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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

भूतों का बनाया मंदिर और गरम जलेबियाँ

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सुबह स्नान ध्यान के पश्चात वृंदावन दर्शन करने का विचार था, ठंडे पानी से स्नान और सुबह की गुलाबी ठंड याद रहेगी। तपोभूमि में सुबह खिचड़ी का प्रात:राश था इसलिए हमने बाहर जाकर नाश्ता करने का विचार बनाया। सुबह-सुबह गर्म जलेबियाँ मिल जाए दूध या दही के साथ तो फ़िर क्या कहने। हम सड़क पर होटल तलाशने लगे जहाँ तई में कोई हलवाई गर्म जलेबियाँ तलता दिख जाए। थोड़ी देर की मेहनत के बाद एक जगह गर्म जलेबियाँ तलता हलवाई दिख ही गया। कहने लगा -"5 मिनट रुकिए बाबूजी, आपको गर्म गर्म बेड़ई के साथ गर्म जलेबियाँ खिलाता हूँ। हमने आधा किलो जलेबी का आर्डर दिया और उससे पाव भर दही का इंतजाम करने कहा। एक लड़का दही ले आया। दही भी उम्दा था, न खट्टा न मीठा, मन माफ़िक स्वाद पाया। मैने और गुरुजी ने डट कर नाश्ता किया। गरमा गरम जलेबियों ने तो क्षूधा शांत करने के साथ तन-मन को आनंद से भर दिया। मैने खुशी से हलवाई को 10 रुपए दिए तो मालिक मेरी तरफ़ देख रहा था। शायद सोच रहा कि हलवाई को भी टिप देकर बिगाड़ने वाले मिल गए।

वहीं से हम ऑटो रिक्शा से वृंदावन की ओर चल पड़े। तपोभूमि से ऑटो रिक्शा का किराया 10 रुपए प्रति सवारी है। वृंदावन पहुंच कर राधे-राधे की मधुर ध्वनि सुनाई दी। ऑटो वाले ने हमे नगर पालिका के पास उतार दिया। वृंदावन में गंदगी चारों ओर बिखरी पड़ी है। कहीं भी हगो मूतो। नगर पालिका का भवन ही सामने से चकाचक दिखाई दे रहा था। तिराहे से हम आगे बढे श्री रंगनाथ जी के मंदिर दर्शन करने के लिए। सड़क दोनो तरफ़ नास्ते के होटल और रहड़ियाँ लगी हैं, सड़क पर आकर होटल वाले ग्राहकों को आमंत्रित करते हैं। श्री रंगनाथ जी के मंदिए पहुंचे तो पुजारियों ने बताया कि अभी दर्शन नहीं होगें। हमने भी सोचा कि कोई बात नहीं। मंदिर का शिल्प ही देख लेगें। हमने मंदिर के गलियारों का एक चक्कर लगाया। काफ़ी पर्यटक यहाँ पहुंचे हुए थे। कुछ गुज्जु भाई बहन डांडिया कर रहे थे। एक गाईड उनके साथ था, वह उन्हे वृंदा राक्षसी के विषय में जानकारी दे रहा था, जिसके नाम पर वृंदावन है। उसे राक्षस जलंधर की पत्नी बताया।

सारे गुज्जु भाई गाईड का प्रवचन सुन रहे थे, हम भी थोड़ी देर खड़े हो गए उनके पास, मुफ़्त का ज्ञान लेने। इतिहास पर बोलते-बोलते गाईड दर्शन पर चले गया। कहने लगा कि दुनिया क्षण भंगुर है। क्या लेकर आए थे जो साथ ले जाओगे। माया-ममता तो ध्यान और प्रभु मिलन के रास्ते में बाधा है। सिर्फ़ एक चीज ही मनुष्य के साथ जाती है वह है उसका कर्म, जो दान करता है वह सुख पाता है। मैं समझ गया था कि पंडे गाईड का जाने का समय हो गया और अब इसे दक्षिणा चाहिए इसलिए वैराग दर्शन दे रहा है। गुज्जु भाई भी अर्ध श्रद्धापूर्वक ज्ञानरंजन कर रहे थे। कुछ माताएं राधे-राधे जप रही थी। बिहारी कहीं दिख नहीं रहे थे। राधे-राधे का संकीर्तन जारी था, जय श्री कृष्ण का उद्घोष गगन गुंजित कर रहा था। पिछले दरवाजे पर भक्त जन दर्शन के लिए कतार लगाए हुए थे। पंडे पुजारी भगवान एवं भक्त की राह का रोड़ा बने हुए थे।

 श्रीरंगनाथ मंदिर का गुंबद
हमने दिव्य चक्षुओं से दर्शन कर पुजारियों को 10-20 की दक्षिणा का झटका दे दिया। भगवान और भक्त के बीच में बाधा उत्पन्न करने वाले को तो दंड तो मिलना ही चाहिए। श्री रंगनाथ मंदिर का मुख्य भाग दक्षिण भारतीय मीनाक्षी मंदिर शैली में बना है। प्रवेश द्वार राजस्थान की जयपुरी शैली में निर्मित है। जोधपुर के लाल पत्थरों पर जालीदार नक्काशी का काम हुआ है। यह उत्तर भारत का सबसे विशाल मंदिर है। श्री रंगनाथ मंदिर में जन्माष्टी के दूसरे दिन नंदोत्सव की धूम रहती है। यहां सुप्रसिद्ध लट्ठामेले का आयोजन होता है। जब भगवान रथ पर विराजमान होकर पश्चिम द्वार पर आते हैं तो लट्ठे पर चढने वाले पहलवान भगवान को दंडवत कर विजय श्री का आशीर्वाद लेते हैं फ़िर लट्ठ पर चढना शुरु करते हैं।35 फ़िट ऊंचे लट्ठ पर जब पहलवान चढते हैं तो ग्वाल बाल उन पर तेल और पानी की बौछार करते हैं। घंटो की रस्साकसी के पश्चात कोई न कोई पहलवान तो विजय श्री प्राप्त कर लेता है। इस रोमांच को देखने के लिए देश विदेश से लोग आते हैं और लट्ठामेले का आनंद उठाते हैं।

मंदिर प्रांगण में
श्री रंगनाथमंदिर का निर्माण सेठ लक्ष्मीचंद ने अपने गुरु आचार्य रंगदेशिकस्वामी की प्रेरणा से कराया था और निर्माण कार्य सन् 1849में पूरा हुआ था।किवदंतीके अनुसार मंदिर का निर्माण पूरा होने और उसमें सामान्य पूजा दर्शन प्रारंभ होने के कुछ ही दिन बाद एक बालक तथा एक बालिका ने रात में स्वामीजीसे स्वप्न में कहा कि आपने सब कुछ तो किया परन्तु हमारे लिए लड्डुओं के भोग की व्यवस्था तो की ही नहीं। बालक-बालिका ने अपना परिचय देते हुए कहा कि हम गोदा रंगनाथ हैं। प्रात:जागने के बाद स्वामीजीने तुरंत बेसन के लड्डुओं की व्यवस्था कर दी जो आज भी चल रही है।

बाबा साहब (गुरुजी)
दक्षिण भारतीय शैली पर निर्मित वृंदावन का विशाल मंदिर है जिसके मुख्य द्वार का निर्माण राजस्थानी शैली पर आधारित है। मंदिर प्रांगण में लगभग 50फुट ऊंचा स्वर्ण गरूडस्तंभ है। इस मंदिर में पूजा सेवा पारंपरिक वेशभूषा में दक्षिणी ब्राह्मणोंद्वारा की जाती है। हम बेमौसम पहुंचे थे, इसलिए हम लट्ठामेले का आयोजन न देख सके। फ़िर कभी देखेगें। गुरुजी आज बाबा साहब के गेटअप में थे, सिर एक संविधान की हाथ में देने एवं उंगली आसमान की ओर उठाने पर मामला फ़िट हो जाता। गलियारे में खड़े होकर एक फ़ोटो गुरुजी की लेने के बाद हम गोविंद देव जी के मंदिर के दर्शन करने के लिए बढे।

श्री गोविंद देव मंदिर मथुरा
गोविंद देव जी का मंदिर भी जोधपुरी लाल पत्थरों द्वारा निर्मित है। इसकी भव्यता का अंदाजा दूर से ही हो जाता है। किवदन्ती है कि इसे 2100 साल पहले भूतों ने बनाया था। किसी के चक्की चलाने की आहट सुनकर भूत इसे अधुरा छोड़ कर भाग गए। तब से यह मंदिर अधुरा ही है, गाईड बताते हैं कि इस मंदिर की 4 मंजिलों को औरंगजेब ने ध्वस्त करवा दिया था और इसमें जड़े हीरे जवाहरात निकाल ले गया। बताया जाता है कि इस मंदिर में जब दीयों की रोशनी की जाती थी तो दिल्ली तक दिखाई देती थी। इसलिए औरंगजेब ने इसकी 4 मंजिलों को तुड़वाया। मंदिर के गर्भगृह में फ़ोटो लेने की मनाही है। यह मंदिर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सर्वेक्षण में है। इस मंदिर की असली प्रतिमा जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में स्थापित है, यहाँ पर उस मूर्ति की प्रतिकृति स्थापित है। जयपुर का गोविंद देव जी का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है।

गोविंद देव मंदिर का संरक्षण के पुर्व का चित्र - गुगल से साभार
गोविंद देव मंदिर से हम बांके बिहारी के दर्शन करने गए। यह मंदिर पुराने शहर के बीचों बीच स्थित है। मंदिर मार्ग भी संकीर्ण है। हमने नगरपालिका के पास से 20 रुपए में रिक्शा किया और बांके बिहारी मंदिर तक पंहुचे। वहां दर्शनार्थियों की भीड़ लगी थी। मंदिर प्रांगण में ही प्रवेश करना बड़ी मशक्कत का काम था। एक दिन पहले पंचकोशी परिक्रमा यात्रा थी, इसलिए श्रद्धालुओं की भीड़ अभी तक मौजुद थी। धक्के मुक्के खाकर हमने गर्भगृह में प्रवेशकर बांके बिहारी जी के दर्शन किए। मंदिर में पुष्पसज्जा देखते ही बनती थी। बांके बिहारी जी की पुष्पसज्जा अलौकिक लगी। अतिसुन्दर, नयनाभिराम। बांके बिहारी जी मंदिर से निकल कर हमने पुन: रिक्शा लिया।

बांके बिहारी मंदिर में दर्शनार्थियों  की भीड़
बस स्टैंड आ गए। क्योंकि समय कम था और आज हमें हरिद्वार के लिए जाना था। दो-तीन रातों की नींद ने घायल कर रखा था। इसलिए तपोभूमि पहुंचकर कुछ देर सोना चाहता था। हम तपोभूमि के लिए ऑटो से चल पड़े। ऑटो वाले ने 15 सवारी चढा ली, मतलब डेढ सौ रुपए का एक ट्रिप। उसने बताया कि खर्चा काट कर रोज 400-500 रुपए कमा लेता है। चर्चा करते हुए तपोभूमि पहुंच कर बिस्तर पर पड़ गया। जैसे ही झपकी आ रही थी वैसे ही आवाज आई - "पायलागी महाराज, सुत गेस का? आँख खोल कर देखा तो तेजराम ने मेरी नींद की वाट लगा दी, आशीर्वाद देने की बजाए उसे जोर से गाली देने की इच्छा हुई, पर क्या करता, खुश रहो, आनंद रहो की ही ध्वनि निकली। आगे चलेगें हरिद्वार की ओर……।
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तपोभूमि से जन्मभूमि के दर्शन

गायत्री तपोभूमि-मुख्यद्वार
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गायत्री तपोभूमि जहाँ श्रीराम शर्मा ने अखंड ज्योति जलाई थी, आज गायत्री परिजनों के लिए शक्ति का केन्द्र एवं तीर्थ स्थल बन चुका है। यहां ठहरने एवं भोजन की उत्तम व्यवस्था है, भोजन एवं प्रात:राश समय पर उपलब्ध होता है। हम समय के दायरे के बाहर थे इसलिए भोजन एवं प्रात:राश से वंचित रहे। दिन ढल चुका था, हमारे साथी स्वव्यवस्थानुसार भ्रमण पर जा चुके थे। किंचित आराम करने के पश्चात हम लोग (मैं और गिलहरे गुरुजी) मथुरा भ्रमण को चल पड़े। तपोभूमि से कृष्ण जन्मभूमि जाने के लिए ऑटो की सवारी ली। रास्ते में पवन वर्मा भी पैदल आते दिख गए, उन्हे आवाज देकर ऑटो में साथ बैठा लिया। भूख लग रही थी, मन में कुछ चटर-पटर खाने की इच्छा थी। ऑटो वाले ने रेल्वे क्रासिंग पर छोड़ दिया। वहाँ चौक से 25 कदमों की दूरी पर जन्मभूमि है। जन्मभूमि सड़क पर यु पी पी ने सुरक्षा घेरा डाल रखा था। अगले दिन बकरीद थी, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था बढी हुई लगी।

हृदयलाल गुरुजी और इडली पाक
सड़क पर मद्रास रेस्टोरेंट का बोर्ड लगा देखा तो दक्षिण भारतीय नास्ता करने की इच्छा हुई। सामने ही पेड़े वाले की दुकान थी, मैने गुरुजी से एक पाव पेड़े लेने को कहा और रेस्टोरेंट में प्रवेश किया। रेस्टोरेंट साधारण दर्जे का ही था, उसका मालिक भी मथुरा का ही था। उससे खाने के विषय में पूछा तो उसने कहा कि 10 मिनट में सांभर बनने पर इडली खिला सकता हूँ। मैने उसे लस्सी का लाने कहा और तब तक पेड़े का स्वाद लेने लगे। लस्सी भी केशरयुक्त उम्दा किस्म की थी। हाँ थोड़ी मीठी अधिक थी। फ़िर सांभर इडली भी आ गयी। सांभर का स्वाद बहुत अच्छा था। मैने सांभर बनाने की विधि पूछी और मसाले के विषय में जानकारी ली। दक्षिण भारतीय मसाले की अपेक्षा यहां की सांभर में थोड़ी खटाई एवं मिर्च की मात्रा अधिक थी। होटल वाले ने अपना नाम सौरभ शर्मा बताया और कहा कि उसके बड़े भाई और भी बढिया सांभर बनाते हैं पर वे अभी हैं नहीं। सांभर इडली का नाश्ता करके हम बाहर निकले तो पानी के पताशों (गुपचुप) का ठेला लगा हुआ था। थोड़ा उसका भी जायका लिया। अच्छा रहा यह जायका भी।

पवन वर्मा  - गुरु्जी
अब मंदिर की तरफ़ आगे बढे तो दर्शनार्थियों का रेला लगा हुआ था। गेट पर पहले मैनुअली एवं मेटल डिक्टेटर लगा कर दर्शनार्थियों की जांच की जा रही थी। जेब में रुपए पैसों को छोड़कर कुछ भी भीतर नहीं ले जाने दिया जा रहा था। पान-गुटका, मोबाईल इत्यादि बाहर ही रखवाया जा रहा था।  पवन वर्मा ने के पास बंदुक थी, इसलिए वे भीतर न जा सके, हमने अपना सामान उन्हे ही थमाया और मंदिर के भीतर प्रवेश किया। प्रवेश द्वार के समीप जूते-चप्पल इत्यादि रखने की जगह बनी थी। वहीं हमने अपनी पादुकाएं रखी, प्रसाद लेकर कृष्ण कन्हाई के दर्शन करने पहुंच गए। गुजरात और बंगाल से भी एक दल वहाँ आया हुआ था। दर्शन करके आने पर हमारे यात्री दल के लगभग लोग वहीं मिल गए। गुरुजी को सांभर का मसाला असर कर गया। वे मंदिर परिसर में व्यग्रता से जनसुविधा तलाश करने लगे। एक जवान से पूछने पर उसने जनसुविधा का रास्ता बताया। गुरुजी मुझे कोट थमा कर रफ़ुचक्कर हो गए। थोड़ी देर बाद आराम से पहुंचे, और बताया की गुपचुप का पानी असरदार था।

कृष्ण जन्मभूमी और शाही मस्जिद (गुगल से साभार)
मंदिर परिसर में अन्य तीर्थ स्थलों जैसे मनको-मूर्तियों की दुकाने लगी थी। नए ग्राहक फ़ंस रहे थे जाल में और मुड़ा रहे थे मुड़। मंदिर के आंगन में खड़े होने पर जन्मभूमि की जड़ में बनी हुई मस्जिद भी दिखाई दे रही थी। ऐसा सभी जगहों पर दिखाई देता है, जब मुगलों का शासन रहा तब उन्होने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए हिन्दुओं के तमाम तीर्थ स्थानों पर एक मस्जिद या मजार जरुर बनवा दिया। चाहे अयोध्या हो या काशी विश्वनाथ। काशी विश्वनाथ में तो सिर्फ़ मंदिर की छत को तोड़ कर उसे मस्जिद का रुप दे दिया गया। नीवं और स्तम्भ मंदिर के ही है। चाहे हम कितने भी साम्प्रदायिक सौहाद्र की मिशाल बनने की कोशिश करें पर ऐसे हालात देख कर थोड़ा अटपटा तो लगता है। मंदिर परिसर में कैमरे नहीं ले जाने दिए जाते, अन्यथा आपको चित्र दिखाए जाते। काशी विश्वनाथ मंदिर में भी कैमरे और मोबाईलफ़ोन ले जाने की मनाही है। मंदिर परिसर में ही एक कृत्रिम गुफ़ा बनाई गयी है, इसके दर्शन करने लिए 3 रुपए की टिकिट लेनी पड़ती है।

कृष्ण जन्मभूमि मुख्यद्वार
मंदिर परिसर के रेस्ट हाऊस के समीप ही एक रेस्टोरेंट है, जहां कम कीमत पर अच्छा भोजन मिल जाता है। हमारी चावल खाने की इच्छा थी। क्योंकि मंदिर परिसर में मिले सहयात्रियों ने बताया था कि तपोभूमि में शाम को ही एक घंटे भोजन मिलता है। इसलिए हमने भी बाजार से भोजन करके जाने की सोच ली। गुरुजी एवं पवन वर्मा ने भोजन की अनिच्छा जताई। फ़िर मुझे भी भोजन का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। उसकी जगह 10 रुपए के पानी के पताशे उदरस्थ किए। बकरीद और देवउठनी की भीड़ बाजार में स्पष्ट दिख रही थी। ऑटो सब भरे हुए जा रहे थे। थोड़ी देर बाद हमें भी तपोभूमी के लिए ऑटो मिल गया। तपोभूमि पहुंच कर जल्दी सोना चाहता था। जिससे कुछ सोनागार में वृद्धि हो जाए। दो रात एवं दो दिनों से पूरी नींद नहीं ले पाया था। शरीर थक कर चूर हो गया था और साथ नहीं दे रहा था। तपोभूमि पहुंचने पर पता चला कि नंदकुमार (हमारा दूधवाला) और उसके साथी अभनपुर से सूमो में हरिद्वार जा रहे हैं और पड़ाव के रुप में अभी तपोभूमि पहुंचे हैं। इन्होने भी कमाल किया, 13 लोग सूमों 1400 किलोमीटर का सफ़र किस तरह करके आए होगें? यह समस्या इन पर ही छोड़ी और बिस्तर संभाल कर सोने लगा। 

वृंदा राक्षसी से भय से ग्रसित
निंदिया रानी धीरे-धीरे आगोश में ले रही थी, रात के 12 बज रहे थे।तभी मुझे दीनबंधू मिश्रा ने आवाज दी।"ललित महाराज सुत गेस का?" मुझे जवाब देना पड़ा उठकर। "काय होगे गा?" तो उन्होने कहा कि सांस नहीं आ रही है और छटपटाहट हो रही है और बोले कि "आपके पास ही सो रहा हूँ, कुछ समस्या होगी तो बताऊंगा, कह कर मेरे गद्दे पर ही लेट गए, पंखे के नीचे चित्त। मैने उनसे पूछ कि ठंडा पसीना भी आ रहा है क्या? तो उन्होने मना किया। मुझे थोड़ी तसल्ली हुई। वे लेट गए, लेकिन मेरी नींद का धनिया बो दिया। अब मै करवट बदलता सोच रहा था कि अगर इसे अटैक आ गया तो क्या व्यवस्था करनी पड़ेगी? कौन से अस्पताल पास है, जहाँ जीवन रक्षक सुविधाएं उपलब्ध हैं। वहाँ सीपीआर देते हुए पहुंचा जा सकता है कि नहीं? मै लेटे-लेटे आगे की कार्यवाही करने लगा। नीचे उतर कर आफ़िस में जाकर उन्हे अवगत कराया कि कुछ आकस्मिक दुर्घटना घटने पर कितनी देर में वहाँ सहायता उपलब्ध हो सकती है। संतुष्ट होने पर वापस आकर लेटा। दीनबंधु भैया अपने स्थान पर सोते दिखाई दिए। सहयात्रियों की जिम्मेदारी ने फ़िर नहीं सोने दिया। जैसे तैसे करके सुबह हुई और हमने वृंदा राक्षसी से मिलने जाने का उद्यम किया। आगे पढें
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