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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

बंदरों की ब्लॉगरी मौज

हले भी अयोध्या आया था, तब भी देखा था, अभी भी देखा है, बदला कुछ भी नहीं है, वही विक्रम की सवारी, पहले दो-दो रुपए लेते थे अब 5-5 और 10-10 लेने लगे हैं, लिट्टी चोखा का ठेला, बिड़ला धर्मशाला के समीप होमियोपैथी के डॉक्टर की दुकान, पुलिस चौकी, जलेबी और इमरती की दुकान, सड़क पर घूमते हुए आवारा पशु, गंदगी से बजबजाती हुई नालियाँ। सरयु के तट पर फ़ैली हुई गंदगी, छतरी लगाए पाटे पर बैठे पंडे। हवा के साथ उड़ती हुई पालीथिन की खाली थैलियाँ। चिलम फ़ूंकते साधु वेषधारी असाधु। चेले-चेली मुंडते संत महंत। नगो-पत्थरों की दुकानें, सुग्गा ज्योतिषियों का पसरा, सुरमा बेचते लोग, हरी काई रची पुरानी इमारतें। लोगों का सामान लूटते बंदर। कुछ नहीं बदला है। बदलने की बजाए कुछ जुड़ा है तो एक सायबर कैफ़े,बिड़ला धर्मशाला के समीप। सायबर कैफ़े का मिलना एक ब्लॉगर के लिए सुखद रहा।
यहाँ के बंदरों की तो बात ही मत पूछिए। आँखों से काजल चुराने जैसी बात है। अगर आपका ध्यान कहीं भटका और तनिक असावधान हुए तो आपकी आँखों पर लगा चश्मा भी गायब हो सकता है। आप मुंह फ़ाड़े देखते रह जाएगें।पिछली बार जब हम राम लला के दर्शन करने जा रहे थे, तब जाली वाले गेट के पास एक बंदर ने कमलेश का एक हाथ पकड़ लिया और अपना एक हाथ उसकी पैंट की जेब में डाल दिया। मैं आगे चल रहा था, पीछे से कमलेश आवाज दे रहा था, अंकल-अंकल! मैने पीछे मुड़ कर देखा तो नजारा देखने लायक था। कमलेश के चेहरे से हवाईयाँ उड़ रही थी। बंदर ने उसे काबू में कर रखा था। मैने बंदर को घुड़की थी, मतलब उसकी बोली में समझाया तो उसने कमलेश की जेब में रखी टिकिट की फ़ोटो स्टेट कापी निकाल ली और भाग गया। एक आदमी ने प्रसाद चढाने के लिए हाथ में रखा था, उसे लेकर भाग गए। वह आदमी हड़बड़ा गया। राम लला की सुरक्षा करने के लिए सुरक्षा बल तैनात हैं। एक-एक आदमी की खाना तलाशी लेते हैं। मैटल डिटेक्टर से लेकर मैनुअली भी चेक करते हैं, साथ ही बंदर भी सुरक्षा जांच में अपनी भूमिका निभाते हैं। बची-खुची जाँच ये पूरी कर लेते हैं।

एक व्यक्ति ने कहा कि सुरक्षा बलों की ड्यूटी सरकार ने फ़ालतू ही लगा रखी है। सारी जाँच तो बंदर ही पुरी कर लेते हैं। मजाल है कोई कुछ लेकर भीतर चला जाए। एक बार कोई सायकिल पर टिफ़िन लेकर जा रहा था, बंदर ने उसका टिफ़िन छीन लिया। बंदर द्वारा टिफ़िन छीनते ही वह व्यक्ति सायकिल छोड़कर भाग गया। टिफ़िन खोलने पर उसमें से विस्फ़ोटक पदार्थ निकला। जो सुरक्षा बल नहीं पकड़ पाए, उसे बंदरों ने पकड़ लिया। रामलला का एक अघोषित अदृश्य सुरक्षा घेरा बंदरों का भी है, लगता है जिसे तोड़ पाना किसे के बस की बात नहीं। मेरे सामने ही एक महिला का पर्स ले भागे, पेड़ पर चढ कर उसे फ़ाड़ दिया और उसका सामान एक-एक करके उड़ाते रहे वह महिला सामान बिनती रही। उसके पर्स में रुपए भी थे उसे भी फ़ाड़ कर फ़ेंकते रहे। एक व्यक्ति ने भजनों की सीडी खरीदी थी, वह थोड़ा असावधान हुआ और उसके हाथ की सीडी ले उड़े। चाहे सामान उनके काम का हो या न हो व्यक्ति के असावधान होते ही हाथ मार देते हैं।

हमारे साथ की महिलाएं इन बंदरों से बहुत परेशान थी, काकी के ने आधा किलो सेव लिए थे, उसकी थैली हाथ में धरे थी कि कहीं बैठ कर खाई जाएगी। मंदिर कार्यशाला से आते हुए हम मणिराम दास की छावनी की ओर जाने वाले गली में जैसे ही मुड़े वहां 100 से अधिक बंदरों ने रास्ता घेर रखा था। महिलाएं उस रास्ते पर जाने से डर रही थी, मैने बंदरो को घुड़की दी, हाथ में ले रखी छड़ी से डराया तो पेड़ की डाल पर चढ गए, कोई मुंडेर पर बैठ गया, हम चौकन्ने होकर गली पार करने लगे। काकी ने सेव की थैली पीछे हाथ करके साड़ी में छिपा ली। पता नहीं कहां से एक छोटी सी बंदरिया आई और थैली पर झपट्टा मार कर भाग गयी। काकी देखते ही रह गयी। उसका ध्यान बड़े बंदर पर था पर कमाल छुटकी बंदरिया कर गयी। इनका गिरोह अपने इलाके में रहकर ही वारदात करता है। दुसरे के इलाके में जाने पर इनमें युद्ध भी होता है। कई बंदर तो हाथ-पैर भी गंवा चुके है। पर खाने के लिए उद्यम तो करना ही पड़ता है।

पान ठेले वाले ने बताया कि बंदरों की टोलियाँ पूरे नगर में घूमते रहती हैं। जिसका घर खुला दिखा तो पूरी सेना ही भीतर घुस कर उसे तहस नहस कर देती है। कपड़े भी बाहर सुखाना मुश्किल है। पता नहीं दुबारा मिलेगें कि नहीं। हड़काने पर काट लेते हैं, नोच लेते हैं। बंदरों ने बड़ा आतंक मचा रखा है। यही हाल फ़ैजाबाद नगर का भी है। वहाँ भी बंदरों के आतंक से लोग त्रस्त हैं। बताते हैं कि बंदरों के विरुद्ध 10 हजार शिकायत पत्र फ़ैजाबाद के डीएम के दफ़्तर में जमा हैं, इन शिकायत पत्रों से डीएम का दफ़्तर अटा पड़ा है। जिला अस्पताल में एक महीने में बंदरों द्वारा काटे जाने के सौ-दो सौ मामले आ जाते हैं। लगभग इतने ही मामले प्राईवेट अस्पतालों में जाते हैं। मंदिर-मस्जिद मुद्दे से अधिक बड़ा अयोध्या वासियों के लिए बंदरों से मुक्ति का मुद्दा है। इसके लिए जन अभियान चलाने जैसी योजना भी सामने आ रही है। बताते हैं कि इस इलाके में 20 हजार से अधिक बंदर हैं। इन्हे शहर से अलग बसाने के लिए अभ्यारण्य तैयार करने की मांग उठने लगी है।

भारत में बंदरों के साथ धार्मिक आस्था भी जुड़ी हुई है, इसलिए बंदरों को मारा नहीं जाता, कोई भी इन्हे हानि नहीं पंहुचाता, तभी बजरंग बली की यह सेना बेखौफ़ होकर नगर में लूट-पाट करते फ़िरती है। शहर के बीच-बाजार में कहीं पर भी फ़ल फ़्रूट की दुकान के पास आपको देख कर दांत किटकिटाते मिल जाएगें। स्टेशन पर लगी हुई टीन की चद्दरों पर धमाचौकड़ी करते हुए इनका दल यात्रियों को डराते-सहमाते रहता है। चलती गाड़ी के डिब्बों पर चढ कर करतब दिखाते हैं। यहाँ के निवासियों को तो बंदरों के कारनामे झेलने की आदत पड़ गयी है, पर बाहर से आने वाले दर्शनार्थियों से इनका मिलना त्रासदी पूर्ण ही है। कुछ लोगों की पेट रोजी ये बंदर ही चला रहे हैं। लोगो ने बंदरों का दाना बेचने की दुकाने खोल रखी हैं जहाँ से खरीद कर श्रद्धालु इन्हे भक्ति भाव से खिलाते हैं। पर बंदर आखिर बंदर ठहरे, अपनी आदतों से बाज नहीं आते। बंदरों को भी ब्लॉगरी मौज लेने की आदत पड़ गयी है। पहले तो चलते आदमी को छेड़ते हैं,फ़िर उसके खिसियाने पर पेड़ की डाल पर बैठ कर दांत निपोरते हुए मौज लेते हैं। यही सलाह है कि  बंदरों बच के रहें तभी सही है अन्यथा बंदर तो ...........।
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पिशाच मोचन इमरती और लिट्टी-चोखा

में जो ऑटो वाला मिला था वह बहुत अच्छा आदमी था, उसने हमें भरत कुंड पहुंचाया, मैने उसे सबके लिए चाय बनवाने कहा और हम मंदिर दर्शन के लिए चल पड़े। मंदिर में पहुचने पर एक जगह लिखा था "भरत गुफ़ा" । बताया गया कि यहाँ भरत जी ने गुफ़ा में रहते थे। कहते हैं कि राम-भरत मिलाप के पश्चात भरत खड़ाऊं लेकर फैजाबाद मुख्यालय से 15 कि. मी. दक्षिण स्थित भरतकुंड नामक स्थान पर चौदह साल तक रहे। भरत कुंड एक ग्राम है जिसे नंदीग्राम कहा जाता है। इस मंदिर से लगा हुआ एक मंदिर और भी वहां भी भरत गुफ़ा बनी हुई  है। हमारे एक साथी ने दोनों गुफ़ाओं के विषय में पूछा तो पुजारी ने कहा कि कुछ नगद दिखाओगे तभी जानकारी बाहर निकलेगी। मुफ़त मे कुछु नही मिलेगा। पूछने वाला भी तेली था, न उसने नगद दिए और न पुजारी ने जानकारी उगली। तभी एक बोलेरो वाला मंदिर के गेट को ठोक कर सपाटे से भाग निकला। उसकी स्पीड इतनी थी कि वह कहीं भी दुर्घटना कर सकता था। उसके साथ बालाघाट के दर्शनार्थी थे, उनकी बोली से लग रहा था। 

भरत कुंड
यहां से लगा हुआ ही एक कुंड हैं जहाँ  हर साल चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को मेला लगता है। मान्यता है कि इस सरोवर में स्नान से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। कुंड कई एकड़ में फ़ैला हुआ है, जलकुंभी ने कुंड पर कब्जा कर रखा है, और बंदरों ने आतंक फ़ैला रखा है,  किसी के भी हाथ में जो कुछ दिखा उसे झपट्टा मार कर ले ही जाना है। हमारा इरादा पाप नष्ट करने का नहीं था, अभी कल ही तो सरयू स्नान कर सारे पाप धो लिए थे। पाप नाशक स्नान को मैं कम्पयुटर के एन्टीवायरस प्रोग्राम से ही जोड़ कर देखता हूं, एक बार स्केन याने स्नान कर लो फ़िर सारे पापरुपी वायरस का सफ़ाया हो जाता है। "न सौ काशी न एक पिचाशी।" इन्हीं किंवदंतियों के बीच नंदीग्राम का एतिहासिक पिशाची मेला चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को बदस्तूर जारी है। कुंड से वापस आकर हमने होटल में चाय पी, चाय पीने वाले कम थे और चाय अधिक हो गयी थी, होटल वाले ने 3 चाय वापस लेने से मना कर दिया, प्रताप ने दो चाय ली और मैने भी, मामला फ़िट हो गया।चाय वापस नहीं करनी पड़ी।

भरत कुंड के यात्री
नंदीग्राम भरतकुंड पिशाची के बारे में दो तरह की किंवदंतिया हैं पहली यह कि लंका में युद्ध के दौरान जब मेघनाद के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे तो हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने भेजा गया था। बूटी की पहचान न होने के कारण वह पहाड़ उठाकर ही लंका की ओर चल पड़े। जब वे अयोध्या के ऊपर से जा रहे थे तो कुछ देर के लिए समूचे क्षेत्र में अंधकार छा गया। आसमान की ओर देखने पर किसी दानव शक्ति द्वारा अयोध्या पर आक्रमण किए जाने की आशंका में भरत जी ने बाण चला दिया। बाण लगने के कारण हनुमान जी पर्वत समेत गिर गए थे। पुजारी हनुमान दास कहते हैं कि जिस स्थान पर हनुमान जी गिरे थे वहां कुंड बन गया था। उसी को पिशाच मोचन कुंड के नाम से जाना जाता है। दूसरी किंवदंती है कि लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ब्रह्मा हत्या के पाप से मुक्त होने से लिए पिशाच मोचन कुंड में स्नान किया। इस कारण पिशाच मोचन कुंड की मान्यता है कि न सौ काशी न एक पिशाची।

मणि पर्वत का शिलालेख
अब यहाँ से हम वापस चल पड़े अयोध्या की ओर, ऑटो चालक से पूछ कि बीच में और कुछ दर्शनीय स्थल हो तो वह भी दिखा दे। तो उसने बताया की रास्ते में मणिपर्वत मिलेगा। मैने कहा कि - मणिपर्वत चलो, वहीं तुम्हारा भाड़ा भी सकेल कर दे देगें। वह तैयार हो गया। हम मणिपर्वत पहुंचे। एक ऊंचा सा टीला है जिसपर मंदिर बना है, यहां के पुजारी ने बताया कि जब सीता जी जनकपुरी से वापस आई थी तब यहीं पर मणियों का पर्वत बना कर सीता जी झूले में झुलाया गया था। यहाँ प्रतिवर्ष सावन मेला लगता है, जिसमें अयोध्या के साते देवी देवता झूला झूलने आते हैं यह उत्सव 12 दिन चलता है। इस उत्सव के लिए प्रशासन सारी व्यवस्था करता है। मेले में लाखों श्रद्धालु सावन झूला पर्व मनाने  आते हैं। यह स्थान भारतीय पुरातत्त्व के संरक्षण में है। इस मंदिर में कई शंख रखे हैं, जिनमें एक शंख को पांच्जन्य शंख भी बताया गया है।

दीवारों पर वाल्मीकि रामायण
मणि पर्वत के दर्शन कर के हम मणिराम की छावनी पहचें। वाल्मीकी रामायण मंदिर भी खुल चुका था।  वाल्मीकी रामायण भवन का निर्माण मंहत नृत्यगोपाल दास जी ने कराया था। 1956 में प्रारंभ होकर दस वर्षों में इसका निर्माण 1966 में पूर्ण हुआ, यहां दुनिया का अनोखा रामायण बैंक है, यहां अभी तक 164 अरब से अधिक राम नाम जमा हो चुके हैं।इस बैंक का नाम है 'अंतरराष्ट्रीय श्री राम नाम बैंक।' इस बैंक में राम नाम जमा कराने पर ब्याज भले ही न मिलता हो मगर सच्चा आनंद अवश्य मिलता है। अंतरराष्ट्रीय श्री राम नाम बैंक की स्थापना वर्ष 1963 में अयोध्या में नृत्य गोपालदास महाराज द्वारा की गई थी। गाजियाबाद में इसकी शाखा की स्थापना प्रख्यात संत व कथावाचक डोंगरे जी महाराज ने घंटाघर स्थित रामलीला मैदान में आयोजित श्रीमद्‍भागवत कथा के दौरान की थी। आज इस बैंक की देश-विदेश में मिलाकर 125 से अधिक शाखाएँ हैं। गाजियाबाद के हनुमान मंदिर में इसकी 42वीं शाखा है।

पाञ्चजन्य शंख
बैंक में खाता खोलने के लिए किसी कागजात की नहीं बल्कि राम नाम की जरूरत है। बच्चे, युवा, बुजुर्ग, महिला या पुरुष कोई भी, किसी भी भाषा में सवा लाख सीताराम या राम नाम लिखकर बैंक में अपना खाता खोल सकता है। इतना ही नहीं, जो भक्त नियमित रूप से राम नाम लिखता है, वह बैंक का स्थायी सदस्य बन जाता है और उसे बैंक की तरफ से पास बुक व सदस्यता प्रमाण पत्र भी दिया जाता है। एक करोड़ राम नाम लिखने वाले भक्त को स्वर्ण पदक, पचास लाख राम नाम लिखने वाले को रजत पदक व 25 लाख राम नाम लिखने वाले को काँस्य पदक से सम्मानित किया जाता है। 25 वर्ष की आयु में ही 15 लाख नाम लिखने पर भी काँस्य पदक मिलता है। राम नाम लिखने के लिए वैसे तो बैंक से ही कॉपी मिलती है मगर निजी कापी या डायरी आदि में भी राम नाम लिखकर बैंक में जमा कराया जा सकता है। राम नाम लिखी कॉपियों को अयोध्या स्थित 'श्री वाल्मीकि रामायण भवन' में सुरक्षित रखा गया है। 

गरमा गरम इमरती
रामायण भवन से दर्शन करके हम पुन: उसी रास्ते पर निकल पड़े, रास्ते में एक दर्जी अंगरखा सील रहा था, एक साधु अंखरखे का ट्रायल ले रहा था, मेरे भी मन में एक अंगरखा डोरी वाला सिलाने की आई, लेकिन देर हो चुकी थी। अगर यह दर्जी सुबह दिख जाता तो शाम तक अंगरखा तैयार हो सकता था। अब समय नहीं था, अंगरखा सिलाने की अधुरी इच्छा को फ़िर कभी पर टाल कर आगे बढे, मुख्य मार्ग पर आने तब जोर की भूख लग चुकी थी। एक होटल में गर्मागरम इमरती बन रही थी। लालच आ ही गया, क्या करुं कंट्रोल ही नहीं होता। साथियों से पूछ कि नास्ता करना है क्या? सभी ने न में जवाब दिया, मैं होटल में पहुंचा, इमरती सौ रुपए किलो थी, होटल का नाम सौरभ होटल, एक पाव इमरती ली, एक पाव में 10-12 इमरतियाँ तो चढ गयी। तीना चार इमरतियाँ होटल में  ही खड़े-खड़े उदरस्थ की, बाकियों को थैली में बंद करके आगे बढे, मुझे इमरतियाँ लेते देख कर दो चार साथियों ने भी खरीदी। मैने सभी से खाने के विषय में पूछा तो उन्होने सभी का खाना गायत्री मंदिर में बनना बताया। सबको लेकर जब गायत्री मंदिर पहुंचा तो देखा कि वहां कुछ लोगों का ही खाना बन रहा है। अब मेरी बात न मानने की सजा भुगतो। कह कर मैं बिरला धर्मशाला की ओर बढ लिया।

गुगल सर्च इंजन पर ललित शर्मा
रास्ते में दो जगह लिट्टी चोखा मिल रहा था। एक जगह तली हुई बाटी थी, आलू के साग के साथ, दूसरी जगह भुनी हुई बाटी दिखाई दी। मैने दोनो ले ली। अब खाने की जरुरत नहीं थी इनसे ही काम चल जाएगा। रास्ते में सुबह वाला सायबर कैफ़े दिखाई दिया। फ़िर क्या था? घुस गए सायबर कैफ़े में। सायबर कैफ़े के संचालक ने आईडी मांगी। आई डी कार्ड सब मेरे बैग में पड़े थे, मैने कहा कि गुगल पर मेरा नाम सर्च के देखिए। जब उसने हिन्दी में "ललित शर्मा" सर्च किया तो 3 सेकंड में ढाई लाख से उपर लिंक दिखाई दिए और जैसे ही इमेज सर्च की तो सैकड़ो फ़ोटो मेरी सर्च इंजन ने निकाल कर धर दी। उसे देखकर संचालक ने कहा कि "अब आपकी आई डी की जरुरत नहीं है, आप तो गुगल में सर्वत्र व्यापक हैं। चलाईए इंटरनेट, ब्लॉगिंग का यह फ़ायदा हुआ। अब पहचान पत्र रखने की आवश्यकता नहीं है। हमारी पहचान गुगल पर स्थापित हो चुकी है। कैफ़े से मेल आदि चेक किए और ब्लॉग पर दो फ़ोटो लगा कर अपने रुम में पहुचा। पंकज का चेतन भगत से पीछा नहीं छूटा था, कह रहा था कि बड़ा बोरिंग उपन्यास है, उपन्यास का नाम मैं भूल रहा हूँ। दोनो ने लिटी चोखा खाया इमरती के साथ और मैं आम्रपाली के सपनों में खो गया।-- आगे पढें
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अरे! मारिए दू चार गदा इनको

सुबह का नाश्ता
प्रारंभ से पढें
रात खूब सोना बनाया, मन-तन की थकान दूर हो गयी थी। चिड़ियों की चहचहाट सुनाई दे रही थी, बाहर बरामदे में गौरैया फ़ुदक रही थी। बरामदे में ही कुर्सी डालकर बैठा, चाय वाला भी आ गया। मैने कहा कि डबल चाय चाहिए, रात की खुमारी उतराने के लिए। काफ़ी दिनों से स्नान के लिए गर्म पानी नहीं मिला, ठंडे पानी से ही हर हर गंगे कर रहे थे। आज भी कोई चांस नहीं था गर्म पानी मिलने का। हवा में थोड़ी ठंडक थी, पर नहाना ही था। कभी-कभी नहाना भी बड़ी मजबुरी बन जाता है। डबल चाय ने राहत दी, इंजन गर्म हो गया, अब ठंडे पानी का कोई खास असर नहीं होने वाला था। चलो नहा लिया जाए, गायत्री मंदिर में साथी प्रतीक्षा कर रहे थे। पंकज भी तैयार हो चुका था, हम गायत्री मंदिर की ओर चल पड़े। आज नाश्ते में सिर्फ़ दही और केला खाया। सुबह - सुबह दही केले की ही दरकार थी, आधे दर्जन केले दही के साथ पेट के हवाले किए और पंकज ने चने और मुंग लिए। आगे बढे तो एक स्थान पर सायबर कैफ़े दिख गया। वापस आकर यहीं डेरा डालने का इरादा बना। राम लला के दर्शन करने वालों की कतार लगी थी। हमें तो गायत्री मंदिर जाना था.

कनक भवन में सामुहिक फ़ोटो
गायत्री मंदिर पहुंचने पर देखा कि सभी साथी तैयार हो गए हैं और अग्निहोत्र भी सम्पन्न हो चुका है। कहने लगे चलिए अब किधर चलना है? जिधर रास्ता जाता है उधर ही चलना है, कम से कम अयोध्या की गलियों को तो घूम कर देखा जाए। यहां घूमने के लिए तो लोग किराया भाड़ा खर्च करके आते हैं। पैदल - पैदल हम लोगों का दल निकल पड़ा दर्शन को। सबसे पहले रास्ते में आया कनक भवन। बड़ा ही सुंदर बना है, कहते हैं कि ब्याह कर आने के बाद सीता जी को माता कैकयी ने उपहार स्वरुप यह महल दिया था। यह भवन सीता एवं श्री राम जी का निज भवन माना जाता है, यहाँ इन दोनो के अतिरिक्त किसी तीसरे की मूर्ति स्थापित नहीं है। स्वर्ण आभा भवन आलोकित हो रहा था, ऐसा लग रहा था कि सोने का ही बना हो। 

दशरथ महल
किवदंती है कि कनक भवन 5 कोस में बना था। इसकी भव्यता देखते ही बनती थी। वर्तमान में बना हुआ कनक भवन 300 साल पुराना है, इसे ओरछ स्टेट मध्यप्रदेश की महारानी ब्रृजभानि कुंवरी ने ईश्वरीय प्रेरणा से बनवाया था और ऐसा ही एक मंदिर ओरछा में भी बनवाया। मंदिर के प्रांगण में हमने स्मृति स्वरुप एक सामुहिक चित्र भी लिया। ताकि सनद रहे वक्त जरुरत पर काम आवे। कनक भवन से आगे हनुमान गढी की तरफ़ आने पर राजा दशरथ का महल पड़ता है। इस महल के सामने दुकान एवं होटल वालों का कब्जा है, यत्र-तत्र गंदगी बिखरी हुई थी। हम दशरथ जी का महल देखने पहुंचे। आरती हो रही थी, आरती के बाद कुछ देर बैठकर साथियों ने वहां कीर्तन किया,"श्रीराम जय राम जय जय राम, सीता राम मनोहर जोड़ी, दशरथ नंदन जनक किशोरी"। कीर्तनोपरांत बाहर आए तो मंदिर परिसर में ही। 

सुग्गे की भवि्ष्यवाणी
सुग्गा भविष्य बता रहा था। मुझे सुग्गे की फ़ोटो की जरुरत थी, इसलिए पंकज को फ़ोटो लेने का ईशारा करके सुग्गे वाले से भविष्य दिखाने लगा। 5 रुपए में एक कार्ड निकलवा रहा था। मुझे देख कर और भी साथी भविष्य जानने लग गए। सुग्गे वाले पहले मेरा नाम पूछा और फ़िर सुग्गे ने मेष राशि का कार्ड निकाल दिया। सब हाथ की सफ़ाई का कमाल था। उसने 12 राशियों  के कार्डों पर अलग अलग पहचान चित्र बना रखे थे, चिड़िया को पिंजरे से निकाल कर उसके सामने 4-5 कार्ड ले जाता था, वह उस लिफ़ाफ़े से कार्ड नहीं निकालती थी। जिस कार्ड के सामने काले रंग ला टेप लगा था उसे ही चिड़िया निकालती थी, मैने यही ध्यान से देखा। सबकी पेट रोजी लगी है, सभी का अपना अपना धंधा है।

कार्ड निकालता सुग्गा
मैने कार्ड निकलवाए तो साथियों ने भी देखा देखी निकलवाने शुरु कर दिए,चौरसिया जी, नीरु, गणेशु, सुखचंद यादव एवं अन्य लोगों ने भी सुग्गे से कार्ड निकलवाए, सुखचंद जी के कार्ड में भविष्य में होने वाली कुछ समस्या निकल आई , चश्मा न होने के कारण उन्होने अपना कार्ड देवयानी चंद्राकर से पढ कर सुनाने कहा। भविष्यवाणी उनकी पत्नी ने भी सुन लिया। वह बोली - (तेखरे सेती त मैं मना करत रहेवं, अब भुगत तैंहा, आनी-बानी के गोठ बतावत हे) इसीलिए तो मैं मना कर रही थी, अब देखो सब गड़बड़ भविष्य बता रहा है। सुनते ही सुखचंद जी का पारा चढ गया - मैं तो कमावत हंव न, तोला काय परे हे, चुप राह" (मैं तो कमा रहा हूँ, तेरे क्या लेना देना! चुप रह) अगर वह चुप न होती तो वहीं दोनो में फ़ायटिंग हो जाती और तीन तलाक की नौबत आ जाती, सुग्गे की भविष्यवाणी सच हो जाती।

ठग्गु के लड्डू
दशरथ महल से दर्शन करने के बाद हनुमान गढी की ओर बढे, पंकज फ़ोटो लेने में मशगूल था, हमने लड्डू लिए और पुन: लाल लंगोटे वाले के दरबार में पहुंच गए। "जय बजरंग बली की, साथियों ने जयकारा लगाया। मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए 76 पैड़ियों से जाना पड़ता है, कहते हैं कि हनुमान जी यहीं गुफ़ा में रहते थे, अब गुफ़ा तो कहीं नजर नहीं आती पर बालरुप में हनुमान जी, माता अंजनी सहित विराजमान हैं। देशी घी का छौंक और विलायती घी के लड्डू इन्हे बहुत रास आ रहे हैं। देशी के नाम  पर विलायती घी के लड्डू बेच कर दुकानदार माला माल हुई जा रहे हैं। डालडा घी के लड्डूओं को देशी घी का बता कर दावे से बेचा जा रहा है। धड़ल्ले से लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

हनुमान गढी का मुख्य द्वार
हमने बजरंग बली से विनती की। आप नगर  के कोतवाल हैं, भगवान ने आपको अयोध्या में रहने के लिए स्थान दिया है। कैसी भर्राशाही चल रही है? पूरा अयोध्या गंदगी से बजबजा रहा है, जहाँ देखो वहीं मल,शौच कचरा पड़ा हुआ है। घर का कचरा लोग सड़क पर ही डाल देते हैं, कहीं भी हगो-मूतो। जितना रुपया देश से अयोध्या के नाम पर लिया गया, अगर उसका एक प्रतिशत ही यहाँ लगा देते तो बाहर से आए दर्शनार्थियों को शर्मिन्दा नहीं होना पड़ता। जरा देखिए वीर हनुमान, इन्हे भी सुधारिए, लंका के रावण को तो सुधार दिया था, इन्हे कब सुधारेगें? आपकी नाक के नीचे ही ठगी-फ़ुसारी का खेल चालु है। अरे! मारिए दू-चार गदा इनको। तभी तो सुधरेगें, लूटम-लूट मचाए हुए हैं। चारों तरफ़ गंदगी फ़ैला रखी है। अयोध्या नगरी का बैंड बजा रखा है। लगता है कि आप अपना हिस्सा पाकर चुप बैठ जाते हैं, कलजुग की बीमारी आपको भी लग गयी। अब टंकी अनशन होगा तभी आपको कुछ सुनाई देगा। नहीं तो आपके खिलाफ़ भी आर टी आई लगाना पड़ेगा।:)

देवयानी चंद्राकर अपना भविष्य बंचवाते सुखचंद यादव
हनुमान गढी से हमें कार्यशाला देखने जाना था जहां पर मंदिर के पत्थरों की घड़ाई हो रही थी। अब यहाँ से हमारा दल दो भागों में बंट गया। आधे इधर गए, आधे उधर गए, बाकी मेरे पीछे आए। हनुमानग़ढी से हम बिरला मंदिर आए, लेकिन मंदिर के पट बंद मिले। दोपहर भी हो रही थी, वहीं सिंधी के होटल में हमने भोजन किया, लगभग 50 लोग तो होंगे ही, महिलाओं की संख्या अधिक थी। होटल वाला भी एक बार में 50 ग्राहक पाकर गद-गद हो गया। दोपहर के भोजन में मैने मीठा दही और रोटियाँ ली। भूख कस के लगी हुई थी, बेरोकटोक रोटियाँ भीतर जाने लगी, बिना टोल टेक्स पटाए ही। तंदूर वाले ने स्पीड पकड़ ली। पर सभी छत्तीसगढिया चावल ही खाने के मुड में थे।

बड़ी भूक लगी है
मदन साहू ने पूछा कि 35 रुपए की थाली में क्या-क्या देते हैं? बैरा ने बताया कि दो रोटी, हाफ़ चावल, दो सब्जी औए एक दाल, अचार, सलाद मिलेगा। मदन लाल जी का पेट एक थाली में भरने वाला नहीं था, उसने पूछ ही लिया कि "एक बार देगें कि मांगने पर दुबारा भी मिल जाएगा? दुबारा लेने पर एक्स्ट्रा चार्ज लगेगा, बैरे ने कहा। मन मसोस कर मदन साहू ने भी आर्डर दे दिया। सभी लोग भोजन करते में एक डेढ घंटा लग गया। अपने-अपने भोजन के रुपए सभी ने अलग-अलग दिए, यहाँ भी समस्या 500 के नोट के खुल्ले की थी। हरिद्वार से अयोध्या तक बड़ी मुस्किल से 500 के नोट के खुल्ले मिले। पता नहीं आज कल लोग 500 और 1000 के नोटों से इतना क्यों घबराने लगे हैं। सहज कोई लेने को ही तैयार नहीं होता। 

मंदिर के लिए शिला तराशते शिल्पकार और हमारा दल
फ़िर एक बार चल पड़े कार्यशाला की ओर। कार्यशाला रामघाट मार्ग पर बनी हुई है। रास्ते में दोनो तरफ़ गंदगी का आलम इधर भी दिखाई दिया, नालियाँ बजबजा रही थी, मुंह पर कपड़ा रख कर चलना पड़ा। रास्ते में जैन मंदिर और घर्मशाला भी देखी। अंत में कार्यशाला पहुचें,यहां 1992 में भारत के कोने कोने से आई रामशिलाएं भी रखी हुई हैं। मंदिर के पत्थरों की गढाई हमारे आने से 15 दिन पहले ही शुरु हुई थी। इस आशय का समाचार अखबारों में पढा था। कुछ राजस्थान के शिल्पकार लाल पत्थरों पर पत्थरों पर कढाई कर रहे थे। मंदिर के लिए सामग्री निर्माण का कार्य विगत 3-4 वर्षों से बंद था। यहाँ पर मंदिर का माडल भी रखा हुआ है। जिससे हमें मंदिर की विशालता का अंदाज लग जाता है। एक जगह रुक कर जिज्ञासु साथियों साथ प्रश्नोत्तरी भी हुई, उनके प्रश्नों के जवाब भी दिए। मुफ़्त का गाईड सभी को अयोध्या भ्रमण करा रहा था।

मणिराम की छावनी
कार्यशाला से निकल कर संकरी गलियों से होते हुए हम मणिराम की छावनी पहुंचे। छावनी के सामने ही वाल्मिकी भवन है, जहां दीवालों पर संगमरमर पत्थर में उकेरी हुई सम्पूर्ण वाल्मीकी रामायाण प्रदर्शित है। दोपहर का समय होने के कारण इसके पट बंद मिले। हम मणिराम की छावनी में प्रवेश किए। पहले यहां महंत नृत्यगोपाल दास जी थे, तीन साल पहले उनका देहावसान हो गया, उनकी जगह दूसरे महंत हो गए हैं। महंत जी भी सोए हुए थे। इस मंदिर में एक स्तम्भ पर ताम्रपत्र पर सम्पूर्ण गीता उकेरी हुई है। यह ताम्रपत्र स्तम्भ पर लगे हुए हैं। हमने कुछ देर यहां आराम किया, कुछ साथी यहाँ से आराम करने गायत्री मंदिर जाना चाहते और कुछ घूमना चाहते थे। हम मणिराम की छावनी से चलकर मुख्य मार्ग पर आ गए। वहाँ महिलाओं ने कुछ खरीददारी की, जुगल साहू के चिरंजीव ने कहा कि अब भरत कुंड चला जाए। अयोध्या भरत कुंड लगभग 15 किलोमीटर है। दर्शन नगर होते हुए जाना पड़ता है। एक आटो वाले को पूछने पर उसने एक तरफ़ का किराया 800 रुपए बताया, हमने उसे जाने दिया, दुसरा आया, उसने प्रति सवारी 20 रुपए जाने का कहा, हमें यह किराया जंच गया। तो उसे वापसी के लिए भी तय कर लिया। 20 रुपए में जाना और 20 रुपए में आना। हम 14 लोग ऑटो में सवार होकर भरत कुंड की तरफ़ चल पड़े। जारी है........। आगे पढें
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अयोध्या में कीमियागर

मुस्कुराईए कि आप लखनऊ में हैं :)))
मारे सभी साथी लखनऊ घूमने का मन बनाए बैठे थे। नामदेव जी और हमने तय किया कि अयोध्या चलते हैं। वहीं डेरा डालते हैं, 4/40 पर एक लोकल ट्रेन लखनऊ से फ़ैजाबाद के लिए चलती है 8 नम्बर प्लेटफ़ार्म से। जब हम जाने लगे तो 6 लोग और हमारे साथ हो लिए। सभी ने लोकल ट्रेन में डेरा डाल लिया। 20 रुपए की टिकिट अलग से लेनी पड़ी। हम 9 बजे लगभग फ़ैजा बाद पहुंच गए। फ़ैजाबाद से अयोध्या ले जाने का ऑटो वाले 10 रुपए लिया। हमें चौक पर छोड़ कर चला गया। यहाँ सुबह से ही रेला लगा हुआ था कार्तिक पूर्णिमा स्नान करने वालों का। सोचा कि आज बिड़ला धर्मशाला में जगह नहीं मिलेगी। जब बिड़ला धर्मशाला पहुंचे तो वहां एक मैनेजर मिले। उनसे रुम के लिए बात की। बड़ी देर बाद उन्होने जवाब दिया और एक बंदे को पहली मंजिल पर रुम दिखाने भेजा। रुम तो छोटा था, पर हमें तो अभी अपना सामान रख कर सरयू स्नान करना था, इसलिए जो मिल गया वही ठीक समझा।
मुंडन के बाद नाश्ता
नामदेव जी ने कहा कि अयोध्या आए है और कार्तिक पुर्णमासी का अवसर है, इसलिए मुंडन भी साथ-साथ करा लिया जाए। मुझे तो कुछ देर आराम करने की इच्छा हो रही, इसलिए मोबाईल चार्जिंग में लगा कर लेट गया। नामदेव जी कह गए की बांए हाथ की पहली नाऊ दूकान में मिलुंगा। थोड़ी देर आराम करके मैं और पंकज भी निकले। लेकिन नामदेव जी कहीं नहीं मिले। मुझे एक सेलून दिखाई दिया। मैं वहीं टिक गया और पंकज को नामदेव जी को ढूंढने भेज दिया। अब किस्सा सुनिए अयोध्या के नाऊ की दूकान का। उसने पूछा कि कितने वाली दाढी बनाएगें? मैने कहा कि दाढी बनवाने के भी अलग-अलग रेट हैं? हाँ, 10,20,50 वाली। ये क्यों? उसने शेविंग क्रीम दिखाई, 10 से 50 तक वाली। मैने कहा कि 5 रुपए में बिना शेविंग क्रीम के ही रगड़ दो। वो बोला दाढी? हमने कहा - मूड़। बोला- 5 में नहीं बनेगा। 10 की दाढी बनेगी और 20 में मुंडन होगा। गजब है यार, हमारे यहाँ तो 20 रुपए में दोनो काम हो जाता है। ह्म्म, अयोध्या के नाऊ हो, इतना तो हक बनता है राम की नगरी में।
आलु टिक्की का आनंद
उसने उस्तुरा उठा लिया और हमने मुड़ झुका दिया। चला लो जिधर तुम्हारा मन करे। उसने मुंडन किया और दाढी बनाई, हम 30 रुपए थमा कर कृतार्थ हुए। पंकज पहुंचा, बोला-पापा नहीं मिले। चलो आगे मिल जाएगें, हमने सीधा रास्ता पकड़ लिया। बाजार में रेलम पेल थी, पुर्णमासी स्नान के साथ मेला भी लगा हुआ था। अमरुद, सिंघाड़ा, मुरमुरा, मिठाई, चाट, फ़ुलकी की दूकाने सजी हुई थी मुख्यमार्ग पर सरयू तक। रास्ते में तुलसी उद्यान के पास एक चाट के ठेले पर डेरा डाल लिया। भूख जोरों से लगी हुई थी। कुछ खा लिया जाए तो आगे बढा जाए, अन्यथा भूख के मारे जान जाने का खतरा मंडरा रहा था। चाट वाले को दो टिकिया बनाने कहा। सर पर धूप चमक रही थी, सर मुंडाते ही ओले तो नहीं पड़े पर टकले पर धूप कहर ढा रही थी। इसलिए थोड़ी सी छाया की व्यवस्था के लिए उसके ठेले की छांव में आ गए। चाट का मसाला उम्दा था। दो चम्मच खाते ही समझ आ गया। दो दोने और बनाने का आडर दे दिया फ़टाफ़ट क्योंकि सरयू  तक भी पैदल मार्च करना था। चाट के तीन दोने उदरस्थ कर हम दोनो आगे बढे।
अयोध्या का मुख्य मार्ग
नर-नारी अपने बाल-गोपाल और परिजनों के साथ सरयू की ओर सरपट जा रहे थे। कुछ स्नानादि से वापस आ रहे थे, आने जाने वाले का रेला चल रहा था। अयोध्या पुलिस भी ड्युटी में लगी थी। माईक पर खोया पाया पुकार हो रही थी। हम तिराहे पर पहुचे तो वहाँ एक पंडाल लगा था जिसमें लोग स्वयं आकर ही पुकार लगा रहे थे, अपने खोए परिजनों को स्थान और पता ठिकाना बता रहे थे। लो जी सरयू तट आ गया, पहले भी कई बार आ चुके थे। लेकिन सरयू स्नान नहीं किया था। यहां घाट पर सरयू के पानी में रेत बहता है। इसलिए मन नहीं हुआ, पानी के छींटे मार कर निकल लिए। लेकिन अब स्नान की ठान चुके थे। पंडे अपने-अपने पाटे लगाए जजमानों की टोह में लगे थे। फ़ूल और बाती वाले 5 रुपए में एक दोना दे रहे थे। पानी में उतरा तो वह ठंडा था, सांस बंद करके एक डुबकी लगाते ही कुछ ठंड दूर हुई, शरीर का उष्मातंत्र जागृत हुआ, उसके बाद कई डुबकियाँ लगाई और अपने को धन्य समझा कि सरयू स्नान हो गया। अगर कोई कभी पूछेगा तो मैं भी कह सकूंगा कि सरयू स्नान किया था कभी।
सरयू तीरे यत्र तत्र पालिथिन 
घाट के रास्ते में भिखारियों ने अपने टाट बिछा रखे थे, कोई सांप लेकर बैठे थे तो कोई पूजा सामग्री। नदी तट पर प्लास्टिक की थैलियाँ बिखरी हुई थी। प्रदूषण फ़ैलाने समस्त कारक नदी के तीर पर बिखरे पड़े थे। किसी को प्रदूषण की चिंता नहीं। हम वापस चले, पंकज कुछ फ़ोटो ले रहा था। माईक पर सूचनाएं जारी थी, मेले की सूचनाओं का आनंद आ रहा था। एक कह रहा था .... दौलत के माई तोहार हम ईंहा इंतजार करित हैं, जहाँ-कहीं भी पुलिस चौकी के सामने चली आव।... लाल बहादूर जहाँ कहीं भी हैं, सुन रहे हो तो यहाँ आएं या जहाँ रात को रुके थे वहाँ पहुंचे। यहाँ हम आपका इंतजार कर रहे हैं। एक महिला कह रही थी ....... झांझन के बाबू जहाँ कहीं भी चले आओ, हम तुम्हारा इंतजार पुल पे कर रहे है। बहुत देर से हम तुम्हे ढूंढ रहे हैं, नहीं आए तो हम घर चली जाएगें ........  सुनील भाई नारायाण भाई, हम बहुत परेशान है। जहाँ कहीं भी हो चले आओ।........ राम दूलारे चले आओ चौकी के पास हम तोहार इंतजार करित हैं ........ नानु के बाबू चले आओ हम कब से आपको ढूंढत हई, चौकी मा हम अगोरत हंई।........ परिजनों से भीड़ भाड़ में बिछड़े परेशान-हलकान लोग उद्घोषणा के द्वारा सम्पर्क बनाने की कोशिश कर रहे थे।
चलते चलो
हमने भी सोचा कि नामदेव जी के लिए उद्घोषणा कर दी जाए ........ जहाँ कहीं भी हो बिड़ला धर्मशाला के रुम 35 में चले आओ, हम तोहार इंतजार करित हैं। मन में उद्घोषणा चल रही थी। बिना बिजली खर्च करे ही उन तक हमारा संदेश पहुंच गया। रास्ते में केले का भाव पूछा तो 30 रुपए दर्जन बताया, कुछ केले लिए और खाते हुए बिड़ला धर्मशाला तक पहुंच गए। स्नान-ध्यान और मुंडन के पश्चात भोजन करके सोने की घनघोर इच्छा थी। बिड़ला धर्मशाला के सामने एक सिंधी का होटल है। वहाँ अरवा चावल मिलता है, चावल भी अच्छी क्वालिटी का था। छत्तीसगढिया कई दिनों से चावल से दूर था। बढिया चावल देख कर वहीं डेरा जमाया। 35 रुपए थाली में अच्छा भोजन मिला, साथ में 20 रुपए प्लेट दही का। पंकज और मैं खाना खाकर धर्मशाला पहुंचे। मैने तो बिस्तर संभाल लिया और पंकज चेतन भगत के पीछे पड़ गया, बोला इसे खत्म करके ही मानुंगा। हमारे और भी साथी स्नान करके आ चुके थे उन्होने बरामदे में बिस्तर लगा लिए और सो गए।
पंकज - हनुमान गढी में
शाम को 5 बजे करीब फ़ोन बजने से नींद खुली। देखा तो महफ़ूज मियां का फ़ोन था, वो मुझे उलाहना दे रहे थे कि रात भर स्टेशन में ढूंढता रहा, आप मिले ही नहीं, नौ बजे घर आकर सोया। आपका मोबाईल भी बंद था। मैं मुस्कुराता रहा, लगता है कि हम दोनो ही एक दूसरे को ढूंढ रहे थे। फ़िर मिलन के वादे के साथ हमने फ़ोन को विराम दिया। घर फ़ोन लगा कर श्रीमती जी मुंडन की सूचना दी तो भड़क उठी- अकारण मुंडन कराने की क्या जरुरत थी। अभी कई शादियों में जाना है और आपने मुंडन करा लिया। हमने कहा कि शादियों में जाने के लिए विग बनवा लुंगा और नहीं बनी तो शादियों में जाना स्थगित कर देगें। कौन सी हमारे गए बिना किसी की शादी रुक जाएगी? उसे तो होना ही है, उनके जवाब से पहले ही फ़ोन बंद कर गहरी सांस ली, अब आगे की होगा रब्ब जाणे, मूड़ तो मूड़ा लिए, ओले तो पड़ेगें। झेल लेगें, अब टकले पर भी। नामदेव जी लौट आए थे, उन्होने बताया कि बाकी साथी रात की गाड़ी से लखनऊ से लौट रहे हैं। उनकी गाड़ी आठ बजे आएगी और उनके रुकने की व्यवस्था गायत्री मंदिर में कर आए हैं। चलो अच्छा किया आपने वर्ना हम तो चलने की ही स्थिति में नहीं थे।
हनुमान गढी के सामने लड्डू की दुकान
शाम को तैयार होकर हम फ़िर घुमने निकले, हनुमान गढी की ओर। हनुमान गढी में लाल लंगोटे वाले महाबीर से मिलना था। बहुत बरस हो गए थे उनसे मिले। हमारा संकट तो वही दूर करते हैं। भूत-पिशाचों से दूर रखते हैं। "संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा" हनुमान गढी के समीप लड्डूओं की दुकाने लगी हैं चारों तरफ़। रात को लड्डू और फ़ूल माला लेकर पहुंच गए महावीर की शरण में। वहाँ उनके सामने बाबाजी प्रवचन कर रहे थे। दर्शन करके हमने कुछ देर प्रवचन सुना। फ़िर गायत्री मंदिर की खोज में निकले। कनक भवन के आगे गायत्री मंदिर है। वहाँ के विशाल प्रांगण में रुकने के लिए कमरे बने हुए थे। हमारे साथी 18 नम्बर कमरे में मिले। एक माता जी ने उन्हे भोजन लाकर दिया, मैने कुछ सिंघाड़े खाए, पंकज कहीं गायब हो गया था। फ़र्श पर बिछी जाजम पर लेटते ही दूसरी दुनिया में पहुंच गया। थकान ने कहीं का नहीं छोड़ा था। किसी की आवाज से आँख खुली तो पता चला कि 11 बज चुके हैं। हमारे साथी लखनऊ से लौट आए हैं। उन्हे लाने वाले ऑटो में बैठकर स्टेशन पहुंचा तो चौरसिया जी खड़े थे स्टेशन में। उनके साथ फ़िर ऑटो की सवारी की और बिड़ला धर्म शाला के सामने उतर गया। बिड़ला धर्मशाला स्टेशन से 5 मिनट के पैदल रास्ते पर है। दरवाजा खुला था, अपने रुम में पहुंचा तो पंकज लोटम लोट हुआ जा रहा था चेतन भगत के साथ, लेकिन मुझे तो सोना बनाना था, कीमियागर जो ठहरा।  जारी है……आगे पढें…। 

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