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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

झूलती मीनार और अलबेला खत्री की डुबकी

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अगली सुबह अलबेला खत्री जी से बात हुई तो उन्होने बताया कि वे एक दिन पहले अहमदाबाद में ही थे। फ़िर उन्होने कहा कि अगले दिन मैं सुबह की गाड़ी से अहमदाबाद आ रहा हूँ। वहीं मुलाकात हो जाएगी। मैने कहा कि अहमबाद स्टेशन पर आपको गाड़ी तैयार मिलेगी। मुझे फ़ोन कर देना, ड्रायवर आपको हमारे ठिकाने पर पहुंचा देगा। मेरी यह चर्चा अलबेला भाई से लोथल से लौटते वक्त हो रही थी। सुबह जब हम ऑफ़िस में पहुचे और उन्हे फ़ोन लगाया तो पता चला कि उनकी गाड़ी छुट गयी। उन्होने कहा कि जब शाम को आप सूरत पहुंचेगें तो मिलते हैं। चलो कोई बात नहीं यह भी खूब रही। संजय बेगानी जी को वापसी की सूचना देने के लिए फ़ोन लगाया तो उनकी तबियत भी नासाज थी। सर्द गर्म और वायरल से जूझ रहे थे। उन्हे आराम करने की सलाह देते हुए मैने वापसी का समाचार दिया।

मेरे रास्ते का खाना घर से बन कर आ गया था। पोरबंदर हावड़ा एक्सप्रेस अपरान्ह 3.40 पर थी। हम दोपहर का भोजन करके स्टेशन पहुंचे। विनोद गुप्ता जी भी साथ ही थे। वहाँ पहुंचने पर पता चला कि ट्रेन रात को 10.50 पर आएगी। सुन कर झटका लगा, सात घंटे लेट थी ट्रेन। आगे कोई भरोसा भी नहीं कब आए। हावड़ा रुट की सभी गाड़ियाँ रिशेडयुल हो कर चल रही  हैं ज्ञानेश्वरी दुर्घटना के बाद। रेल्वे की वेबसाईट पर रिशेडयुल समय नहीं दिखाता। इसके कारण यात्रियों को परेशानी होती है। अगर मुझे सही समय का पता लग जाता तो अहमदाबाद पुरी से टिकिट करवाता। काहे के लिए हावड़ा वाली गाड़ी में मगजमारी करता। यह रेल्वे की सरासर धोखाधड़ी है यात्रियों के साथ। अगर पहले पता चल जाए कि ट्रेन 7-8 घंटे लेट चलेगी तो यात्री उसके हिसाब से इंतजाम करके आए। अल्पना जी का सामान मुझ तक पहुंच चुका था।

स्टेशन के पास झूलती हुई मीनार है, विनोद भाई ने कहा कि अब आ गए हैं तो वही देख लेते हैं। हम समीप में बनी झूलती मीनार देखने गए। दो मीनारें बनी हुई है। इन्हे चारों तरफ़ से घेर दिया गया है। कहते हैं कि हाथ से धक्का देने पर यह मीनारें हिलती हैं। इसलिए इन्हे झूलती हुई मीनार कहा जाता है। मीनारे गिरने का खतरा देखते हुए इन्हे घेर कर बाड़ कर दी है। आस-पास गंदगी फ़ैली हुई है। जबकि गुजरात पर्यटन के कैलेंडर में इन मीनारों की फ़ोटो भी लगी है। अगर कोई पर्यटक आएगा तो क्या गंदगी देखने आएगा। जहाँ सड़ांध उठ रही हो। हुँ छुँ अमदाबाद वाला बोर्ड शायद यही प्रदर्शित कर रहा है। आओ देखो अहमदाबाद में पर्यटक स्थलों का क्या हाल है। मीनारे देखने के बाद हम पुन: आफ़िस आ गए। अब रात को ट्रेन पकड़नी थी। तब तक नेट पर ही टाईम पास किया जाए।

शाम को विनोद भाई के साथ घर पहुंचे, फ़िर रात का भोजन करके साढे दस बजे स्टेशन रवाना हुए। रास्ते में सैंटा क्लाज की ड्रेस बिक रही थी। एक ड्रेस उदय के लिए ली। स्टेशन पहुंचने पर पता चला कि गाड़ी एक घंटे लेट और हो गयी है। इंतजार करते समय बीतता गय। सवा बारह बजे ट्रेन आई। हमने अपनी सीट संभाली और सो गए। सुबह आँख खुली तो सूरत निकल चुका था। सूरत नरेश अलबेला खत्री का कहीं पता नहीं था। न वो आए, न उनका फ़ोन आया। गजब ही कर दिया कविराज ने। कोई बात नहीं, परदेश का मामला ही ऐसा होता है। अगर कही सूरत पहुंच जाते तो वे शायद मुंबई में मिलते। वापसी की यात्रा का फ़ोन सूर्यकांत गुप्ता जी को कर दिया था। नागपुर में वे इंतजार कर रहे थे।

ट्रेन नागपुर लगभग 4 बजे पहुंची। गुप्ता जी स्टेशन पर मिल गए। अब एक से भले दो। रात और आधा दिन मैने सोकर ही काटा था। गुप्ता जी के आने से बहार आ गए। गुंजने लगे हंसी के ठहाके और ट्रेन चलने लगी। साढे सात बजे लगभग हमारी ट्रेन दुर्ग स्टेशन पहुंच गयी। गुप्ता जी विदा लेकर अपने गंतव्य की ओर बढ लिए। अब हमें रायपुर आने का इंतजार था। लगभग 8 बजे हम रायपुर पहुंचे। स्टेशन के बाहर अल्पना जी इंतजार करते मिली। उनका सामान जो लाए थे। ठंड बढ गयी थी, एक मित्र की सहायता रात घर पहुंचे। उन्होने गाड़ी भेज दी थी। इस तरह गुजरात की अधूरी यात्रा सम्पन्न हुई। होली के बाद बाकी यात्रा पुरी करनी है। कुछ देखना छूट गया, उसे पूरा करना है।
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"हुं छुं अमदाबाद" હું છું અમદાબાદ

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चौधरी की चाय, चौधरी की चाय के शोर के साथ आँख खुली। आँख बंद किए किए ही चाय का आर्डर दिया। महाराज भी उठ चुके थे, उन्होने एक चाय मुझे थमाई और एक चाय खुद थामी। 5 रुपये में चाय उम्दा थी, लेकिन कप छोटा था, महाराज ने चाय वाले से दुबारा कप में चाय डलवाई तब उनकी इच्छा पुरी हुई। सूरत जा चुका था कब का, खिड़की से बाहर झांके तो मणिनगर था, मतलब अहमदाबाद करीब था। विनोद भाई का फ़ोन आया उन्होने लोकेशन ली, थोड़ी देर में ड्रायवर का भी फ़ोन आ गया। उसने कहा कि वीआईपी लेन में स्टेशन के सामने गाड़ी खड़ी है, सामने ही मिलुंगा।

मणिनगर से अहमदाबाद के बीच भी वही देखने मिला जो हर जगह रेल पटरी के किनारे देखने मिलता है सुबह-सुबह और सिर झुका कर आँखे बंद करनी पड़ती है। कोई नया दृश्य नहीं है, यह नजारा देखने के बाद मुझे अंग्रेजों को धन्यवाद देने का मन हो जाता है, वे होते तो उन्हे प्रशस्ति-पत्र भी देता। अगर उन्होने ने रेल की पटरी नही बिछाई होती तो लोग सुबह-शाम की निस्तारी के लिए कहाँ जाते? भारत में भाषाएं संस्कृति अलग-अलग है, लेकिन पटरियों के किनारे लोटा-डब्बा लेकर जाने वाले सभी एक वर्ग से ही आते हैं। बिना किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के अपना काम निपटाते हैं, शायद यही एक काम है जो भारतीयों को एक सूत्र में बांधता है। कुछ दिनों बाद शायद इनकी अखिल भारतीय स्तर पर युनियन भी बन जाए। :)

मणिनगर से अहमदाबाद के बीच ट्रेन ने काफ़ी समय ले लिया। डाऊन गाड़ी मान कर इसे पीट दिया गया और एक घंटे लेट हो गयी। एक चाय और पीकर खुमारी उतारने की कोशिश की। गाड़ी ने धीरे-धीरे चलकर स्टेशन तक पहुंचाया। प्लेट फ़ार्म की सीढियों पर चेकिंग चल रही थी, दो चार सिपहिया यात्रियों का बैग खुलवाने में लगे थे। हमें रोका नही, और हम रुके नहीं। स्टेशन से बाहर निकले तो गाड़ी लगी थी। ड्राईवर हाजिर था, लगभग 8 बज रहे थे। अहमदाबाद स्टेशन के बाहर निकलते ही, एक बहुत बड़ी होर्डिंग दिखाई दी। उसी गर्वीले अंदाज में  जैसी लखनऊ स्टेशन के बाहर दिखाई दी थी। "हुं छुं अमदाबाद" लिखी हुई होर्डिंग सीना तान कर खड़ी थी। स्टेशन पर ट्रैफ़िक बहुत अधिक था। ड्राईवर जिग्नेश ने बताया कि सुबह और शाम स्टेशन के भीतर-बाहर जाना बहुत मुश्किल होता है। हमे अहमदाबाद ने ही बताया "हूँ छूँ अमदाबाद" । परिचय के बाद हम चल पड़े अपने ठिकाने पर, जिग्नेश से अहमदाबाद के रास्तों के बारे में पूछते हुए चलते हैं। वह में बीएसएनएल की 11 माले की ईमारत में ले जाता है। इस इमारत में 4 लिफ़्ट हैं, जिसमें 3 साधारण है और एक सुपरफ़ास्ट। कब 11 वीं मंजिल पर पहुंचती है पता ही नहीं चलता।

11 वीं मंजिल पर स्थित गेस्ट हाऊस में हमारा रुम था। रुम में पहुच कर चाय बुलाई, अटेंडेंट से गरम पानी का पता किया, उसने बताया कि गीजर चालु ही रहता है। मैने पहले नामदेव जी को स्नान करने कहा और मैंने रुम की खिड़की खोली, नीचे झांकते ही छत्तीसगढ दिखाई दिया। वाह भाई तू जहाँ तक चलेगा, मेरा साया साथ होगा वाली लाईन याद आ गयी। क्यों नहीं साथ होगा? जन्म भूमि और कर्म भूमि की बात तो यही होती है, मरते-जीते खींच कर ले ही जाती है जहाँ जन्म हुआ है। एक बिल्डिंग की छत पर छत्तीसगढ पर्यटन का प्रचार करती एक होर्डिंग दिख रही थी। जिसमें छत्तीसगढ आने का आमंत्रण था। वहीं खिड़की के सामने एक कबुतर भी बैठा था। उसकी गुटर गुँ जारी थी। जिग्नेश ने बताया था कि इस जगह का नाम सुंदरपुरा है, हमें स्नान करके सबसे पहले कांकरियाँ तालाब के पास एक विवाह घर में जाना था। जहाँ कुछ देरे नामदेव जी को दर्जी समाज के सम्मेलन में हाजिरी देनी थी। जिग्नेश को भी नहाने भेज दिया और उसे 10 बजे बुलाया। गेस्ट हाउस में केयर टेकर ने पोहा दही का नाश्ता कराया। लेकिन पोहा में मीठा डाल कर मजा किरकिरा कर दिया। खैर अन्न का अपमान करना मेरी फ़ितरत में नहीं, जो मिला खाया और आगे बढे।

जिग्नेश आ चुका था, तभी मुझे याद आया कि अहमदाबाद में हमारे दिग्गज सीनियर ब्लॉगर रहते हैं। उनका नम्बर मेरे दूसरे फ़ोन में था। पाबला जी को फ़ोन लगाया उनका नम्बर लेने के लिए। थोड़ी देर में पाबला जी ने नम्बर दिया, मैने उनसे बात की। बड़े खुश हुए भाई, मुझे भी अच्छा लगा। गेस्ट हाऊस से निकल कर सबसे पहला काम था ब्लॉगर मित्र से मिलना। जिसे हमने आभासी पढा था, देखा था, समझा था लेकिन रुबरु नहीं हुए थे। जिस तरह लोग दिन की शुरुआत मंदिर के भगवान के दर्शन से करते हैं, उसी तरह हम किसी भी शहर में जाने पर दिन की शुरुवात ब्लॉगर देव के दर्शन से करते हैं। बस यह देव-देवी कृपा बनी रहे। पता पूछते-पूछते हम उनके 5 वें माले के दफ़्तर में पहुच गए। वे गायब थे, थोड़ी देर में पहुंच गए, हमने छत्तीसगढ की राम कथा की एक प्रति भेंट की। यह हम उनके लिए विशेष तौर पर लाए थे। जब घर से चले थे तो बेगानी जी से मिलना याद था। लेकिन रास्ते में भूल गए। इसलिए पाबला जी से नम्बर लेना पड़ा। संजय भाई ने फ़टाफ़ट काफ़ी बना कर पिलाई, उनके दर्शन के पश्चात फ़िर मिलने का वादा कर विदा लेकर कांकरिया तालाब के जसवंत हॉल की ओर चल पड़े। 

कांकरिया तालाब अहमदाबाद का मुख्य आकर्षण है, यहाँ शाम को काफ़ी रौनक रहती है लोग पिकनिक मनाने और तफ़री करने आते हैं। इसके सामने ही मिला जसवंत राय हॉल्। गुजराती दर्जी सम्मेलन चल रहा था, नामदेव जी भी जाति मोह में यहां तक पहुच गए थे। स्टेज पर रौनक लगी थी, स्वामीनारायण सम्प्रदाय के दो साधु अतिथि के तौर पर मंच पर विराजमान थे। हम भी पिछली कुर्सियों पर बैठ गए जाकर। जिनके निमंत्रण पर नामदेव जी पहुंचे थे उन्हे ही फ़ुरसत नहीं थी परघाने की। इसलिए हमने कहा था कि घर से ही परघे परघाए चलो। क्या भरोसा उनकी बोली आपकी समझ में न आए। उस सज्जन को बुलाकर मैने नामदेव जी के बारे में बताया तो वे उन्हे मंच पर ले गए और शाल श्री फ़ल से सम्मान किया। नामदेव जी भी बिरादरी में मिल गए। सभी ने उन्हे देखा और पहचाना। अब हमने ईशारा किया कि काम खत्म हो गया आज का, अब आगे बढा जाए। जिग्नेश को पूछने पर उसने बताया कि पहले रुड़ाबाई नी बाव में चलते है फ़िर वहीं से गांधीनगर का अक्षर धाम देख लेगें। ये आईडिया सही लगा, समय का सदुपयोग हो जाएगा। हम गांधीनगर की ओर चल पड़े। विनोद भाई ने फ़ोन पर भोजन की खैर खबर ली।

अहमदाबाद से गांधीनगर के रास्ते पर बहुत सारे ढाबे हैं, जिनके साईन बोर्ड पर "काठियावाड़ी-पंजाबी खाना" लिखा है। काठियावाड़ी खाने के साथ पंजाबी खाना भी मिलता है। मैं पहले भी गुजरात का पंजाबी खाना खा चुका था। वह भी गुजराती खाने जैसा ही था। मतलब गुजराती अगर पंजाबी बोलेगा तो वह भी गुजराती में बोलेगा। हा हा हा। एक ढाबा बढिया दिखाई दिया, झमाझम सजावट बडे बड़े साईन बोर्ड और गाड़ियों की भीड़। हमने यहीं भोजन के लिए गाड़ी रोकी और तय किया कि काठियावाड़ी भोजन ही करेंगे। ढाबे नुमा होटल का नाम मारुतिनंदन होटल था। वेटर ने मीनू कार्ड सामने लाकर रख दिया। उसमें मारुतिनंदन स्पेशल बहुत कुछ दिखाई दिया, पर समझ नहीं आया। 

हमने काठियावाड़ी थाली का आर्डर दिया। मुझे छाछ की बारहों महीने जरुरत रहती है। इसलिए छाछ देख कर मन प्रसन्न हो गया। वेटर ने पूछा कि रोटली चाहिए की रोटला। मैने बाजरे की रोटी खाने के इरादे से रोटले का आडर दे दिया। जब रोटी आई और एक कौर खाया तो कुछ खटक गया। मुझे बाजरे के आटे में मिलावट लगी। खाने का मन नहीं किया, लेकिन खाना थाली में न छोड़ने के कारण दो रोटले खा ही लिए, छोटे छोटे थे। अब यही रोटले आगे की यात्रा में भारी पड़ने वाले थे, यह मुझे मालूम नहीं था।  जिग्नेश और नामदेव जी ने रोटली ली वे सुखी रहे। भोजन करके हम रुड़ा बाई नी बाव की तरफ़ बढे........... क्रमश यात्रा जारी है..........आगे पढें
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चाबी वाला पत्थर और कस्तूरी की खुश्बू : गुजरात की ओर

कई महीनों से गुजरात यात्रा करने विचार था लेकिन कोई न कोई अवरोध यात्रा में उत्पन्न होने के कारण जाना नहीं हो पा रहा था। पिछले 14 दिसम्बर को मित्र नामदेव जी ने गुजरात जाने की बात कही और मैं सहर्ष तैयार हो गया। अभी नवम्बर में ही हमने एक लम्बी यात्रा की थी, तब भी जाने का मन बना लिया। 15 तारीख को टिकिट ली, गुजरात जाने वाली सभी गाड़ियाँ फ़ुल पैक थी। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस कांड के बाद हावड़ा रुट से आने वाली सभी गाड़ियाँ रास्ते में रोक दी जाती हैं। जिससे वे 8 से 10 घंटे विलम्ब से चला करती हैं। रेल्वे की वेब साईट में इनका चलने का सही समय  नहीं बताया जाता। जिसके कारण समस्या खड़ी हो जाती है। इसलिए हमने पुरी अहमदाबाद एक्सप्रेस से टिकिट ली। इस ट्रेन से जाने की सलाह एक जानकार मित्र ने दी। यही ट्रेन रायपुर से सही समय पर चलती है। स्लीपर में टिकिट लेने पर ईमरजेंसी कोटे से कन्फ़र्म होने की गारंटी रहती है। एक बार हमने एसी फ़र्स्ट की टिकिट लेकर स्लीपर में दिल्ली से रायपुर तक सफ़र किया और उसमें भी बैठने की जगह नहीं मिली। इसलिए तब से चेत गए और स्लीपर की टिकिट ही लेने लगे, क्योंकि स्लीपर की बोगियाँ अधिक होने के कारण टिकिट कन्फ़र्म होने की संभावना अधिक रहती है। 15 तारीख को पी एन आर ईमरजेंसी कोटे में लगाया और 16 को स्टेशन पहुंच गए। एक सीट कन्फ़र्म मिली, एक सीट का इंतजाम ट्रेन में ही कर लेगें, पता चला कि पुरी अहमदाबाद में रायपुर से सिर्फ़ एक ही बर्थ का कोटा है।

सुबह जल्दी उठकर अपना सामान लेकर रायपुर पहुंचें। बाईक अशोक भाई के यहाँ छोड़ी और महेन्द्र ने स्टेशन पहुंचाया। रायपुर से जब ट्रेन में चढे तो भारी भीड़ का सामना करना पड़ा। हावड़ा रुट की ट्रेन लेट होने के कारण रायपुर से अहमदाबाद की सभी सवारियाँ इसी ट्रेन में जाना पसंद करती हैं। रायपुर स्टेशन में अब काफ़ी बदलाव हो रहे हैं। नई बिल्डिंग के साथ 1 नम्बर प्लेटफ़ार्म पर मॉल बनाने का काम भी जारी है। ट्रेन चलने पर नाश्ता करने की याद आई, नामदेव जी को दुर्ग से बैठना था। हमने थोड़ा सा नास्ता किया और अपनी दैनिक टेबलेट लेकर दुर्ग स्टेशन का इंतजार करने लगे। दुर्ग स्टेशन में नामदेव जी पहुंचे, उन्हे बोगी एवं सीट नम्बर बता दिया था। हर सीट पर दो-दो एक्स्ट्रा सवारी थी। हमारी सीट का भी वही हाल था। नामदेव जी ने बैग से गर्मा गर्म रोटी और सब्जी निकाली और कहा कि फ़टाफ़ट खा लो ठंडी हो जाएगीं। अंटी जी ने आपके लिए सुबह का नाश्ता भेजा है। हमने कुछ रोटियाँ गर्मागरम सब्जी के साथ खाई। साथ ही सहयात्रियों की बात सुनते रहे। एक गुज्जु जोड़ा चढा दुर्ग से उसकी भी एक ही बर्थ थी। बीबी बैठ गयी सीट पर मियां खड़ा रहा। ट्रेन चलने पर वह भी उसी सीट पर समाहित हो गया।

की स्टोन याने चाबी वाला पत्थर
सुबह मैने जब मोबाईल देखा तो उसमें दो मेसेज थे, सुर्यकांत गुप्ता जी ने पाय लागी लिख रखी थी। उन्हे फ़ोन करने पर पता चला कि वे नागपुर में ही हैं। हमने उन्हे गुजरात जाने की सूचना दी तो उन्होने नागपुर ट्रेन पहुंचने का समय पूछा। फ़िर संध्या शर्मा जी का फ़ोन आया, उन्होने कहा कि खाने में क्या लेगें। नो फ़ार्मेलिटी, मैने कहा कि खाने में तो बहुत कुछ साथ ही बांध रखा है। वे जिद पर अड़ी रही तो मैने चावल खाने की इच्छा जाहिर की। सामने साईड लोवर बर्थ पर एक सज्जन दुर्ग से ही चढे थे। हाव भाव से मिलेट्री या पैरा मिलेट्री फ़ोर्स से संबंधित लग रहे थे। सहयात्रियों को उनका प्रवचन जारी था। नामदेव जी पेशे से इंजीनियर हैं। उनके साथ पहले के निर्माणों की चर्चा हो रही थी कि कैसे मेहराब पर चाबी वाला पत्थर लगाया जाता था जिससे चाबी वाले पत्थर के कारण मेहराब के वजन पर पुरी इमारत खड़ी रहती थी। नामदेव जी कहने लगे कि अभी के इंजीनियर्स को पता भी नही कीस्टोन (चाबी वाला पत्थर) क्या होता है। तभी वाणगंगा पर अंग्रेजों का बनाया पुराना पुल आ गया, जिसमें कीस्टोन लगा था। हमने पुल देख कर कैमरा क्लिक किया और कीस्टोन हमारे कब्जे में था।

सूर्यकांत गुप्ता जी
शनै शनै चलते हुए आस पास झोंपड़ पट्टियाँ नजर आने लगी, समझ गए कि नागपुर आने वाला है। रायपुर से आते समय नागपुर स्टेशन के पहले बाएं की तरफ़ एक बौद्ध विहार बना हुआ है। जिसमें बुद्ध की बहुत बड़ी प्रतिमा लगी है। यह दो निशानियाँ नागपुर पहुंचने की सूचना देती हैं। संध्या जी और सूर्यकांत गुप्ता जी का फ़ोन आ चुका था कि वे स्टेशन पर पहुंच चुके हैं। यहाँ ट्रेन के ठहराव मात्र 10  मिनट का है। इसलिए मैं पहले ही दरवाजे पर आ गया। ट्रेन रुकने पर दरवाजे उतरते ही सामने देखा तो संध्या जी सपति उपस्थित थीं। उनसे नमस्ते ही हुई थी इतनी देर में सूर्यकांत गुप्ता जी भी अपने साथी ठाकुर साहब के साथ पहुंच गए। उन्होने तुरंत एक पैकेट थमाया और कहा कि -"जुड़ के दवई हे, बिहनिया, मंझनिया अउ रतिया तीन खुराक लेबे।" मैने उन्हे धन्यवाद देकर पैकेट लिया। संध्या जी गर्मागरम पुलाव बना कर लाई थी। उनका पैकेट भी ग्रहण किया। शर्मा जी से मुलाकात अच्छी रही। कुछ बात कर पाते तब तक ट्रेन ने सीटी बजा दी। हमने मित्रों से विदा ली और सवार हो गए पुन: गाड़ी में। 2 बज रहे थे, चावल देखकर भूख लगने लगी। दो डिब्बों में गर्मागरम उम्दा पुलाव था, छोटा डिब्बा नामदेव जी ने संभाला और बड़ा डिब्बा हमने। फ़टाफ़ट सारा पुलाव चट कर गए। बड़ा ही लजीज खाना था। संध्या जी ने मीठे में सिर्फ़ दो ही लड्डू दिए थे। लगा कि खाने का बहुत ख्याल रखती हैं। उनका यह काम पसंद आया।

सहयात्री
भोजन करने के पश्चात कुछ देर आराम करने की इच्छा हुई। नामदेव जी सोना चाहते थे, साईड अपर बर्थ खाली थी। हम खैनी घिसते हुए बर्थ पर बैठे फ़ौजी नुमा व्यक्ति के पास पहुंच गए, वे खाली बैठे थे। हमने खैनी ऑफ़र की और चर्चा शुरु हो गयी। नामदेव जी उपर की बर्थ पर सो गए। हमारी बर्थ पर और लोग एडजेस्ट हो गए। फ़ौजी नुमा व्यक्ति हमारे गांव के पास के शर्मा जी निकले। उनके घर से लेकर पुरी रिश्तेदारी तक की चर्चा हो गयी। वे मेहसाणा के ओएनजीसी प्लांट में सीआईएसएफ़ के मुलाजिम सिक्योरिटी ऑफ़िसर हैं। अब उनसे चर्चा होते रही। ट्रेन आगे बढती रही। उन्होने बताया कि सारे भारत का भ्रमण किया है, कहीं भी 4 साल से अधिक नौकरी नहीं की। 4 साल बाद ट्रांसफ़र हो ही जाता है। अभी मेहसाणा में पदस्थ हैं छत्तीसगढिया परम्परानुसार उन्होने चावल की बोरी साथ बांध रखी थी क्योंकि छत्तीसगढ जैसे चावल और कहीं नहीं मिलते। हमें तो यहीं के चावल पसंद है, अगर दिन में एक बार चावल खाने नहीं मिला तो दिन खराब हो जाता है और दो बार मिल गया तो समझो पौ बारह। इसीलिए हमने संध्या जी से चावल खिलाने का आग्रह किया था। चावल के प्रति दीवानगी का यह आलम है कि एक बार श्रीमती जी ने चावल नहीं बनाए तो मैने होटल में जाकर खाए थे। अन्यथा अतृप्ति महसूस होते रहती, रात की नींद हराम हो जाती।

कस्तुरी का थोक चलित विक्रय केन्द्र
विनोद गुप्ता जी का फ़ोन आ गया, उन्होने बताया कि गेस्ट हाऊस बुक कर दिया है और सुबह 7 बजे स्टेशन पर गाड़ी लेने पहुंच जाएगी। आराम से स्नान ध्यान करना फ़िर मिलते हैं। गाड़ी का नम्बर और ड्रायवर का फ़ोन एसएमएस करता हूँ। लो जी अहमदाबाद में सारी व्यवस्था हो चुकी थी। अब रात को चैन की नींद लेकर सुबह अहमदाबाद पहुंच जाएगें। इधर शाम हो चुकी थी। हमने और महाराज ने एक-एक चाय ली और नामदेव जी को जगाया। वे मस्त नींद में थे, समय का सार्थक उपयोग सोना ही है। सफ़र में जब मन करे सो जाओ, सफ़र कट जाएगा। तभी एक औरत बच्चे को गोदी में लटकाए, बड़ा सा गांधी झोला टांगे कस्तूरी बेच रही थी। महाराज के पूछने पर उसने 300 रुपए जोड़े में बेचना बताया। महाराज से हमारी बात छत्तीसगढी में चल रही थी। महाराज ने मुझसे कहा कि सौ रुपए में मांग के देखते हैं अगर दे दे तो। मैने कहा कि 50 में भी मागोंगे तो दे देगी। उससे अधिक मत बोलना। महाराज ने 50 रुपए जोड़ी कहे तो वह आगे बढ गयी। फ़िर वापस आकर 50 रुपए जोड़ी में ही कस्तूरी दे दी। मैने उसके बैग को पहले ही टटोल कर देख लिया था। उसमें लगभग 200 से अधिक कस्तूरी होगी। इससे विश्वास हो गया था कि नकली है। 

येल्लो जी भुसावल आ गया
वह कस्तूरी देकर चली गयी तो महाराज ने उसे हथेली पर रगड़ कर देखा तो उस पर लगा काला रंग निकलने लगा। एक कस्तूरी सफ़ेद रंग की थी और एक काले रंग की। खुश्बू तो अच्छी आ रही थी। कस्तूरी वाली ने कस्तूरी की पहचान करने का तरीका दिखाया था कि उसे हाथ की मुट्ठी में बांध कर हथेली की उल्टी तरफ़ से कहीं भी रगड़ने से उस स्थान पर खुश्बू आ जाती है। महाराज संतुष्ट थे 50 रुपए में दो कस्तूरी खरीद कर। भोजन का समय होने पर अब हमने साथ ही खाना खाया, छत्तीसगढी में कहते हैं "मार सगा सगा ला, अउ काट सगा सगा ला।" महाराज की खपुर्री रोटी मेरे काम आई और मेरे गोभी के पराठे जबरदस्ती महाराज को टिका दिए। अब 4 तरह की सब्जी और आम के मीठे मुरब्बे के साथ 3 तरह का आचार 2 तरह के लड्डू और साथ में केले। शाही भोजन हो गया। लड्डू मैने नहीं खाए, पर भोजनोपरांत केले का स्वाद जरुर लिया। रात बढती जा रही थी। भुसावल पहुंचने के बाद सुबह का इंतजार था, जब चौधरी की चाय के साथ नींद खुले। क्रमश..........आगे पढें
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