए हुए सभी कपड़े, चप्पल-जूते दान कर दिए क्योंकि हम पद यात्रा में कम से कम बोझ ले जाना चाहते थे। सिर्फ़ एक जोड़ी भगवा कपड़े झोले में और एक जोड़ी पहने हुए, बस इतने में ही हम लोग अपना काम चलाते हैं। स्नानादि से निवृत होकर बाजार की तरफ़ चल पड़े, कुछ मित्रों को अपनी कावंड ठीक करानी ही, मुझे भी पिट्ठु बैग लेना था। सब सामान खरीद के हम गंगा जी की ओर चल पड़े। वहां पहुंच कर जल भरा और पूजा कराई और कांवड़ उठा कर मैदान में आ गए, यात्रा प्रारंभ करने के लिए। मैने पहली बार यात्रा पैदल करने का मन बनाया था, यात्रा प्रारंभ होने से पहले आशंकित था कि पैदल चल पाऊंगा कि नहीं, यात्रा बहुत लम्बी है, कहीं रास्ते में थक गया तो क्या होगा? साथी लोग तो छोड़ कर चले जाएंगे और मैं पीछे रह जाऊंगा। जब हमने कांवड़ की पूजा करके गंगा जल उठाया तो एक बज रहे थे।

मैने सोचा था कि जूते नहीं उतारुंगा, पैदल चलने के लिए मैंने पीटी शू ले रखे थे और सोचा था कि यात्रा में पैर में छाले न हो जाएं इसलिए पहन लुंगा। जब हम कांवड़ लेकर शहर की गलियों से पैदल निकले तो स्थानीय निवासियों वृद्ध, बाल, स्त्री सभी की नजर मेरे जुतों पर थी। क्योंकि इस यात्रा में लोग नंगे पैर ही जाते हैं, और मैने जुते पहन रखे थे। सभी की नजर मुझ पर ऐसे पड़ रही थी कि मुझे लगा कि कहीं मै कपड़े पहनना तो नहीं भूल गया। मेरे जुते सभी को नागवार गुजर रहे थे। मुझे लगा कि बहुत बड़ी गलती ही नहीं गलता हो गया। अब इसे कहीं पर सुधारना पड़ेगा। धूप बहुत ज्यादा थी, झुलसा दे रही थी। शुरुवात ही ऐसी हो चुकी थी। दो किलो मीटर चल कर डॉक्टर और साथी रुक गए थे।

कलकत्ता में मेरे पैर में चोट लग गयी थी। उसमें मवाद पड़ गया था, इसको लेकर मैं चिंतित था, कहीं गैंगरीन इत्यादि न हो जाए क्योंकि डायबिटिज के पेशेंट को पैरों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। मुझे उसमें दवाई लगाकर पट्टी भी करनी थी, इसलिए मैं भी रुक गया। देवी शंकर, नीनी महाराज, दिनेश मिश्रा इत्यादि बिना रुके ही निकल गए। मैं भी उठकर चलने लगा तो उमाशंकर भी साथ हो लिए। हम लोगों ने पहला पड़ाव मासूम गंज में किया, वहां पर पहले जाने वाले दल को हमने पकड़ लिया। अब जुते मुझे परेशान करने लगे थे, आसमान पर बादल हो गए थे इसलिए थोड़ी राहत मिल रही थी। मैने एक टैक्टर के पीछे चलते-चलते जुते उतार दिए, तब मुझे लगा कि एक बहुत बड़ी परेशानी से छुटकारा पा लिया। अब नंगे पैर चलने लगा तब लोगों की घूरती नजरों मे कुछ बदलाव हुआ।

जब हम मासूम गंज से चाय पीकर चले तो दिनेश महाराज और मैं सबसे आगे थे। हम लोग शाम होते तक तारापुर आ गए थे। दिनेश महाराज ने कहा कि रात को भी चलेंगे तो मैने कहा कि-बैटरी ले लेते हैं। हम लोग बैटरी लेने लगे और पानी भी लिया, तारापुर पार करके पुल के पास पहुंचे तो डॉक्टर ने आवाज दी पीछे से, दिनेश रुक गए और हम वहीं फ़ंस गए। देवी शंकर और नीनी भाई हमारे से पीछे थे वे धीरे-धीरे चल रहे थे। लेकिन जब हम बैटरी ले रहे थे तब वे हमारे से आगे निकल गए और हमें पता ही नहीं चला। ये सब बोले रात यहीं विश्राम करेंगे। मैने कहा कि देवी और नीनी कहां है उनका पता नहीं है, अभी हमको चलना चाहिए और रामपुर (32 किलो मीटर पर)में रुकना चाहिए। इनकी जिद के आगे हमें तारापुर में ही रात रुकनी पड़ी। रुकने के कारण चला नहीं जा रहा था और मैं लगातार देवी और नीनी को ढुंढता रहा। रात को खाना खाकर सो गए। मच्छर बहुत थे, ओडोमॉस लगाने के बाद भी खून चुसते रहे।
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बुधवार, 1 सितंबर 2010

अधजला आदमी-रेल सेवा और बेवकूफ़ से मुलाकात---यात्रा-10

ट्रेन लगभग 1 बजे आई। हम सब उसमें सवार हुए,रिजर्वेशन पहले से ही था। अपनी-अपनी सीटें संभाल ली। कुछ लोग सोने लगे तो मैं और देवी भैया हंसी मजाक करते हुए सफ़र का आनंद ले रहे थे, ट्रेन में सामान बेचने वालों का रेला लगा था, जो इलेक्ट्रानिक सामान बेच रहे थे। घड़ी, कैमरा, कैलकुलेटर, हवा भरने का पंप, और भी बहुत सारी उपकरण थे उनके पास। हम उनसे मोल भाव करके समय काट रहे थे। देवी भाई ने बहुत मोल भाव करके एक घड़ी 80 रुपए में खरीदी। उसके बाद दूसरा घड़ी बेचने वाला आया मैने उससे मोल भाव करके वही घड़ी 50 रुपए में खरीदी। क्योंकि हमारे किसी के पास घड़ी नहीं थी, इसलिए समय दर्शन के घड़ी लेना जरुरी था। देवी भैया 30 रुपए का नुकसान हमारे देखते देखते ही खा चुके थे।

तभी पुलिस वालों ने ट्रेन में यात्रियों के सामान की तलाशी शुरु कर दी। हमारे पास तो सिर्फ़ गांधी झोले ही थे। जिसमें एक जोड़ी भगवा कपड़ों के अलावा कुछ था ही नहीं। एक मारवाड़ी लड़का मेरे सामने बैठा था। उसे पकड़कर ले गए वो संडास की तरफ़, फ़िर मैने जाकर देखा तो उसका सामान खोल रखा था और उसकी पैंट उतार कर नंगा कर रखा था। वो रोए जा रहा था। कुछ देर बाद उसे छोड़ दिया उन लोगों ने। वह रोते हुए आकर मेरे सामने बैठ गया। मैने पूछा कि क्या हुआ? गांजा अफ़ीम ले जा रहा था क्या? उसने कहा कि मैने अपने पीने के लिए एक जिन का अद्धा रख लिया था। बस उसी के लिए मुझे मारा और 800 रुपए छीन लिए। लेकिन उसने अद्धा बचा लिया। मैने कहा ले बेटे मजे अब, मार अद्धा हजार रुपए का, साले जात भी दी और जगात भी दी। पैसे भी दिए और पैंट भी उतवाई। रोया-गाया अगल से मुफ़्त में। अगर ये अद्धा पहले ही चढा लेता तो सारे ही बच जाते। बेवकूफ़ कहीं का।

अब शाम को जब लैट्रिन जाने की बारी आई तो देखा डिब्बे में पानी ही नहीं था, सबकी हालत खराब थी। हमने टी टी आई से शिकायत की तो उसने कहा कि मैं पिछले स्टेशन में स्टेशन मास्टर को बोगी में पानी नहीं होने की शिकायत मेमो देकर कर चुका हूँ लेकिन अभी तक पानी नहीं भरा गया है। जब तक आप लोग किसी स्टेशन पर चैन नहीं खींचोगे तो पानी नहीं भरा जाएगा। अब आपको चैन खींचनी ही पड़ेगी। हमने न्यु बोंगाई गांव में 3 बार चैन खींची। स्टेशन के कर्मचारियों में हमे दिखाने के लिए बोगी में पानी के पाईप लगा दिए लेकिन उनमें पानी नहीं आ रहा था। आधा घंटा यहां ट्रेन खड़ी रही लेकिन पानी नहीं भरा जा सका। रेल्वे वालों ने कहा कि एल एन जे पी (न्यु जलपाई गुड़ी) में सूचना दे दी है वहां पानी भर दिया जाएगा। हम अब न्यु जलपाई गुड़ी का इंतजार करने लगे।

अब ट्रेन का हाल देखिए लग भग 24 बोगियां थी इस ट्रेन में जिसमें 10 बोगियों में पानी नहीं था। एक बोगी में हम 72 स्लीपर मानते हैं तो 720 व्यक्ति बिना पानी के सफ़र कर रहे थे। लेकिन कोई भी पानी के लिए शिकायत नहीं कर रहा था। सिर्फ़ हमारा 8 लोगों का ही दल पानी के लिए हंगामा मचाए हुए था। जब हम न्यु जलपाई गुड़ी पहुंचे तो वहां भी पानी नहीं भरा गया। रात के 12 बज रहे थे। बरसात भी हो रही थी। जैसे ही गाड़ी चलने लगी हमने हंगामा करने का मन बना लिया था। हमने चैन पुलिंग कर दी। पुलिस वाले आ गए बहुत सारे। हमने कहा कि जब तक गाड़ी में पानी नहीं डाला जाएगा तब तक गाड़ी नहीं चलेगी। चाहे कुछ भी हो जाए। अब हम पूरी तरह से लड़ने का मन बना चुके थे। लेकिन पूरी गाड़ी में से और कोई सवारी उतर कर पानी के लिए समर्थन देने के लिए नहीं आई, हम ही लड़ते रहे पुलिस वालों से।

पुलिस वाले कहने लगे कि गोहाटी से ही पानी भरवा लेना था। गाड़ी तेजपुर से आ रही थी। हमें पानी न होने की जानकारी तो गोहाटी के बाद लगी थी। सब मामला एक दुसरे पर डाल रहे थे। लेकिन पानी नहीं भर रहे थे। उधर पुलिस वाले ट्रेन ड्रायवर को गाड़ी आगे ले जाने को कह रहे थे, लेकिन हम चैन पकड़ कर लटके हुए थे। हम भी अपनी जिद पर अड़ आए थे। लगभग हमने 1 घंटा गाड़ी रोक दी, लेकिन उन्होने भी टंकी में पानी न होने का बहाना बनाए रखा और पानी नहीं भरा। टी टी आई भाग चुका था। तभी युएसए महाराज ने कहा कि यार हमें ही पानी की ज्यादा जरुरत है क्या? इतनी बोगियों में से एक भी उतर कर पानी की मांग करने नहीं आ रहा है और यहां जितनी देर ट्रेन को रोकोगे हम उतनी देर से सुल्तान गंज पहुंचेगें और हमारी यात्रा विलंब से प्रारंभ होगी। छोड़ो जाने दो, चलो सोते हैं। सुबह यात्रा भी प्रारंभ करनी है। अरे ज्यादा होगा तो 10-10 रुपए सुबह और खर्च होगा पानी की एक-एक बोतल और ले लेंगे।उसने बनिया बुद्धि लगाई। हमने भी समझ लिया कि अब कुछ होने वाला नहीं है। हम अपनी बोगी में वापस आ गए और ट्रेन चल पड़ी, पुलिस वालों की सांस में भी सांस आई और हम सो गए।

सुबह तक भी ट्रेन में पानी नहीं भरा गया, ऐसी व्यवस्था हमारे रेल मंत्रालय की है। ट्रेन में भी पानी आपुर्ती ठेकेदारों के भरोसे हो रही है। किसी ट्रेन में  पानी डाल रहे है किसी में नहीं और सवारियां नरक की यात्रा कर रहीं है एडवांस में दो महीना पहले टिकिट का पैसा देकर। सुबह हमने मिनरल वाटर की व्यवस्था की और नित्य क्रिया सम्पन्न की। जब मैं टायलेट में था तभी बाहर बहुत जोर से कोलाहल सुना। टी टी और किसी सवारी के बीच टिकिट को लेकर झगड़ा हो रहा था। टी टी ने कहा कि अगर तुम टिकिट नहीं दिखाओगे तो तुम्हे ट्रेन से बाहर फ़ेंक दुंगा। तभी दूसरी आवाज आई, तुम ट्रेन से बाहर क्या फ़ेंकोगे, मैं अभी तुम्हारा गला काट दुंगा। मैं समझ गया मामला गंभीर हो रहा है। इसलिए जल्दी टायलेट से बाहर निकला। देखा कि एक आदमी जिसका चेहरा आधा जला हुआ और कदकाठी अच्छी थी, टी टी को गरिया रहा था। जैसे ही उसने टी टी से फ़िर दोहराया कि तुम्हारा गला काट दुंगा तो टी टी चुपचाप अगली बोगी में बढ गया। वह आदमी बिना टिकिट ही डटा रहा और गाली बकता रहा।

दादी-----कहानी
कितना है मुस्किल घरों से निकलना Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

ब्रह्मपुत्र-उमानंद आश्रम-टीचर्स की याद-नवग्रह मंदिर-सुल्तान गंज की ओर---यात्रा-9

5-5 रुपए में स्पेसियों वाले ने ब्रह्मपुत्र के किनारे पहुंचा दिया। जहां बोट में होटल बने हुए हैं। ब्रह्मपुत्र में पानी बहुत ज्यादा था। नदी उफ़ान पर थी। किनारे पर बोट होटल बने थे। हमने नदी में फ़ेरा लगाने वाली बोट का पता किया तो पता चला बस थोड़ी ही देर में जाने वाली है जो उमानंद मंदिर का एक चक्कर लगाकर वापस आएगी। बादल घिर आए थे मौसम सुहाना हो गया था। हम बोट पर गए वहां किचन भी थी। अब मजा आ जाएगे, बोट पर नास्ता करने का आनंद लेगें, डेक पर टेबल और कुर्सियां लगी थी, और भी पर्यटक थे। 60-60 रुपए की टिकिट ली हमने और बोट पर सवार हो गए। बोट लगभग डेढ घंटे घुमाता है। बोट चल पड़ी और बरसात  होने लगी। शाम को बरसात में ब्रह्मपुत्र की बोट से सैर करना और गिरते हुए पानी का मजा लेना अद्भुत अनुभव रहा। हमने डेक पर बैठ कर चाउमीन का मजा लिया। बोट जब हवा के थपेड़ों से हिलती थी तो एक हाथ से चम्मच और प्लेट संभालनी पड़ती थी। 

बस हम एक आयटम मिस कर रहे थे। डॉ. दराल भाई साहब वाली टीचर्स को। हा हा हा निकले थे धार्मिक यात्रा में सावन के महीने में, नहीं तो बिना पूरा मजा लिए वापस नहीं आते,सोडा के साथ व्हाईट मिस्चीफ़ भी चल जाती या ट्रांजिट कैम्प में स्कॉच तो मिल ही जाती। लेकिन तौबा ऐसी चीजों का नाम लेना ठीक नहीं है, हमारे देवी भाई नाराज हो जाएंगे। उमानंद आश्रम में पानी भर चुका था इसलिए हम वहां उतर नहीं सके। दूर से ही दर्शन किए, बरसात बढने के कारण डर लग रहा था कहीं बोट ही न डूब जा जाए। जब बोट किनारे लगी तो देखा कि बोट में नीचे केबिन में लोग आराम से जुआ खेल रहे हैं। वाह पुलिस से बचने का तो बहुत ही मुफ़ीद साधन है।

ब्रह्मपुत्र के किनारे-किनारे यह गोहाटी का मुख्य बाजार है, गोहाटी आने वाले एक बार जरुर इस बाजार और सड़क पर आते हैं। हम पैदल-पैदल ट्रांजिट कैंप आए, भोजन किया और रेल्वे स्टेशन पहुंच गए। यहां रेल्वे स्टेशन पर पूरी सुरक्षा व्यवस्था है, फ़ोर्स के जवान सेंड बैग की आड़ में अपनी गन लेकर हमेशा तैनात रहते हैं। अंदर घुसने के लिए मैटल डिक्टेटर से गुजरना पड़ता है और क्लोज सर्किट कैमरा सब रिकार्ड करता रहता और डिस्पले भी करता है। सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही उम्दा किस्म की लगी। अब हम सब अपने लिहाफ़ में जाने को तैयार थे। रात हो चुकी थी, सोने के लिए रात का आमंत्रण था।
नवग्रह मंदिर-गोहाटी
दूसरे दिन सुबह नहा धोकर हम नवग्रह मंदिर दर्शन करने गए। निन्नी महाराज सुबह उठकर एक बार फ़िर कामाख्या दर्शन करने के लिए चले गए। नवग्रह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। इस पहाड़ी बहुत सारे घर बने हैं। बरसात जारी थी। पहाड़ी की पतली सड़क पर चढना बहुत कठिन हो रहा था। सांस फ़ुल रही थी। सीधी चढाई थी। नवग्रह मंदिर में बहुत सारे दिए जल रहे थे। जो अंदर के अंधकार को दूर करने की पूरजोर कोशिश कर रहे थे। अंधेरे से दियों की लड़ाई चल रही थी। लोग नौ ग्रहों की पूजा में व्यस्त थे। हमने भी पूजा की। प्रसाद लिया और वापस रेल्वे स्टेशन की ओर चल पड़े। 11 बजे सुल्तान गंज के लिए हमारी ब्रह्मपुत्रा मेल थी। इसलिए समय से रेल्वे स्टेशन पहुंचना जरुरी था। रेल्वे स्टेशन पहुंच कर रिटायरिंग रुम चेक आऊट किया और स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करने लगे।

रामबती जाग उठी
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?
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गुरुवार, 26 अगस्त 2010

बरसों का सपना - कामाख्या मंदिर--यात्रा--8

रसों का सपना पूरा होने जा रहा था। हमें कामाख्या मंदिर के दर्शन होने जा रहे थे। हमारे छत्तीसगढ़ में इसे कौरु नगर कहा जाता है और यहां तंत्र सीखने वाले जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां मंत्र-तंत्र से तांत्रिक आदमी को पशु पक्षी बनाकर अपने घर में रख लेते हैं। जब उससे काम लेना होता है तो उसे आदमी बना देते हैं, जब काम खत्म हो जाता है तो पुन: पशु पक्षी बना दिया जाता है। तंत्र का ज्ञान पूर्ण होने पर उसे आदमी बनाकर घर जाने दिया जाता है। मुझे कामाख्या आने से पहले हमारे गांव के कुछ लोगों ने इस विषय में जानकारी दी थी। मैने कहा था कि वहां जाकर ही देखेंगे।

कामाख्या मंदिर गोहाटी से 12 किलोमीटर पर स्थित है। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर को उग्र तंत्र पीठ माना जाता है। इसके विषय में कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। यहां प्रतिवर्ष ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीय चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रापाद के मध्य पृथ्वी ॠतुवती होने पर अम्बुवासी मेला भरता है यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंडित होने पर सती की योनी नीलांचल पहाड़ पर गिरी थी 51 शक्ति पीठों में कामाख्या महापीठ को सर्व श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यहां पर योनी की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भ गृह में फ़ोटो लेने की मनाही है एवं तीन दिन मंदिर में प्रवेश करने की भी मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है तथा विशेष पूजा के बाद भक्तों को दर्शन करने का मौका मिलता है।
इन चार दिनों के अंदर असम में कोई भी शुभकार्य नहीं होता, साधु एव विधवाएं अग्नि को नहीं छूते और आग में पका भोजन नहीं करते, पट खुलने के बाद श्रद्धालु मां पर चढाए गए लाल कपड़े के टुकड़े को पाकर धन्य हो जाते हैं। मान्यता यह भी है कि रतिपति कामदेव शिव की क्रोधाग्नि में यहीं पर भस्म हुए थे। कामदेव ने अपना पूर्व रुप भी यहीं पर प्राप्त किया था इसलिए इस क्षेत्र का नाम कामरुप भी पड़ा। कामाख्या मंदिर में दर्शन करने के बाद ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में उमानंद मंदिर जाना भी जरुरी समझा जाता है। इसका जीर्णोद्वार राजा नर नारायण ने करवाया था।

अहोम राजाओं ने मंदिर की पूजा के लिए कन्नौज एवं मिथिला से ब्राह्मणों को लाकर यहां बसाया था। आज वे असम की संस्कृति में इतने रच बस गए हैं कि उनके और असमियों में कोई अंतर प्रतीत नहीं होता.
कामाख्या मंदिर में दर्शनार्थियों के लिए  तीन प्रकार की टिकिट मिलती है। साधारण 150, वीआईपी 500, एवं वीवीआईपी 1000 की। हमने देखा कि लाईन छोटी है इसलिए 150 वाली टिकिट कटाई और लाईन में लग गए। जहां से हम लाईन में लगे थे उसके बगल में बलि गृह है, जहां भक्त अपनी श्रद्धानुसार बकरे और भैंसे की बलि देते हैं। मैने देखा कि वहां पर ताजा-ताज़ा बलि दी गयी थी। मक्खियां झूम रही थी। हमारी लाईन भी सरकती हुई गर्भ गृह तक पहुंच गयी। गर्भ गृह तल से लगभग 10 फ़िट नीचे है। जहां निरंतर पानी बहते रहता है।

जब हम गर्भ गृह के सामने स्थापित विग्रह के समीप पहुंचे तो एक घटना घट गयी। किसी जोर से ओSSSम ध्वनि का उच्चारण किया, मैने पलट कर देखा तो मेरे  मुझे एक नाटी सी लड़की दिखाई पड़ी। जिसने हाथ और गले में बहुत सारे गंडे डोरे बांध रखे थे। लोवर और टी शर्ट पहन रखी थी सिंदूर से मुंह लाल कर रखा था। उसके साथ में एक लम्बे बालों वाला लड़का था जिसने बालों में हेयर बेन्ड लगा रखा था। मैने डॉक्टर से कहा कि- “यह कोई नयी जादू सीखने वाली सीखाड़ी लगती है।“ तभी पंडे ने सुनकर कहा कि-“यह एकता कपूर है, महाभारत सीरियल की कामयाबी के लिए पूजा करने आई है।“ तो मैने डॉक्टर से कहा कि-“एकाध फ़ोटो ही खींचवा लेते हैं।“ तो डॉक्टर ने कहा कि-“इसके साथ क्या फ़ोटो खिंचवाना जिसने लोगों के घर बरबाद कर दिए।“ फ़िर मैं उससे सहमत होकर चुप हो गया।

हम गर्भ गृह में पहुंच चुके थे अंदर सिर्फ़ एक दीये का प्रकाश था, कुछ सूझ नहीं रहा था। काफ़ी अंधेरा था। पड़ों की लाईन लगी थी सब अपने अपने जजमान को पूजा करवा रहे थे। सबकी अलहदा दुकान सजी थी। हमने पूजा की और बाहर आ गए। कुछ देर मंदिर प्रांगण में बैठे, वहीं पार्श्व में बलि प्रकरण चल रहा था। भैंसे और बकरे काटे जा रहे थे। मुलायम सिंग की सरकार को बचाने के लिए समाजवादी पार्टी के एक विधायक समरीते ने 307 बकरे एवं 15 भैंसों की बलि दिलाई थी। सोचता हूँ कितना भयानक दृश्य रहा होगा। मंदिर पशुओं की कत्लगाह में बदल गया होगा और इतना मांस कौन खाएगा? चारों तरफ़ मक्खियां भिन-भिना रही थी। क्या कहा जा सकता है जब लोगों ने बलि  को धर्म और संस्कृति से जोड़ रखा है। तभी मंदिर की प्रसाद शाला खुली जहां मांस भात का प्रसाद मिल रहा था। लोग दौड़ पड़े लेने के लिए, हम बैठे देखते रहे।हमने मंदिए के ट्रस्ट में दान किया तो हमें लाल कपड़े का एक छोटा टुकड़ा दिया गया, जिसकी मान्यता कामख्या के प्रसाद के रुप में है, हमारे पहुंचने से चार दिन पहले ही अम्बुवासी मेला सम्पन्न हो चुका था। हमने प्रसाद को रख लिया और ट्रस्ट से दान की रसीद ली। वापस गोहाटी के लिए चल पड़े। 

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सोमवार, 23 अगस्त 2010

चल पड़े गोहाटी की ओर-----यात्रा 6

हम हावड़ा पहुंच चुके थे, हमारे साथी काली घाट जाना चाहते थे लेकिन मेरा मन नहीं था। काफ़ी थकान महसूस हो रही थी। शाम को 4/30 पर हमारी ट्रेन गोहाटी जाने लिए थी। मैने देवी भाई को बहुत मनाया कि रुक जाओ लेकिन वे भी नहीं रुके, ये सब काली घाट चले गए, मैं रेल्वे की कैंटीन में बैठ गया। सोचा कि एकाध नींद की झपकी ले ली जाए, बाहर मुसलाधार वर्षा हो रही थी। खाना खाने के काफ़ी देर बाद मित्र लोग 4 बजे हावड़ा पहुंचे हमने जल्दी से रुम चेक ऑउट किया और स्टेशन पर सरायघाट एक्सप्रेस पकड़ने के लिए पहुंच गए। अब हमें गोहाटी जाना था। ट्रेन आने पर हमने अपनी-अपनी सीट संभाली और चल पड़े गोहाटी की ओर।

इस रास्ते में सबसे पहले जाने पहचाने नाम का स्टेशन बोलपुर मिला, जिसको सोमनाथ चटर्जी के कारण जाना जाता है, यह बरसों से उनका संसदीय क्षेत्र रहा है। इस इलाके में चाय बगान भी है। यहां 36 गढ और उड़ीसा से बरसों पूर्व काम की तलाश में आने वाले लोग भी रहते हैं। उन्हे यहां के लोग आदिवासी कह के सम्बोधित करते हैं। लेकिन आदिवासियों की सूची में उनका नाम नहीं है। यहां के काफ़ी लोग मुझे दिल्ली में जार्ज फ़र्नांडीज के यहां मिले थे, मैं उनकी इस समस्या से वहीं पर रुबरु हुआ था। यहां के आदिवासियों के विषय में मैं पूर्व से ही जानता था।

अगले स्टेशन पर जब ट्रेन पहुंची तो यह भी जाना पहचाना लगा। एक समय में यह स्टेशन अखबारों की सूर्खियाँ बना रहता है, इसका नाम है कोकराझार। यह उल्फ़ा के हमलों के कारण हमेशा चर्चा में बना रहता था। अगले स्टेशन मालदा पहुंचते तक हमें जोर की भूख लग चुकी थी। घर का बना सूखा खाना भी खत्म हो चुका था, इसलिए बाहर के खाने की ओर रुख करना पड़ा। मालदा स्टेशन पर पहुंच कर खाना ढुंढा तो वहां मैदा की रोटियाँ बनी हुई थी और आलु का साग। चावल भी नहीं था। मजबूरी में मैदा की रोटी खानी पड़ी, बड़ी मुस्किल से दो रोटियाँ खाई, यहां रसगुल्ला सस्ता मिल रहा था। एक रुपए में एक रसगुल्ला। मैने पांच रसगुल्ले खाए मनाही होते हुए भी। भूख जो शांत करनी थी। बाकी साथियों ने भी रसगुल्ले खाए। न्यु जलपाई गुड़ी आने से पहले हम लोग खर्राटे भरने लगे।

उत्तर-पूर्व में सुबह जल्दी होती है, एटानगर से जब मेरे मित्र आचार्य तेजनारायण आर्य मुझे फ़ोन करते थे तो यहां सुबह का 4 बजे रहता था, हमारे यहां सुबह 5-6 बजे होती है जबकि अरुणाचल में सुबह 4 बजे ही हो जाती है। इस हिसाब से यहां 4/30 के आस पास दिन निकल आया था। हम जाग चुके थे। लेकिन कुछ कुम्भकर्ण अभी भी सोए हुए थे। मैने जाग कर प्रकृति का नजारा लिया। अद्भुत मनोरम दृश्य था। बरसाती सुबह थी, नदी नाले भरे हुए थे, चारों तरफ़ हरियाली थी, पहाड़ों पर बादल चक्कर काट रहे थे। सूरज कि किरणे चोटियों पर पड़ रही थी। कभी सूरज बादलों में छुप जाता था और छांया हो जाती थी। पहाड़ों की तराई में अंधेरा हो जाता था। खेतों में किसान पहुंच चुके थे। हल चल रहा था। हल में बैलों के साथ भैंसे की जुताई भी होती है। बहुत ही मनमोहक वातावरण था।

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शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

बेलूर मठ और कलकत्ता की बस-------यात्रा 5

दक्षिणेश्वर मंदिर हुगली गंगा के किनारे पर स्थित हैं यहां से बेलुर मठ के लिए नाव जाती है जो कि नदी के दूसरे किनारे पर स्थित है। हूगली नदी पानी से लबालब भरी हुई थी। बताते हैं इस नदी में शार्क मछलियां भी है जो यदा कदा मछुआरों के जाल में फ़ंस जाती है। इस नदी के बीच में पानी मे से रेत निकालने वाली मशीन भी लगी हैं जो रेत निकाल कर नाव में भरती है और यह रेत भवन निर्माताओं तक पहुंचती है। इस तरह नदी के पानी में से रेत निकालना मैने पहली बार देखा था। नाव वाले ने एक साथ 25 लोगों को नाव में सवार किया। इसका किराया प्रति व्यक्ति 10 रुपए था। हमारे साथ और भी अन्य लोग सवार हुए, कुछ लोगों ने सवार होने से पहले नाव को प्रणाम किया। मैं यह सब देख रहा था।

बरसात का मौसम होने के कारण नदी का पानी हिलोरें ले रहा था। नाव डगमगाती सी लगती थी। यहां नाव डूबने की घटनाएं होते रहते हैं। हमें तो तैरना आता है, लेकिन नदी के बहते पानी में तैरना और स्विमिंग पुल में तैरने में बहुत अंतर है। लेकिन मैने नदी में भी बहुत तैराई की है, इसलिए नदी में तैरने का भी अनुभव है। कुछ टूरिस्ट हमारे साथ नाव पर दार्जलिंग के भी मिल गए। उन्होने बताया कि दार्जलिंग में अभी तो छुट्टी चल रही हैं। वे सरकारी कर्मचारी है। दार्जलिंग में गोरखा आन्दोलन के चलते सभी दफ़्तर बंद हैं। कर्मचारी घर में बैठ कर आराम कर रहे हैं या पर्यटन के लिए निकल गए हैं। बोड़ो, गोरखा, नगा, कुकी, उल्फ़ा, सुल्फ़ा, इत्यादि आन्दोलनों ने इस सुंदर उत्तर-पूर्व के क्षेत्र के लोगों का जीना हराम कर दिया है। यह इलाका भी स्वर्ग से कम नही है। लेकिन उग्रवादी लोगों को स्वर्गवासी बनाने पर तूले हुए हैं। हमारी उनसे चर्चा होते रही। थोड़ी देर में नाव बेलुर मठ के पिछले दरवाजे के पास बने घाट पर लग चुकी थी, हम बेलुर मठ तक पहुंच चुके थे।

बेलूर मठ में एक बहुत सुंदर विशाल भवन है, जिसके चित्र यदा कदा देखने में आते हैं, यहां पर रामकृष्ण परम हंस की मूर्ती रखी हुई है। जिसके दर्शन निश्चित समय पर कराए जाते हैं। हम भी हाल में जाकर चुप चाप बैठ गए, कोई दो घंटे के बाद दर्शन हुए। लोगों ने आरती इत्यादि की। इसके बाद हम बेलुर मठ में घुमने निकले। एक जगह विवेकानंद विश्रांति स्थल हैं जहां पर उनका स्मारक बनाया हुआ है। इसे ओम मंदिर भी कहा जाता है। बेलुर मठ में दोपहर को भोजन मुफ़्त मिलता है, इसके लिए टोकन लेकर लाईन लगानी पड़ती है। हमारे पास इतना समय नहीं था कि टोकन लेकर भोजन के लिए लाईन लगायें। इसलिए हम बेलुर मठ से दर्शन करके बाहर निकल गए, और बस पकड़ने के लिए रोड़ तक पैदल चल कर पहुंचे।

बाबा धाम की यात्रा में हम अपने साथ कैमरे नहीं रखते क्योंकि रास्ते में कांवड़ियों के साथ लूट पाट हो जाती है। मैने सिर्फ़ मोबाईल रखा था सस्ता जिससे बात हो सके और लुट जाने पर कोई तकलीफ़ न हो। बाकी साथियों ने तो मोबाईल भी नहीं रखा था सब घर पर छोड़ आए थे। बात करनी होती थी तो एसटीडी पर कर लेते थे और उन्होने अपने घर मेरा मोबाईल नम्बर दे रखा था। इमरजेंसी में उनके घर के लोग मेरे मोबाईल पर फ़ोन कर सकते थे। इसलिए इस यात्रा के चित्र मेरे पास उपलब्ध नहीं है। जो भी चित्र हैं सब गुगल से साभार लिए गए हैं। अगर किसी को आपत्ति होती है तो हटा दिए जा सकते हैं।सड़क पर पहुंच कर हमने चाय पी, चाय का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि यह कुछ विशेष है, हमने 5-5 कप चाय पी थी। यहां 1 रुपए में चाय छोटे छोटे सकोरे में दी जाती है जिसमें सिर्फ़ एक घूंट चाय ही आती है। इसलिए हमें अपनी चाय की इच्छा शांत करने के लिए 5-5 सकोरे चाय पी । इसके बाद कलकत्ता की नगरीय बस सेवा का आनंद पहली बार लिया। इतनी खटारा बस में हम पहली बार बैठे होगें। इसकी बॉडी भी अंग्रेजों के जमाने की लकड़ियों की बनी हुई थी। टीन टप्पर लगा हुआ था, जो बाबूजी की पैंट फ़ाड़ने के लिए काफ़ी था। हिचकोले लेती हुई बस कलकत्ता शहर के बीचों बीच रही थी जमाने को चिढाते हुए। अरे दो चार रुपए किराया बढा दो लेकिन बसें तो अच्छी रखो। ऐसी सलाह हमने बस वालों को दी।

चित्र - गुगल से साभार
ललित शर्मा Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

जय काली कलकत्ते वाली-दक्षिणेश्वर धाम-- यात्रा 4

मैने देखा कि बंगाल के ग्रामीण अंचल में गरीबी अधिक है, लोग प्राकृतिक संसाधनों पर ही जीवन गुजर बसर कर रहे हैं। बंगाल की कम्युनिस्ट राजनीति ने इन्हे कहीं का नहीं छोड़ा। कम्युनिस्टों का कैडर इनकी जान के पीछे पिस्सुओं जैसे पड़ा रहता है। हर पल इनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता पर नजर रखी जाती है। अगर कोई धोखे से भी किसी दूसरी पार्टी की रैली या भाषण में खड़ा दिख गया तो उसकी शासकीय सुविधाएं जैसे पेंशन-राशन इत्यादि बंद कर दिया जाता है। इसलिए गरीब आदमी सुविधा खोने के डर से किसी दूसरी राजनैतिक पार्टी की ओर चाह कर भी नहीं देख पाता। जिसमें शासकीय सुविधाएं ठुकराने की हिम्मत है वही दूसरे राजनैतिक दलों की ओर जाता है। गरीबी कम्युनिस्टों के शासन की कलई खोलते हुए दिखाई देती है।
13 जुलाई को हम सुबह स्नान प्रात:राश आदि से निवृत्त होकर दक्षिणेश्वर के दर्शन के लिए चल पड़े। हमने हावड़ा स्टेशन से ही ट्रेन पकड़ ली, जिसने हमें दक्षिणेश्वर के करीब के स्टेशन पर पहुंचा दिया। स्टेशन का नाम भूल रहा हूँ, फ़िर इस स्टेशन से हम ओवर ब्रिज पर चढे और वहां से दक्षिणेश्वर के लिए ऑटो लिया। 40 रुपए में ऑटो वाले ने हमें वहां पहुंचा दिया। आज रविवार का दिन था। दक्षिणेश्वर में बहुत भीड़ थी। कलकत्ता आने वाला हर मुसाफ़िर दक्षिणेश्वर के मंदिर में दर्शन करने अवश्य जाता है। इस मंदिर का बहुत  बड़ा प्रांगण है। मंदिर के प्रवेश के लिए लम्बी लाईन लगी हुई थी। 
दक्षिणेश्वर के विषय में जानकारी है कि इसका निर्माण सन 1847 में प्रारंभ हुआ था। जान बाजार की महारानी रासमणि ने स्वप्न देखा था, जिसके अनुसार माँ काली ने उन्हें निर्देश दिया कि मंदिर का निर्माण किया जाए। इस भव्य मंदिर में माँ की मूर्ति श्रद्धापूर्वक स्थापित की गई। सन 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। यह मंदिर 25 एकड़ क्षेत्र में स्थित है।माँ काली का मंदिर विशाल इमारत के रूप में चबूतरे पर स्थित है। इसमें सीढि़यों के माध्यम से प्रवेश कर सकते हैं। दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर तीन मंजिला है। ऊपर की दो मंजिलों पर नौ गुंबद समान रूप से फैले हुए हैं। गुंबदों की छत पर सुन्दर आकृतियाँ बनाई गई हैं। मंदिर के भीतरी स्थल पर दक्षिणा माँ काली, भगवान शिव पर खड़ी हुई हैं। देवी की प्रतिमा जिस स्थान पर रखी गई है उसी पवित्र स्थल के आसपास भक्त बैठे रहते हैं तथा आराधना करते हैं।
हमने एक दुकान वाले के पास जूते चप्पल उतारे और पूजा का सामान लिया। लाईन में लग गए।मंदिर के अंदर काली माई का विग्रह है, यहां रामकृष्ण परम हंस को अनुभूति हूई थी। एक घंटे तक लाईन में लगने के बाद दर्शन का हमारा नम्बर आया। पत्र-पुष्प चढाकर हमने प्रसाद लिया और वहीं कुछ देर बैठ गए। इस मंदिर के प्रांगण में द्वादश ज्योतिर्लिंग भी बनाए गए हैं। हमने इन ज्योतिर्लिंगों पर जल अर्पित किया। यहां एक खास बात देखने में आई कि सभी लोग मौली के धागों में बंधे हुए छोटे-छोटे मिट्टी के ठिकरे ले रहे थे और उन्हे अपनी बांह पर ताबीज जैसे बांध रहे थे। मैने बहुत सारे बंगालियों को ये ठीकरे बांधे हुए पहले भी देखा था।लेकिन अब जाकर पता चला था कि ये ठीकरे दक्षिणेश्वर काली मंदिर से लिए जाते हैं।
मंदिर से निकासी के रास्ते पर रामकृष्ण परम हंस की बैठक है, जहां पर वे बैठकर अपने शिष्यों को ज्ञान दिया करते थे। आगंतुकों से मिलते थे। वहां पर उनका तख्त भी रखा है। माता शारदा एवं विवेकानंद के चित्र भी लगे हैं, उनकी स्मृतियाँ यहां संजोकर रखी गयी हैं। हम भी कुछ देर इस कमरे में बैठे, बहुत शांति मिली। सकारात्मक उर्जा हमेशा मानव मन को शांत और चित्त को स्थिर करती है। ऐसा ही कुछ अनुभव यहां पर हुआ। मोबाईल सब स्विच ऑफ़ कर दिए जाते हैं। यहां से निकल कर हम उस स्थान पर पहुंचे जहां रामकृष्ण बैठा करते थे पेड़ की छांव में। यहां एक कुटिया बना दी गयी और उसका दरवाजा बंद कर दिया गया था। यहां पर भी हमने कुछ देर विश्राम किया। अब थोड़ा बहुत नास्ता करके हम नाव की सवारी को तैयार थे।

चित्र-गुगल से साभार

ललित शर्मा

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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

सुन्दरवन, गंगा का डेल्टा, गंगा सागर, शेर, मधुमक्खी,कलकत्ता--यात्रा 3

मारी मंजिल 170 किलोमीटर दूर थी। रास्ते में काफ़ी हरियाली थी। 1 बजे हम काक द्वीप पहुंचे। यहां गंगा नदी अपना डेल्टा बनाती है, जिसे सुंदर वन कहते हैं, सुंदर वन में अभी शेर हैं,यदा कदा मछुवारों पर इनके हमले की खबर आते रहती है। ये शेर पानी में शिकार करने के अभ्यस्त हो गए हैं, पानी में चुपके से तैर कर नाव पर हमला बोल देते हैं। सुंदर वन में मधुमक्खी के छत्ते भी बहुत है, सैकड़ों परिवारों का रोजगार इन छत्तों से शहद निकालने से चलता है। ये विशेष जाति के लोग शहद ही निकालते हैं अपनी जान जोखिम में डालकर क्योंकि कभी भी शेर के हमले का शिकार हो सकते हैं। एक खासियत और है ये कभी मधुमक्खी के छत्ते को जड़ से खत्म नहीं करते, जितने हिस्से में शहद है उसे ही तेज धार हंसिए से काट लेते हैं।

यहां पर गंगा नदी का पाट लगभग2-3 किलोमीटर चौड़ा है, गंगा सागर वाले द्वीप तक पहुंचाने के लिए बड़े-बड़े स्टीमर चलते हैं जिसमें सैकड़ों आदमी, अपनी भेड़-बकरी सायकिल, मोटर सायकिल के साथ बैठ जाते हैं। हर घंटे में यहां स्टीमर आता और जाता है। प्रति सवारी शायद साढे तीन रुपया किराया लिया। यहां किराया बहुत सस्ता है। हम टिकिट लेकर स्टीमर में सवार हो गए। ड्रायवर ने बताया की उस पार जाने में लगभग डेढ घंटा लगेगा। हम लोगों ने विचार किया कि खुली छत पर ही बैठकर नजारे देखे जाएं। हम टीन की बनी हुई छत पर बैठ गए और वहीं पर भोजन भी किया। भोजन हम अपने साथ ले गए थे। डॉक्टर श्रीधर के यहां की बनी हुई इटली यहां काम आई।

हम डेल्टा में पहुंचे यहां से सागर का किनारा 32 किलो मीटर की दूरी पर है। हमने फ़िर यहां एक टाटा सूमो 500रुपए में किराए पर ली, जो कि हमे वापस भी पहुंचाएगा। जब हम यहां के सागर के किनारे पर पहुंचे तो ऐसा लगा कि जैसे मॉरिसश का कोई सागर तट है। बहुत ही सुंदर सागर तट है। मैने लगभग भारत के सभी सागर तट देखे हैं, लेकिन मुझे सबसे सुंदर यहां का सागर तट लगा। यहां मकर सक्रांति को मेला भरता है दुनिया भर के तीर्थ यात्री यहां आते हैं। कहा गया है कि”सारे तीरथ बार बार-गंगा सागर एक बार” कहते हैं कि यहां कपिल मुनि ने आश्रम बनाकर तपस्या की थी। वह आश्रम अब समुद्र में समा गया है। मकर सक्रांति को ज्वार आने पर वह आश्रम दिखाई देता है और वहां दर्शन होते थे, ऐसी किवदंती है। लेकिन अब ऐसा नहीं होता है।

समुद्र के किनारे पूजा का सामान बेचने वालों की दुकाने हैं। वे बिछाने के लिए पालिथिन भी देते हैं जिसपर आप सामान और कपड़े भी रख सकते हैं, लेकिन कपड़ों का ध्यान रखना जरुरी है, नहीं तो अंडरवियर में ही कलकत्ता वापस आना पड़ेगा। यहां नारियल पानी मिलता है, काफ़ी बड़ा नारियल था मैं तो एक भी पूरा नहीं पी सका। हमने लगभग डेढ घंटे समुद्र में अठखेलियाँ की, जम कर स्नान किया। उपर का पानी गरम था और अंदर का पानी ठंडा। दूर-दूर तक समुद्र ही समुद्र अपनी विशालता और महानता प्रदर्शित कर रहा था। एक पंडा महाराज पहुंच गए,उनसे हमने समुद्र पूजा कराई।

अब हम कपिल मुनि के मंदिर पहुंचे जो समुद्र से डेढ किलोमीटर पर बना हुआ है। मंदिर के पुजारी से मेरी चर्चा हुई, उसने बताया कि समुद्र के अंदर की कपिल मुनि की मूर्ती को बाहर निकाल कर यहीं मंदिर में स्थापित किया गया है। यह मंदिर हनूमान गढी अयोध्या वालों की देख रेख में संचालित होता है। सभी पुजारी वहीं से आते हैं। हमने मंदिर में पूजा करवाई और प्रसाद लिया। गांव में बांटना जो था। तीर्थ यात्रा का प्रसाद इष्ट मित्रों के यहां पहुंचाने की परम्परा है। हम अपनी गाड़ी के पास पहुंचे क्योंकि आखरी स्टीमर के जाने का समय हो रहा था। उसका भोंपू बज जाता तो हमें रात गंगा सागर में ही गुजारनी पड़ती

हमें स्टीमर टाईम पर मिल गया। इतना समय भी मिल गया कि हम चाय पी सकें। वहीं किनारे पर बने हुए एक होटल में चाय पी। स्टीमर चल पड़ा। उस पार हमारी टैक्सी इंतजार कर रही थी। आज रथ यात्रा का दिन था याने रथ दूज, यहां रथ यात्रा का त्योहार जोर शोर से मनाया जाता है। रास्ते में जगह-जगह रथ यात्रा के कारण सड़कें जाम मिली। सारी भीड़ बाजे-गाजे के साथ सड़क पर ही थी। हम रात 9 बजे कलकत्ता पहुंचे। युएसए ने कहा कि अब के सी दास के होटल में मिठाई खाएंगे, यह कलकत्ता का मशहूर होटल हैं जहां मिठाइयाँ बनते ही बिक जाती हैं। मेरा मन नहीं था मिठाई खाने का, इन्होने सब तरह की मिठाइयाँ चखी। मैने सिर्फ़ संदेश का स्वाद लिया। फ़िर पहुंच गए अपने रिटायरिंग रुम में बिस्तर पर लोटने के लिए।    

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फ़ोटो गुगल से साभार

ललित शर्मा Indli - Hindi News, Blogs, Links