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सोमवार, 23 अप्रैल 2012

अनवरत रामलीला और ददुवा राजा का महल

बिड़ला मंदिर की घंटियों की आवाज से नींद खुली, मंदिर की घंटियों की आवाज से नींद का टूटना, अच्छा लग रहा था। कमरे की पिछली खिड़की से रोशनी आ रही थी। मच्छर न होने के कारण रात को चैन की नींद आयी। रात चैन की नींद आए तो आने वाली सुबह खुबसूरत हो जाती है, थकान उतरने के बाद की ताजगी चाय की भाप की खुश्बू के साथ बढ जाती है। पंकज तैयार हो रहा था, हमें आज घर की ओर चलना है, नौतनवा एक्सप्रेस सवा दो बजे मिलेगी, जो हमें सीधे ही अयोध्या से रायपुर तक पहुंचा देगी। पंकज की इच्छा अयोध्या में घुमने की थी, मेरे मन में रुम चेक आऊट कर सामान सहित सायबर कैफ़े में बैठने की। जीत पंकज के ईरादों की ही हुई, हम स्नान कर के पुन: अयोध्या की गलियों का खाक छानने निकल पड़े। कल हमने अयोध्या शोध संस्थान का बोर्ड एक जगह लगे देखा था। पंकज भी वहीं जाना चाहता था।

रास्ते में  हमें एक महल दिखाई दिया, इस महल का सिंह द्वारा बड़े की कलात्मक रुप से बनाया गया था। कैमरे के लैंस में सिंह द्वार का त्रिआयामी स्वरुप दिख रहा था। सिंहद्वार पर काई जम चुकी है, लगता है बरसों से साफ़ सफ़ाई और चूना पुताई नहीं हुई है, एक घड़ी भी सिंह द्वार पर लगी  है। घड़ी अभी बंद है, लेकिन इसे देख कर लगता है कि इसकी रौनक किसी जमाने में रही होगी। जब अयोध्या नगरी को इससे ही समय की सूचना मिलती होगी। यह महल किसका है, इसका मुझे पता नहीं था और इसके विषय में सुना भी नहीं था, लेकिन इस महल का प्रांगण काफ़ी बड़ा है तथा भीतर रिहायश भी है। महल के सिंहद्वार के सामने खैनी घिसते हुए युपी पुलिस के नौजवान मिले। पूछने पर उन्होने बताया कि यह "ददुवा राजा" का महल है, हमें तो बस इतना ही पता है। हमें भी इसके विषय में अधिक जानकारी देने वाला कोई नहीं मिला। (अगर किसी ब्लॉगर मित्र को इसके विषय में जानकारी है तो टिप्पणी के माध्यम से अवगत कराएं)

ददुवा राजा के महल से हम अयोध्या शोध संस्थान की ओर चल पड़े, हमें पता चला था कि यह 11 बजे खुलता है। हम भी 11 बजे ही वहाँ पहुंचे, पोर्च में दो सज्जन धूप सेक रहे थे, हमने उनसे पूछा कि - शोध संस्थान के विषय में जानकारी लेनी है तो उन्होने भीतर जाने का ईशारा कर दिया। भीतर पहुंचे तो संग्रहालय और पुस्तकालय दिखाई दिया। पुस्तकालय में कुछ लोग अखबार पढ रहे थे और कुछ लोग अपने मतलब की किताबें मनन कर रहे थे (बांचने की सुविधा नहीं है:) एक महिला झाड़ू लगा रही थी, पंकज ने एक मुर्ती की फ़ोटो खींचनी चाही तो उसने चिल्ला कर कहा -" फ़ोटु खींचना मना है, जानते नहीं का, आप काहे फ़ोटो ले रहे हैं?" शायद पंकज नहीं जानता था। वैसे सभी जगह के संग्रहालयों में चित्र लेना मना है, चित्र लेने के लिए संग्रहालय के निदेशक या इंचार्ज की अनुमति की आवश्यकता होती है। भीतर पहुंचने पर संग्रहालय के इंचार्ज मानस तिवारी जी से भेंट हुई। उनसे संग्रहालय और शोध संस्थान के विषय में विस्तार से चर्चा हुई।

चर्चा के दौरान उन्होने बताया कि इस भवन में तीन ईकाइ हैं, 1- राम कथा शोध संस्थान, 2- संग्रहालय, 3- पुस्तकालय। यहाँ पर उत्त्खनन में पाई जाने वाली मुर्तियों का पंजीकरण किया जाता है इसके साथ ही उनका संरक्षण एंव दस्तावेजीकरण भी किया जाता है। रामकथा से संबंधित शोध सामग्री, पाण्डुलिपियाँ, वैदिक संस्कृत साहित्य यहाँ के पुस्तकालय में उपलब्ध हैं जिसका उपयोग शोध के लिए होता है। इस संस्थान की अयोध्या में शुरुवात 1988 में हुई थी और इसका मुख्य उद्देश्य राम के संदर्भ में मिलने वाली सभी सामग्रियों  का संरक्षण, दस्तावेजीकरण, एवं प्रदर्शन करना है। समय समय पर यहां कार्यशालाओं का भी आयोजन किया जाता है। विश्व के 22 देशों में रामकथा का प्रचार प्रसार हैं। विदेशों से प्राप्त रामकथा संदर्भ सामग्री भी यहां उपलब्ध है, कम्बोडियाई रामायण के पात्रों का भी यहाँ प्रदर्शन किया गया है।

महत्वपुर्ण बात यह है कि विगत साढे छ: वर्षों से यहाँ प्रतिदिन अनवरत राम लीला का आयोजन हो रहा है। राम लीला नित शाम 6 से9 बजे तक होती है। इसकी जानकारी हमें नहीं थी अन्यथा रामलीला का आनंद लेते। मानस तिवारी ने बताया कि सम्पुर्ण भारत से साल भर के लिए रामली्ला मंडलियों को बुक कर लिया जाता है। एक मंडली 15 दिनों तक अपनी प्रस्तूति देती है। राम जन्म से लेकर राज्याभिषेक तक राम लीला का प्रदर्शन होता है। सतना की रामलीलाओं की उन्होने काफ़ी बड़ाई की। छत्तीसगढ से शायद ही किसी राम लीला मंडली ने अयोध्या में अपना प्रदर्शन किया होगा। रामलीला मंडलियों को प्रदर्शन करने का मेहनताना प्रतिदिन 5000 रुपए दिए जाता हैं। यह एक अच्छा प्रयास लगा। लेकिन इसकी जानकारी बाहर से आने वाले दर्शनार्थियों को होनी चाहिए। इसके प्रचार प्रसार के लिए स्टेशन एवं बस स्टैंड में फ़्लेक्स बेनर लगाए जाने चाहिएं।

संग्रहालय में शुंग एवं कुषाण काल के पुरावशेष प्रदर्शित हैं। राम जन्म भूमि के उत्खनन से प्राप्त तीनों चरणो के पुरावशेष भी हैं। यहां राम वन गमन मार्ग की चित्रावलियाँ प्रदर्शित की गयी है। इन चित्रों भगवान ने जहां भी गए हैं उसे दिखाया गया है। मानस तिवारी ने बताया कि दिल्ली के रामअवतार शर्मा जी ने इस पर बहुत काम किया है।  भगवान राम की दो यात्राओं का जिक्र उन्होने अपनी प्रदर्शनी में किया है। 1- विश्वामित्र के साथ जनकपुर जाकर धनुष यज्ञ से लौटने तक, 2- 14 वर्ष के वन गमन एवं लंका विजय करने तक। रामअवतार शर्मा जी ने सभी प्रदेशों से गुजरते हुए यहां की मिट्टी एकत्र कर उससे राम चरण चिन्ह बनाकर स्थापित किए हैं। मानस तिवारी ने हमें संग्रहालय के बाहर लगी मुर्तियों एवं चित्रों की फ़ोटो लेने की छूट दे दी। हमने कुछ चित्र लिए। उन्होने आगंतुक पुस्तिका में मुझे अपने विचार दर्ज करने कहा। मैने भी आधा पृष्ठ टीप दिया और हम वापस बिड़ला धर्मशाला की ओर चले। मैं सायबर कैफ़े से मेल चेक करने लगा और पंकज गायत्री मंदिर की ओर चला गया।

1 बजे पंकज वापस आया, हमने धर्मशाला का कमरा छोड़ा 150 - रुपए प्रतिदिन के हिसाब से दक्षि्णा जमा कराई, मैनेजर कुछ काईयाँ किस्म का लगा, सबसे 100 रुपए ले रहा था और हमसे 150 सौ रुपए लिए, एवं उसकी रसीद भी नहीं दी। जय बिड़ला से्ठ की, पता नहीं कितने ऐसे ही पल रहे हैं भगवत कृपा से। हम अपना सामान लेकर 11 नम्बर की सवारी से स्टेशन चल पड़े, हमारे अन्य साथी भी ऑटो से पहुंच रहे थे। चौरसिया जी स्टेशन के बाहर खड़े होकर किसी भुले बिसरे को ढूंढ रहे थे। नौतनवा एक्सप्रेस थोड़ी विलंब से आई, लेकिन सही आई, अयोध्या में मात्र 2 मिनट का ही ठहराव है, इतने कम समय में सवा सौ सवारियों का मय सामान चढना कमाल ही है। ट्रेन चलते ही किसी ने ट्रेन की हवा खोल दी, गाड़ी फ़िर रुक गयी, जो न चढे होगें वो भी चढ लिए। अयोध्या नगरी को प्रणाम कर एवं स्वागत सत्कार करने वालों को धन्यवाद देकर हम चल पड़े अपने गंतव्य की ओर।

भजन मंडली ने भजन गाने शुरु कर दिए। हम भी साथ में रम गए, बंछोर जी गाने लगे "हमने आंगन नहीं बुहारा, कैसे आएगें सांवरिया" आंगन बुहारने के बाद निमंत्रण देना था सांवरिया को, पहले ही दे आए अब भुगतो। बंछोर जी की बेटी ने भी एक दो भजन गाए। समय कटने लगा सिमरन के साथ। तभी एक छोटा सा बच्चा भी अपनी माँ से पीछा छुड़ाकर मेरे पास पहुंचा और गोदी में बैठने के लिए हाथ बढाए, कमाल हो गया भाई, यहाँ तो मुहल्ले के सारे बच्चे मेरी गाड़ी की आवाज सुनकर घर के भीतर घुस जाते हैं। इस बच्चे ने बड़ी हिम्मत की। वह भी भजन सुनने लगा और डफ़ली की ताल में मुड़ हिलाने लगा। काफ़ी देर तक मेरी गोद में बैठा रहा, अधिक देर होने पर बच्चे को उसकी माँ के पास छोड़कर आया। बच्चे भगवान का रुप होते हैं, निश्छल और निर्विकार। स्वामी जी टिकिट चेक कराते घूम रहे थे। नौतनवा एक्सप्रेस से मैं पहले भी अयोध्या आ चुका हूँ, छत्तीसगढ से यही एक मात्र गाड़ी है जो अयोध्या पहुंचाती है।

सुबह पेंड्रारोड़ के आस-पास नींद खुली। स्वामी जी मौन थे, बस हाथ और उंगली के ईशारे से काम चला रहे थे। दुनिया चाँद पर पहुंच कर मंगल पर जाने की तैयारी कर रही है और ये पुन: पाषाण युग में जा रहे हैं। इनकी कथा तो अकथ है अगर लिखने लगुं तो दो चार पुस्तकें लिखी जा सकती है। जब से मुड़ मुड़ाए हैं तब से ज्ञान का सागर ही उमड़ आया है। साबुन एवं शेविंग क्रीम का उपयोग नहीं करते। पैंट-पैजामा की जगह धोती पहनकर घुमते हैं। शेविंग क्रीम की जगह छाछ का उपयोग करते हैं। सप्ताह में दो दिन अस्वाद भोजन करते हैं। प्रतिदिन आठ बजे तक मौन रहते हैं। बीमार होने पर एलोपैथिक दवाई का उपयोग नहीं करते और जब कहीं माईक मिल जाता है तो बस मत पूछिए, सुनने वाला थककर सो जाएगा ये चुप नहीं होते, बिजली बंद करने पर भी बिना माईक के चालु रहते हैं। निराली ही आत्मा है। सुबह सुबह भाभी जी ने इन्हे खड़का दिया "हमें ये सब ढोंग धतुरा पसंद नहीं है, जैसे थे वैसे ही रहिए" अब कहां से वैसे रहेगें, आपने तो इन्हे कहीं का नहीं छोड़ा, जब ये सब सांसारिक बुराईयों को छोड़ चुके हैं तो कह रही हैं कि पहले जैसे नहीं रहे, बदल गए हैं, मैने भाभी जी से कहा।

बिलासपुर पहुचने पर स्टेशन पर नाश्ता किया, इडली का ठेला लगा था, साथ ही उसने ब्रेड आमलेट भी रखा था, स्वामी जी आमलेट उठाकर ठेले वाले पूछने लगे, ये क्या है? मुझे हँसी आ रही थी। ठेले वाले के बताने पर उन्होने तीन बार हाथ धोए और एक बार मुंह धोया। "राम राम ये सब भी रखते हैं, शाकाहारी के साथ।" अरविंद झा भी पहुंच गए स्टेशन पर, उनके साथ चाय पीकर गपशप होने लगी। बहुत दिनों में मुलाकात हुई उनसे। जब हम बिलासपुर आने की सोचते हैं तो ये दरभंगा पहुंच जाते हैं। स्वामी जी एक मंडली को प्रवचन दे रहे थे तम्बाखु, शराब, गुड़ाखु एवं अन्य नशा करने वाली वस्तुओं का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इससे शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक हानि होती है। तेजराम, संतोष, इत्यादि प्रवचन सुन रहे थे, अरविंद ने भी हां में हां मिलाई।

फ़ोटो गुगल से साभार
स्वामी जी के पीठ फ़ेरते ही, तेजराम ने कहा कि-"सुनो सबकी करो अपने मन की, ओखर कहे ले थोड़ी छूट जाही, हमर मन के बात सुन डरेन ओखरो। मुझे तेजराम की कमीनीपतीं पर हंसी आ रही थी, स्वामी जी का पूरा एक घंटा खराब करवा दिया।ट्रेन चल पड़ी, अरविंद से विदा ली, शीघ्र ही फ़िर मिलने का वादा किया, रायपुर स्टेशन पहुंच चुके थे। सभी ने अपने-अपने घर जाने की व्यवस्था कर ली थी। मैं और गिलहरे गुरुजी सिटी बस में सवार होकर जोरा के लिए चल पड़े, भगवान को धन्यवाद दिया, सवा सौं लोगों के साथ 9 दिन की यात्रा करके सही सलामत घर पहुंच गए, कहीं बीमारी, हारी, चोरी, चकारी नहीं हुई, किसी की शारीरिक और मानसिक हानि नहीं हुई। सभी स्वस्थ और सानंद अपने परिजनों से मिल रहे थे। जोरा से हम अपनी गाड़ी लेकर घर पहुंचे।नेट शुरु करते ही सूचना मिली कि बाला साहब ठाकरे की पोती का विवाह हो गया है।
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अरे! मारिए दू चार गदा इनको

सुबह का नाश्ता
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रात खूब सोना बनाया, मन-तन की थकान दूर हो गयी थी। चिड़ियों की चहचहाट सुनाई दे रही थी, बाहर बरामदे में गौरैया फ़ुदक रही थी। बरामदे में ही कुर्सी डालकर बैठा, चाय वाला भी आ गया। मैने कहा कि डबल चाय चाहिए, रात की खुमारी उतराने के लिए। काफ़ी दिनों से स्नान के लिए गर्म पानी नहीं मिला, ठंडे पानी से ही हर हर गंगे कर रहे थे। आज भी कोई चांस नहीं था गर्म पानी मिलने का। हवा में थोड़ी ठंडक थी, पर नहाना ही था। कभी-कभी नहाना भी बड़ी मजबुरी बन जाता है। डबल चाय ने राहत दी, इंजन गर्म हो गया, अब ठंडे पानी का कोई खास असर नहीं होने वाला था। चलो नहा लिया जाए, गायत्री मंदिर में साथी प्रतीक्षा कर रहे थे। पंकज भी तैयार हो चुका था, हम गायत्री मंदिर की ओर चल पड़े। आज नाश्ते में सिर्फ़ दही और केला खाया। सुबह - सुबह दही केले की ही दरकार थी, आधे दर्जन केले दही के साथ पेट के हवाले किए और पंकज ने चने और मुंग लिए। आगे बढे तो एक स्थान पर सायबर कैफ़े दिख गया। वापस आकर यहीं डेरा डालने का इरादा बना। राम लला के दर्शन करने वालों की कतार लगी थी। हमें तो गायत्री मंदिर जाना था.

कनक भवन में सामुहिक फ़ोटो
गायत्री मंदिर पहुंचने पर देखा कि सभी साथी तैयार हो गए हैं और अग्निहोत्र भी सम्पन्न हो चुका है। कहने लगे चलिए अब किधर चलना है? जिधर रास्ता जाता है उधर ही चलना है, कम से कम अयोध्या की गलियों को तो घूम कर देखा जाए। यहां घूमने के लिए तो लोग किराया भाड़ा खर्च करके आते हैं। पैदल - पैदल हम लोगों का दल निकल पड़ा दर्शन को। सबसे पहले रास्ते में आया कनक भवन। बड़ा ही सुंदर बना है, कहते हैं कि ब्याह कर आने के बाद सीता जी को माता कैकयी ने उपहार स्वरुप यह महल दिया था। यह भवन सीता एवं श्री राम जी का निज भवन माना जाता है, यहाँ इन दोनो के अतिरिक्त किसी तीसरे की मूर्ति स्थापित नहीं है। स्वर्ण आभा भवन आलोकित हो रहा था, ऐसा लग रहा था कि सोने का ही बना हो। 

दशरथ महल
किवदंती है कि कनक भवन 5 कोस में बना था। इसकी भव्यता देखते ही बनती थी। वर्तमान में बना हुआ कनक भवन 300 साल पुराना है, इसे ओरछ स्टेट मध्यप्रदेश की महारानी ब्रृजभानि कुंवरी ने ईश्वरीय प्रेरणा से बनवाया था और ऐसा ही एक मंदिर ओरछा में भी बनवाया। मंदिर के प्रांगण में हमने स्मृति स्वरुप एक सामुहिक चित्र भी लिया। ताकि सनद रहे वक्त जरुरत पर काम आवे। कनक भवन से आगे हनुमान गढी की तरफ़ आने पर राजा दशरथ का महल पड़ता है। इस महल के सामने दुकान एवं होटल वालों का कब्जा है, यत्र-तत्र गंदगी बिखरी हुई थी। हम दशरथ जी का महल देखने पहुंचे। आरती हो रही थी, आरती के बाद कुछ देर बैठकर साथियों ने वहां कीर्तन किया,"श्रीराम जय राम जय जय राम, सीता राम मनोहर जोड़ी, दशरथ नंदन जनक किशोरी"। कीर्तनोपरांत बाहर आए तो मंदिर परिसर में ही। 

सुग्गे की भवि्ष्यवाणी
सुग्गा भविष्य बता रहा था। मुझे सुग्गे की फ़ोटो की जरुरत थी, इसलिए पंकज को फ़ोटो लेने का ईशारा करके सुग्गे वाले से भविष्य दिखाने लगा। 5 रुपए में एक कार्ड निकलवा रहा था। मुझे देख कर और भी साथी भविष्य जानने लग गए। सुग्गे वाले पहले मेरा नाम पूछा और फ़िर सुग्गे ने मेष राशि का कार्ड निकाल दिया। सब हाथ की सफ़ाई का कमाल था। उसने 12 राशियों  के कार्डों पर अलग अलग पहचान चित्र बना रखे थे, चिड़िया को पिंजरे से निकाल कर उसके सामने 4-5 कार्ड ले जाता था, वह उस लिफ़ाफ़े से कार्ड नहीं निकालती थी। जिस कार्ड के सामने काले रंग ला टेप लगा था उसे ही चिड़िया निकालती थी, मैने यही ध्यान से देखा। सबकी पेट रोजी लगी है, सभी का अपना अपना धंधा है।

कार्ड निकालता सुग्गा
मैने कार्ड निकलवाए तो साथियों ने भी देखा देखी निकलवाने शुरु कर दिए,चौरसिया जी, नीरु, गणेशु, सुखचंद यादव एवं अन्य लोगों ने भी सुग्गे से कार्ड निकलवाए, सुखचंद जी के कार्ड में भविष्य में होने वाली कुछ समस्या निकल आई , चश्मा न होने के कारण उन्होने अपना कार्ड देवयानी चंद्राकर से पढ कर सुनाने कहा। भविष्यवाणी उनकी पत्नी ने भी सुन लिया। वह बोली - (तेखरे सेती त मैं मना करत रहेवं, अब भुगत तैंहा, आनी-बानी के गोठ बतावत हे) इसीलिए तो मैं मना कर रही थी, अब देखो सब गड़बड़ भविष्य बता रहा है। सुनते ही सुखचंद जी का पारा चढ गया - मैं तो कमावत हंव न, तोला काय परे हे, चुप राह" (मैं तो कमा रहा हूँ, तेरे क्या लेना देना! चुप रह) अगर वह चुप न होती तो वहीं दोनो में फ़ायटिंग हो जाती और तीन तलाक की नौबत आ जाती, सुग्गे की भविष्यवाणी सच हो जाती।

ठग्गु के लड्डू
दशरथ महल से दर्शन करने के बाद हनुमान गढी की ओर बढे, पंकज फ़ोटो लेने में मशगूल था, हमने लड्डू लिए और पुन: लाल लंगोटे वाले के दरबार में पहुंच गए। "जय बजरंग बली की, साथियों ने जयकारा लगाया। मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए 76 पैड़ियों से जाना पड़ता है, कहते हैं कि हनुमान जी यहीं गुफ़ा में रहते थे, अब गुफ़ा तो कहीं नजर नहीं आती पर बालरुप में हनुमान जी, माता अंजनी सहित विराजमान हैं। देशी घी का छौंक और विलायती घी के लड्डू इन्हे बहुत रास आ रहे हैं। देशी के नाम  पर विलायती घी के लड्डू बेच कर दुकानदार माला माल हुई जा रहे हैं। डालडा घी के लड्डूओं को देशी घी का बता कर दावे से बेचा जा रहा है। धड़ल्ले से लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

हनुमान गढी का मुख्य द्वार
हमने बजरंग बली से विनती की। आप नगर  के कोतवाल हैं, भगवान ने आपको अयोध्या में रहने के लिए स्थान दिया है। कैसी भर्राशाही चल रही है? पूरा अयोध्या गंदगी से बजबजा रहा है, जहाँ देखो वहीं मल,शौच कचरा पड़ा हुआ है। घर का कचरा लोग सड़क पर ही डाल देते हैं, कहीं भी हगो-मूतो। जितना रुपया देश से अयोध्या के नाम पर लिया गया, अगर उसका एक प्रतिशत ही यहाँ लगा देते तो बाहर से आए दर्शनार्थियों को शर्मिन्दा नहीं होना पड़ता। जरा देखिए वीर हनुमान, इन्हे भी सुधारिए, लंका के रावण को तो सुधार दिया था, इन्हे कब सुधारेगें? आपकी नाक के नीचे ही ठगी-फ़ुसारी का खेल चालु है। अरे! मारिए दू-चार गदा इनको। तभी तो सुधरेगें, लूटम-लूट मचाए हुए हैं। चारों तरफ़ गंदगी फ़ैला रखी है। अयोध्या नगरी का बैंड बजा रखा है। लगता है कि आप अपना हिस्सा पाकर चुप बैठ जाते हैं, कलजुग की बीमारी आपको भी लग गयी। अब टंकी अनशन होगा तभी आपको कुछ सुनाई देगा। नहीं तो आपके खिलाफ़ भी आर टी आई लगाना पड़ेगा।:)

देवयानी चंद्राकर अपना भविष्य बंचवाते सुखचंद यादव
हनुमान गढी से हमें कार्यशाला देखने जाना था जहां पर मंदिर के पत्थरों की घड़ाई हो रही थी। अब यहाँ से हमारा दल दो भागों में बंट गया। आधे इधर गए, आधे उधर गए, बाकी मेरे पीछे आए। हनुमानग़ढी से हम बिरला मंदिर आए, लेकिन मंदिर के पट बंद मिले। दोपहर भी हो रही थी, वहीं सिंधी के होटल में हमने भोजन किया, लगभग 50 लोग तो होंगे ही, महिलाओं की संख्या अधिक थी। होटल वाला भी एक बार में 50 ग्राहक पाकर गद-गद हो गया। दोपहर के भोजन में मैने मीठा दही और रोटियाँ ली। भूख कस के लगी हुई थी, बेरोकटोक रोटियाँ भीतर जाने लगी, बिना टोल टेक्स पटाए ही। तंदूर वाले ने स्पीड पकड़ ली। पर सभी छत्तीसगढिया चावल ही खाने के मुड में थे।

बड़ी भूक लगी है
मदन साहू ने पूछा कि 35 रुपए की थाली में क्या-क्या देते हैं? बैरा ने बताया कि दो रोटी, हाफ़ चावल, दो सब्जी औए एक दाल, अचार, सलाद मिलेगा। मदन लाल जी का पेट एक थाली में भरने वाला नहीं था, उसने पूछ ही लिया कि "एक बार देगें कि मांगने पर दुबारा भी मिल जाएगा? दुबारा लेने पर एक्स्ट्रा चार्ज लगेगा, बैरे ने कहा। मन मसोस कर मदन साहू ने भी आर्डर दे दिया। सभी लोग भोजन करते में एक डेढ घंटा लग गया। अपने-अपने भोजन के रुपए सभी ने अलग-अलग दिए, यहाँ भी समस्या 500 के नोट के खुल्ले की थी। हरिद्वार से अयोध्या तक बड़ी मुस्किल से 500 के नोट के खुल्ले मिले। पता नहीं आज कल लोग 500 और 1000 के नोटों से इतना क्यों घबराने लगे हैं। सहज कोई लेने को ही तैयार नहीं होता। 

मंदिर के लिए शिला तराशते शिल्पकार और हमारा दल
फ़िर एक बार चल पड़े कार्यशाला की ओर। कार्यशाला रामघाट मार्ग पर बनी हुई है। रास्ते में दोनो तरफ़ गंदगी का आलम इधर भी दिखाई दिया, नालियाँ बजबजा रही थी, मुंह पर कपड़ा रख कर चलना पड़ा। रास्ते में जैन मंदिर और घर्मशाला भी देखी। अंत में कार्यशाला पहुचें,यहां 1992 में भारत के कोने कोने से आई रामशिलाएं भी रखी हुई हैं। मंदिर के पत्थरों की गढाई हमारे आने से 15 दिन पहले ही शुरु हुई थी। इस आशय का समाचार अखबारों में पढा था। कुछ राजस्थान के शिल्पकार लाल पत्थरों पर पत्थरों पर कढाई कर रहे थे। मंदिर के लिए सामग्री निर्माण का कार्य विगत 3-4 वर्षों से बंद था। यहाँ पर मंदिर का माडल भी रखा हुआ है। जिससे हमें मंदिर की विशालता का अंदाज लग जाता है। एक जगह रुक कर जिज्ञासु साथियों साथ प्रश्नोत्तरी भी हुई, उनके प्रश्नों के जवाब भी दिए। मुफ़्त का गाईड सभी को अयोध्या भ्रमण करा रहा था।

मणिराम की छावनी
कार्यशाला से निकल कर संकरी गलियों से होते हुए हम मणिराम की छावनी पहुंचे। छावनी के सामने ही वाल्मिकी भवन है, जहां दीवालों पर संगमरमर पत्थर में उकेरी हुई सम्पूर्ण वाल्मीकी रामायाण प्रदर्शित है। दोपहर का समय होने के कारण इसके पट बंद मिले। हम मणिराम की छावनी में प्रवेश किए। पहले यहां महंत नृत्यगोपाल दास जी थे, तीन साल पहले उनका देहावसान हो गया, उनकी जगह दूसरे महंत हो गए हैं। महंत जी भी सोए हुए थे। इस मंदिर में एक स्तम्भ पर ताम्रपत्र पर सम्पूर्ण गीता उकेरी हुई है। यह ताम्रपत्र स्तम्भ पर लगे हुए हैं। हमने कुछ देर यहां आराम किया, कुछ साथी यहाँ से आराम करने गायत्री मंदिर जाना चाहते और कुछ घूमना चाहते थे। हम मणिराम की छावनी से चलकर मुख्य मार्ग पर आ गए। वहाँ महिलाओं ने कुछ खरीददारी की, जुगल साहू के चिरंजीव ने कहा कि अब भरत कुंड चला जाए। अयोध्या भरत कुंड लगभग 15 किलोमीटर है। दर्शन नगर होते हुए जाना पड़ता है। एक आटो वाले को पूछने पर उसने एक तरफ़ का किराया 800 रुपए बताया, हमने उसे जाने दिया, दुसरा आया, उसने प्रति सवारी 20 रुपए जाने का कहा, हमें यह किराया जंच गया। तो उसे वापसी के लिए भी तय कर लिया। 20 रुपए में जाना और 20 रुपए में आना। हम 14 लोग ऑटो में सवार होकर भरत कुंड की तरफ़ चल पड़े। जारी है........। आगे पढें
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ब्लॉगर सबसे बड़ा मौन का साधक

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सुबह जब सो कर उठे तो सुरज की किरणें कनात की झिरियों से आकर मुंह पर पड़ रही थी। रात नदी की रेत पर ही अच्छी नींद आयी। काफ़ी साथी लोग नहा धोकर तैयार हो गए थे। मौनी बाबा आदतन मौन थे, ये तो सिर्फ़ दो घंटे ही मौन रहते हैं। ब्लॉगर तो जब तक कम्पयुटर पर रहता है तब तक मौन रहता है। ब्लॉगर से बड़ा साधक कौन है? सारी विद्याएं ही हैं जैसे त्राटक (एक टक मानीटर को देखना) मौन, धारणा, ध्यान, समाधि। वैसे ब्लॉगर को ॠषि तुल्य ही मानना चाहिए। ॠषि का कार्य है कि गुरुओं से मिले हुए ज्ञान को प्रचारित एवं प्रसारित करना। यही काम ब्लॉगर भी मनोयोग से कर रहे हैं। आँख खुली ही थी कि तुरकने जी ने एक विषय छेड़ दि्या और हमने पकड़ लिया। सुबह-सुबह ही एक घंटे का लेक्चर हो गया। अब तैयार होना था, हरिद्वार में तो कल से अफ़रातफ़री का माहौल था।

भगदड़ की घटनाओं को लेकर अफ़वाहों का बाजार गर्म था। जो वहां नहीं था वह भी प्रत्यक्षदर्शी बना हुआ था। कोई कह रहा था कि आतंकवादी घुस गए थे। कोई कह रहा था कि पुलिस वालों ने भगदड़ मचा दी तो कोई कह रहा था कि दंगा हो गया। गंगा तीर से स्नान कर आई महिलाओं ने बताया कि वहां स्नान कर रही दो महिलाएं कह रही थी कि वे यज्ञशाला में थी। वहां यज्ञ की अग्नि में एक महिला जल गयी और उन्होने अपनी आँखों से देखा है। मैने कहा कि इतना बड़ा झूठ, उनकी कनपटी में बजाना था दो, तुम लोग सुन कर कैसे आ गयी। भीड़ की अधिकता से भगदड़ में 16 लोगों के मृत होने की सूचना अवश्य आ रही थी। किसी वृद्ध के बेहोश होकर गिरने के बाद भगदड़ मची। जिसे धुंए की अधिकता से बेहोश होना बताया जा रहा है। उसमें ही लोग घायल हुए हैं और कुछ मरे हैं। पता नहीं लोगों को अफ़वाह फ़ैला कर क्या मिलता है? अफ़वाहें ही सारा माहौल खराब करती है और इन पर लगाम लगाना किसी के बस का नहीं।

भगदड़ होने का एक कारण मेरी समझ में आया कि इतनी भीड़ को संभालना प्रशासन के बस की बात नहीं। स्वअनुशासन की आवश्यकता होती है। ऐसा भी नहीं है कि गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं में अनुशासन की कमी है। पर अधिक भीड़ लाने के चक्कर में कुछ सैलानी भी मात्र घूमने एवं देखने चले आए। इसके कारण अनुशासन कायम नहीं रह सका। भीड़ को कोई नहीं संभाल सकता। गायत्री परिवार का आयोजन उम्दा था। किसी संस्थान के द्वारा किया गया आज तक का सबसे बड़ा आयोजन था। कुंभ में भी सरकार करोड़ों रुपए खर्च करके ऐसा आयोजन नहीं कर सकती, यह तो मानना ही पड़ेगा। भीड़ के कारण कुंभ में भी भगदड़ मची है। नासिक कुंभ इसका ताजा तरीन उदाहरण है। वहाँ भी भगदड़ में काफ़ी लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। हादसों को रोका जाना चाहिए, भीड़ पर नियंत्रण न होने के कारण हादसे होते हैं।

हमारे कुछ साथी चंडी देवी मंदिर और कुछ शांतिकूंज जाना चाहते है। पर मैने अपना रुख अडिग रखा, क्योंकि हमारी ट्रेन 2.40 बजे दोपहर को थी। अगर भीड़ के कारण ट्रेन निकल गयी तो हरिद्वार में ही हरे राम भजना पड़ता। मैने हांका लगा दिया कि जिसको भी स्टेशन चलना है वह मेरे साथ चले। पैदल ही जाना होगा क्योंकि कहीं पर भी सवारी मिलने की संभावना नहीं है और मुसीबतों का एकमात्र पुल भी पार करना है। आधे सहयात्री मेरे साथ चलने को तैयार हो गए। हम अपना सामान लाद कर गौरीशंकर के यात्री स्वागत पंडाल तक पहुंच गए। वहाँ रुक कर साथियों का इंतजार किया। सभी के साथ आने पर गंगा को प्रणाम करके हम आगे बढ गए। महिलाओं ने अपना बैग सिर पर रख लिया। क्योंकि आज तो लगभग 10 किलोमीटर के अधिक चलना था। इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं था।

कुछ मास्टरिन भी साथ थी, रास्ते में कहती थी -"रेंगत नई बनत हे महाराज, सुखियार होगे हन गा", तो मैं कहता - "आज तो सुखियारी चले नहीं, रेंगे ला परबेच करही। धीरे बांधे चलव, टैम में पहुंच जाबो।" कुछ साथियों को ऑटो मिल गए, पर ऑटो वालों का पुल पर प्रवेश बंद था, वे भी हमें पुल पर ही इंतजार करते मिले। कुछ महिलाओं ने रास्ते में एक रिक्शा किया 50 रुपए में, जो उनके बैग पुल के प्रवेश द्वार तक पहुंचा दे। इस रिक्शे में प्रताप सेन बैठ गया पुल तक। किसी भी तीर्थ यात्री को यह ध्यान रखना चाहिए कि मेले, स्नान, या कुंभ इत्यादि जैसे पर्वों पर 11 नम्बर की ही सवारी काम आएगी। मतलब पैदल ही चलना पड़ेगा। क्योंकि भीड़ चलने वाले रास्तों पर रिक्शा इत्यादि वाहनों का प्रवेश वर्जित कर दिया जाता है। इसलिए तीर्थ पर जाने से पहले लगभग 15 दिनों की रोज 5 किलोमीटर चलने का अभ्यास कर लेना चाहिए।

पुल पार करके हमने उसके मुहाने पर कुछ देर विश्राम किया। उत्तराखंड पुलिस की महिला विंग की ड्युटी पुल के पास वाले चौराहे पर लगी थी। कभी-कभी मोबाईल पर मुस्कुरा कर बात कर लेती थी फ़िर अपने काम में लग जाती थी। मोबाईल भी मन बहलाने का उम्दा साधन है। बस उपयोग सही होना चाहिए। एक मिस कॉल दो और घंटे भर बात करो। धन धनिए का, माल बनिए। अपना तो हवा हवाई में ही काम चल जाता है। खिरामा खिरामा टहलते टहलते हम स्टेशन तक पहुंच गए।पैदल चलते चलते हरिद्वार की कई बातें और यादें जेहन में चल रही थी। कुछ चित्रों के रुप में यादें संजो ली थी। हरिद्वार के प्लेटफ़ार्म पर जनसुविधा का न होना आश्चर्य चकित कर गया। क्योंकि कुछ महिला सहयात्रियों को आवश्यकता पड़ गयी थी। उन्हे स्टेशन के बाहर जाना पड़ा। जारी है................।
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देशाटन, तीर्थाटन और पर्यटन - मथुरा की ओर

घड़ी चौक रायपुर
जिज्ञासु प्रवृत्ति मनुष्य को देशाटन, तीर्थाटन को प्रेरित करती है, वह अज्ञात को जानना चाहता है। यही अज्ञात को जानने की ललक उससे यात्राएं करवाती हैं। पहले लोग जीवन के उत्तरार्ध में तीर्थाटन करते थे, बैलगाड़ी, घोड़े एवं पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। सुरक्षा की दृष्टि से ये यात्राएं समूहों में होती थी, यदा कदा ही कोई यायावर अकेले यात्रा करता था। लोग जब तीर्थाटन को जाते थे तो गाँव के लोग उन्हे विदा करते और गाँव की सीमा तक गाजे-बाजे के साथ छोड़कर आते। तीर्थाटन निर्विघ्न समपन्न होने पर सकुशल घर लौटते तो उन्हे गाजे बाजे से ही परघाया जाता। सकुशल वापस आने की खुशी में पूजा-पाठ करके सामुहिक भोज का आयोजन भी किया जाता। वैसे अभी भी तीर्थ करके आने पर प्रसादी की जाती है, जिसमें इष्ट मित्रों को आमंत्रित किया जाता है और खुशी मनाई जाती है। अब किसी भी उम्र में, कभी भी तीर्थयात्रा की जा सकती है,यात्रा के तीव्रतम साधन उपलब्ध हैं, अगर कहीं दुर्घटना न हो तो तीर्थ यात्राएं कम समय में सकुशल सम्पन्न हो जाती हैं।
रास्ते का स्टेशन (सवाल जाट जी के लिए)
ऐसी ही एक सामुहिक तीर्थ यात्रा के सुत्रधार थे रामसजीवन चौरसिया जी। शांतिकूंज हरिद्वार के आमंत्रण पर दो-तीन माह से यात्रा की तैयारियाँ हो रही थी। चौरसिया जी का आग्रह था कि मैं भी उनके साथ यात्रा पर चलुं। आगामी कार्यक्रमों को देखते हुए मेरे मन में इस यात्रा को करने का विचार कम ही था। मैने अनमने मन से हाँ तो कर दी थी, पर पूर्ण रुप से यात्रा के लिए मन नहीं बना पाया था। चौरसिया जी ने 117 यात्रियों का दल बताया था। अब इतने सारे लोगों को एक साथ लेकर यात्रा कराना भी कठिन कार्य है। जिसमें बच्चों से लेकर उम्र दराज सभी शामिल हों। सामुहिक यात्रा कि अपनी कठिनाईयाँ भी हैं। हमारी यात्रा 5 नवम्बर से प्रारंभ होने वाली थी, मैने दो दिन पहले ही जाने का विचार त्याग दिया था क्योंकि 18 नवम्बर को छत्तीसगढ के राज्योत्सव कार्यक्रम में दिल्ली जाने का विचार था। 

सामुहिक चित्र
यात्रा के एक दिन पहले चौरसिया जी ने साथ चलने का विशेष आग्रह किया तो टाल न सका और यात्रा की तैयारी हो गयी।सभी की टिकिट एक ही ट्रेन में न होने के कारण 29 यात्रियों को गोंडवाना एक्सप्रेस से सुबह जाना था और बाकी बचे यात्रियों को समता एक्सप्रेस से शाम को निकलना था। यात्रा का पहला पड़ाव मथुरा था। दिल्ली रुट पर ट्रेन द्वारा छत्तीसगढ से जाने के लिए मेरी पहली पसंद गोंडवाना एक्सप्रेस ही है। क्योंकि रायपुर से सुबह 7/50 पर चलकर अगली सुबह 7/30 बजे दिल्ली पहुंचा देती है। एक ही दिन यात्रा में लगता है और दिल्ली पहुंच कर दिन भर काम करने के लिए मिल जाता है। समता एक्सप्रेस से जाने पर 2 दिन और 2 रात खराब होती है। सफ़र लम्बा लगने लगता है। सभी लोगों को 4 बजे तक स्टेशन पहुंचना था, मैं और गिलहरे गुरुजी घर से एक साथ ही चले थे और स्टेशन पहुंचने पर सभी लोग वहाँ मिल गए। सभी के मित्र मंडली के हिसाब से अलग-अलग ग्रुप बने थे। कुछ विशुद्ध तीर्थ यात्री थे तो कुछ विशुद्ध पर्यटक, घुमने का नजरिया अलग-अलग था। यात्रा करने का उल्लास सभी के चेहरे से प्रतीत हो रहा था। कुछ तो पहली बार इतनी लम्बी यात्रा पर जा रहे थे।
भजन यात्रा
समता एक्सप्रेस प्लेटफ़ार्म पर पहुंची, साथियों ने टूर आपरेटर (चौरसिया जी) के बताए अनुसार बोगियों में चढ कर सीटें संभाल ली। इस ट्रेन में हरिद्वार जाने वाले अन्य गायत्री परिजन भी थे। फ़ुल हाऊस चल रहा था। टिकिट चेक कराने पर मालूम हुआ कि लगभग 30 टिकिटें कन्फ़र्म नहीं हुई हैं। इसलिए जितनी सीटें हैं उन पर ही सभी को समायोजित हो कर जाना है। कुछ सहयात्री ऐसे थे कि वे अपनी सीट पर किसी और को बैठाने के लिए तैयार नहीं थे। अपनी सीटें संभालते ही उन्होने बिस्तर लगा लिया। हम तीन चार बोगियों में घूम कर उन्हे सीट दिलाते रहे। मेरी सीट पर भी कोई अन्य जम गए थे। सहयात्रियों में महिलाओं की संख्या अधिक थी, महिलाओं की सीट मिल जाए तो पुरुष कहीं पर भी रात का समय निकाल सकते हैं। पर कुछ महापुरुष थे जो अपनी सीट छोड़ने को ही तैयार नहीं थे। जैसे-तैसे करके सभी को स्थान दिलाया। सहयात्रियों ने डफ़ली लेकर भजन शुरु कर दिए। बड़ा ही अच्छा माहौल बन गया था। भजन कीर्तन में लग गए, बंछोर जी ने बढिया भजन सुनाए।

मथुरा जंक्शन
कुछ फ़ोर्स के भी जवान थे उस बोगी में, उन्होने दरवाजा बंद करके वहीं पर अपना डेरा लगा लिया और बोतल खोल ली। ट्रेन में ही कार्यक्रम शुरु कर दिया, शायद फ़ोर्स के जवानों के लिए ट्रेन में शराबखोरी की छूट है। ये ट्रेन में शराबखोरी करते हुए गाहे-बगाहे मिल ही जाते हैं। ट्रेन मंजिल की ओर दौड़ रही थी, मेरी सीट पर एक सज्जन सोए हुए थे। मैने सोचा कि इन्हे सोने दिया जाए, रात 1 बजे के बाद इन्हे उठाकर दो चार घंटे के लिए आराम कर लेगें। 1 बजे मैने अपनी सीट संभाली। नींद का समय निकल जाने पर बुलाने से भी नहीं आ रही थी। करवटे बदलते रहा, जैसे ही नींद आने लगी तो कुछ सवारीयाँ जोर-जोर से बातें करने लगी। उनके वार्तालाप से नींद में व्यवधान हो रहा था। जैसे-तैसे करके एकाध झपकी ली और भोपाल आ गया। चे गरम, चे गरम की आवाज सुनकर उठना पड़ा। चाय के साथ अखबार लिया पर थकान काफ़ी हो गयी थी। चाय पीकर पुन: लेट गया। सहयात्रियों ने अपनी नींद पूरी कर ली थी। शाम को तीन बजे हम मथुरा स्टेशन पर पहुंचे। सारी सवारियों के उतरने के बाद जाँच की गयी, कोई ट्रेन में छूट तो नहीं गया है।

ऑटो रिक्शा की सवारी भूखनलाल जी के साथ
प्लेटफ़ार्म के बाहर निकलते ही ऑटो वालों ने घेर लिया। सब के अलग-अलग रेट थे, तपोभूमि तक जाने के 10 सवारियों के कोई 250 कह रहा था कोई 200 रुपए। हमने थोड़ा इंतजार किया तो प्रति सवारी 15 रुपए के हिसाब से ऑटो तय हुआ। 8 ऑटो रिक्शा करके हम तपोभूमि की ओर चल पड़े। राजस्थान जैसे इधर के ऑटो में भी पीछे डिक्की तरफ़ भी एक सीट लगा रखी थी। जिस पर 4 सवारियाँ बैठ जाती हैं, अगल-बगल और पीछे लटकाकर 20 सवारी तो ले ही जाते हैं। ट्रैफ़िक वाले चौक पर खड़े देखते रहते हैं। किसी ऑटो वाले को बाहर लटकी सवारियाँ देखकर भी रोकते-टोकते नहीं। तपोभूमि पहुंच कर आमद दी और स्नान ध्यान कर मथुरा घूमने का कार्यक्रम बनाया। मैने और गिलहरे गुरुजी ने अलग ही जाने का विचार किया। तपोभूमि की सड़क पर ही ऑटो मिल जाते हैं, डीग गेट से कृष्ण जन्मभूमि जाने के लिए। हमसे ऑटो वाले ने 3 रुपए प्रति सवारी लिए।  आगे पढें 
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