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शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

बेलूर मठ और कलकत्ता की बस-------यात्रा 5

दक्षिणेश्वर मंदिर हुगली गंगा के किनारे पर स्थित हैं यहां से बेलुर मठ के लिए नाव जाती है जो कि नदी के दूसरे किनारे पर स्थित है। हूगली नदी पानी से लबालब भरी हुई थी। बताते हैं इस नदी में शार्क मछलियां भी है जो यदा कदा मछुआरों के जाल में फ़ंस जाती है। इस नदी के बीच में पानी मे से रेत निकालने वाली मशीन भी लगी हैं जो रेत निकाल कर नाव में भरती है और यह रेत भवन निर्माताओं तक पहुंचती है। इस तरह नदी के पानी में से रेत निकालना मैने पहली बार देखा था। नाव वाले ने एक साथ 25 लोगों को नाव में सवार किया। इसका किराया प्रति व्यक्ति 10 रुपए था। हमारे साथ और भी अन्य लोग सवार हुए, कुछ लोगों ने सवार होने से पहले नाव को प्रणाम किया। मैं यह सब देख रहा था।

बरसात का मौसम होने के कारण नदी का पानी हिलोरें ले रहा था। नाव डगमगाती सी लगती थी। यहां नाव डूबने की घटनाएं होते रहते हैं। हमें तो तैरना आता है, लेकिन नदी के बहते पानी में तैरना और स्विमिंग पुल में तैरने में बहुत अंतर है। लेकिन मैने नदी में भी बहुत तैराई की है, इसलिए नदी में तैरने का भी अनुभव है। कुछ टूरिस्ट हमारे साथ नाव पर दार्जलिंग के भी मिल गए। उन्होने बताया कि दार्जलिंग में अभी तो छुट्टी चल रही हैं। वे सरकारी कर्मचारी है। दार्जलिंग में गोरखा आन्दोलन के चलते सभी दफ़्तर बंद हैं। कर्मचारी घर में बैठ कर आराम कर रहे हैं या पर्यटन के लिए निकल गए हैं। बोड़ो, गोरखा, नगा, कुकी, उल्फ़ा, सुल्फ़ा, इत्यादि आन्दोलनों ने इस सुंदर उत्तर-पूर्व के क्षेत्र के लोगों का जीना हराम कर दिया है। यह इलाका भी स्वर्ग से कम नही है। लेकिन उग्रवादी लोगों को स्वर्गवासी बनाने पर तूले हुए हैं। हमारी उनसे चर्चा होते रही। थोड़ी देर में नाव बेलुर मठ के पिछले दरवाजे के पास बने घाट पर लग चुकी थी, हम बेलुर मठ तक पहुंच चुके थे।

बेलूर मठ में एक बहुत सुंदर विशाल भवन है, जिसके चित्र यदा कदा देखने में आते हैं, यहां पर रामकृष्ण परम हंस की मूर्ती रखी हुई है। जिसके दर्शन निश्चित समय पर कराए जाते हैं। हम भी हाल में जाकर चुप चाप बैठ गए, कोई दो घंटे के बाद दर्शन हुए। लोगों ने आरती इत्यादि की। इसके बाद हम बेलुर मठ में घुमने निकले। एक जगह विवेकानंद विश्रांति स्थल हैं जहां पर उनका स्मारक बनाया हुआ है। इसे ओम मंदिर भी कहा जाता है। बेलुर मठ में दोपहर को भोजन मुफ़्त मिलता है, इसके लिए टोकन लेकर लाईन लगानी पड़ती है। हमारे पास इतना समय नहीं था कि टोकन लेकर भोजन के लिए लाईन लगायें। इसलिए हम बेलुर मठ से दर्शन करके बाहर निकल गए, और बस पकड़ने के लिए रोड़ तक पैदल चल कर पहुंचे।

बाबा धाम की यात्रा में हम अपने साथ कैमरे नहीं रखते क्योंकि रास्ते में कांवड़ियों के साथ लूट पाट हो जाती है। मैने सिर्फ़ मोबाईल रखा था सस्ता जिससे बात हो सके और लुट जाने पर कोई तकलीफ़ न हो। बाकी साथियों ने तो मोबाईल भी नहीं रखा था सब घर पर छोड़ आए थे। बात करनी होती थी तो एसटीडी पर कर लेते थे और उन्होने अपने घर मेरा मोबाईल नम्बर दे रखा था। इमरजेंसी में उनके घर के लोग मेरे मोबाईल पर फ़ोन कर सकते थे। इसलिए इस यात्रा के चित्र मेरे पास उपलब्ध नहीं है। जो भी चित्र हैं सब गुगल से साभार लिए गए हैं। अगर किसी को आपत्ति होती है तो हटा दिए जा सकते हैं।सड़क पर पहुंच कर हमने चाय पी, चाय का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि यह कुछ विशेष है, हमने 5-5 कप चाय पी थी। यहां 1 रुपए में चाय छोटे छोटे सकोरे में दी जाती है जिसमें सिर्फ़ एक घूंट चाय ही आती है। इसलिए हमें अपनी चाय की इच्छा शांत करने के लिए 5-5 सकोरे चाय पी । इसके बाद कलकत्ता की नगरीय बस सेवा का आनंद पहली बार लिया। इतनी खटारा बस में हम पहली बार बैठे होगें। इसकी बॉडी भी अंग्रेजों के जमाने की लकड़ियों की बनी हुई थी। टीन टप्पर लगा हुआ था, जो बाबूजी की पैंट फ़ाड़ने के लिए काफ़ी था। हिचकोले लेती हुई बस कलकत्ता शहर के बीचों बीच रही थी जमाने को चिढाते हुए। अरे दो चार रुपए किराया बढा दो लेकिन बसें तो अच्छी रखो। ऐसी सलाह हमने बस वालों को दी।

चित्र - गुगल से साभार
ललित शर्मा Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

जय काली कलकत्ते वाली-दक्षिणेश्वर धाम-- यात्रा 4

मैने देखा कि बंगाल के ग्रामीण अंचल में गरीबी अधिक है, लोग प्राकृतिक संसाधनों पर ही जीवन गुजर बसर कर रहे हैं। बंगाल की कम्युनिस्ट राजनीति ने इन्हे कहीं का नहीं छोड़ा। कम्युनिस्टों का कैडर इनकी जान के पीछे पिस्सुओं जैसे पड़ा रहता है। हर पल इनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता पर नजर रखी जाती है। अगर कोई धोखे से भी किसी दूसरी पार्टी की रैली या भाषण में खड़ा दिख गया तो उसकी शासकीय सुविधाएं जैसे पेंशन-राशन इत्यादि बंद कर दिया जाता है। इसलिए गरीब आदमी सुविधा खोने के डर से किसी दूसरी राजनैतिक पार्टी की ओर चाह कर भी नहीं देख पाता। जिसमें शासकीय सुविधाएं ठुकराने की हिम्मत है वही दूसरे राजनैतिक दलों की ओर जाता है। गरीबी कम्युनिस्टों के शासन की कलई खोलते हुए दिखाई देती है।
13 जुलाई को हम सुबह स्नान प्रात:राश आदि से निवृत्त होकर दक्षिणेश्वर के दर्शन के लिए चल पड़े। हमने हावड़ा स्टेशन से ही ट्रेन पकड़ ली, जिसने हमें दक्षिणेश्वर के करीब के स्टेशन पर पहुंचा दिया। स्टेशन का नाम भूल रहा हूँ, फ़िर इस स्टेशन से हम ओवर ब्रिज पर चढे और वहां से दक्षिणेश्वर के लिए ऑटो लिया। 40 रुपए में ऑटो वाले ने हमें वहां पहुंचा दिया। आज रविवार का दिन था। दक्षिणेश्वर में बहुत भीड़ थी। कलकत्ता आने वाला हर मुसाफ़िर दक्षिणेश्वर के मंदिर में दर्शन करने अवश्य जाता है। इस मंदिर का बहुत  बड़ा प्रांगण है। मंदिर के प्रवेश के लिए लम्बी लाईन लगी हुई थी। 
दक्षिणेश्वर के विषय में जानकारी है कि इसका निर्माण सन 1847 में प्रारंभ हुआ था। जान बाजार की महारानी रासमणि ने स्वप्न देखा था, जिसके अनुसार माँ काली ने उन्हें निर्देश दिया कि मंदिर का निर्माण किया जाए। इस भव्य मंदिर में माँ की मूर्ति श्रद्धापूर्वक स्थापित की गई। सन 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। यह मंदिर 25 एकड़ क्षेत्र में स्थित है।माँ काली का मंदिर विशाल इमारत के रूप में चबूतरे पर स्थित है। इसमें सीढि़यों के माध्यम से प्रवेश कर सकते हैं। दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर तीन मंजिला है। ऊपर की दो मंजिलों पर नौ गुंबद समान रूप से फैले हुए हैं। गुंबदों की छत पर सुन्दर आकृतियाँ बनाई गई हैं। मंदिर के भीतरी स्थल पर दक्षिणा माँ काली, भगवान शिव पर खड़ी हुई हैं। देवी की प्रतिमा जिस स्थान पर रखी गई है उसी पवित्र स्थल के आसपास भक्त बैठे रहते हैं तथा आराधना करते हैं।
हमने एक दुकान वाले के पास जूते चप्पल उतारे और पूजा का सामान लिया। लाईन में लग गए।मंदिर के अंदर काली माई का विग्रह है, यहां रामकृष्ण परम हंस को अनुभूति हूई थी। एक घंटे तक लाईन में लगने के बाद दर्शन का हमारा नम्बर आया। पत्र-पुष्प चढाकर हमने प्रसाद लिया और वहीं कुछ देर बैठ गए। इस मंदिर के प्रांगण में द्वादश ज्योतिर्लिंग भी बनाए गए हैं। हमने इन ज्योतिर्लिंगों पर जल अर्पित किया। यहां एक खास बात देखने में आई कि सभी लोग मौली के धागों में बंधे हुए छोटे-छोटे मिट्टी के ठिकरे ले रहे थे और उन्हे अपनी बांह पर ताबीज जैसे बांध रहे थे। मैने बहुत सारे बंगालियों को ये ठीकरे बांधे हुए पहले भी देखा था।लेकिन अब जाकर पता चला था कि ये ठीकरे दक्षिणेश्वर काली मंदिर से लिए जाते हैं।
मंदिर से निकासी के रास्ते पर रामकृष्ण परम हंस की बैठक है, जहां पर वे बैठकर अपने शिष्यों को ज्ञान दिया करते थे। आगंतुकों से मिलते थे। वहां पर उनका तख्त भी रखा है। माता शारदा एवं विवेकानंद के चित्र भी लगे हैं, उनकी स्मृतियाँ यहां संजोकर रखी गयी हैं। हम भी कुछ देर इस कमरे में बैठे, बहुत शांति मिली। सकारात्मक उर्जा हमेशा मानव मन को शांत और चित्त को स्थिर करती है। ऐसा ही कुछ अनुभव यहां पर हुआ। मोबाईल सब स्विच ऑफ़ कर दिए जाते हैं। यहां से निकल कर हम उस स्थान पर पहुंचे जहां रामकृष्ण बैठा करते थे पेड़ की छांव में। यहां एक कुटिया बना दी गयी और उसका दरवाजा बंद कर दिया गया था। यहां पर भी हमने कुछ देर विश्राम किया। अब थोड़ा बहुत नास्ता करके हम नाव की सवारी को तैयार थे।

चित्र-गुगल से साभार

ललित शर्मा

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