lalit sharma लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
lalit sharma लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

बंदरों की ब्लॉगरी मौज

पहले भी अयोध्या आया था, तब भी देखा था, अभी भी देखा है, बदला कुछ भी नहीं है, वही विक्रम की सवारी, पहले दो-दो रुपए लेते थे अब 5-5 और 10-10 लेने लगे हैं, लिट्टी चोखा का ठेला, बिड़ला धर्मशाला के समीप होमियोपैथी के डॉक्टर की दुकान, पुलिस चौकी, जलेबी और इमरती की दुकान, सड़क पर घूमते हुए आवारा पशु, गंदगी से बजबजाती हुई नालियाँ। सरयु के तट पर फ़ैली हुई गंदगी, छतरी लगाए पाटे पर बैठे पंडे। हवा के साथ उड़ती हुई पालीथिन की खाली थैलियाँ। चिलम फ़ूंकते साधु वेषधारी असाधु। चेले-चेली मुंडते संत महंत। नगो-पत्थरों की दुकानें, सुग्गा ज्योतिषियों का पसरा, सुरमा बेचते लोग, हरी काई रची पुरानी इमारतें। लोगों का सामान लूटते बंदर। कुछ नहीं बदला है। बदलने की बजाए कुछ जुड़ा है तो एक सायबर कैफ़े,बिड़ला धर्मशाला के समीप। सायबर कैफ़े का मिलना एक ब्लॉगर के लिए सुखद रहा।
यहाँ के बंदरों की तो बात ही मत पूछिए। आँखों से काजल चुराने जैसी बात है। अगर आपका ध्यान कहीं भटका और तनिक असावधान हुए तो आपकी आँखों पर लगा चश्मा भी गायब हो सकता है। आप मुंह फ़ाड़े देखते रह जाएगें।पिछली बार जब हम राम लला के दर्शन करने जा रहे थे, तब जाली वाले गेट के पास एक बंदर ने कमलेश का एक हाथ पकड़ लिया और अपना एक हाथ उसकी पैंट की जेब में डाल दिया। मैं आगे चल रहा था, पीछे से कमलेश आवाज दे रहा था, अंकल-अंकल! मैने पीछे मुड़ कर देखा तो नजारा देखने लायक था। कमलेश के चेहरे से हवाईयाँ उड़ रही थी। बंदर ने उसे काबू में कर रखा था। मैने बंदर को घुड़की थी, मतलब उसकी बोली में समझाया तो उसने कमलेश की जेब में रखी टिकिट की फ़ोटो स्टेट कापी निकाल ली और भाग गया। एक आदमी ने प्रसाद चढाने के लिए हाथ में रखा था, उसे लेकर भाग गए। वह आदमी हड़बड़ा गया। राम लला की सुरक्षा करने के लिए सुरक्षा बल तैनात हैं। एक-एक आदमी की खाना तलाशी लेते हैं। मैटल डिटेक्टर से लेकर मैनुअली भी चेक करते हैं, साथ ही बंदर भी सुरक्षा जांच में अपनी भूमिका निभाते हैं। बची-खुची जाँच ये पूरी कर लेते हैं।

एक व्यक्ति ने कहा कि सुरक्षा बलों की ड्यूटी सरकार ने फ़ालतू ही लगा रखी है। सारी जाँच तो बंदर ही पुरी कर लेते हैं। मजाल है कोई कुछ लेकर भीतर चला जाए। एक बार कोई सायकिल पर टिफ़िन लेकर जा रहा था, बंदर ने उसका टिफ़िन छीन लिया। बंदर द्वारा टिफ़िन छीनते ही वह व्यक्ति सायकिल छोड़कर भाग गया। टिफ़िन खोलने पर उसमें से विस्फ़ोटक पदार्थ निकला। जो सुरक्षा बल नहीं पकड़ पाए, उसे बंदरों ने पकड़ लिया। रामलला का एक अघोषित अदृश्य सुरक्षा घेरा बंदरों का भी है, लगता है जिसे तोड़ पाना किसे के बस की बात नहीं। मेरे सामने ही एक महिला का पर्स ले भागे, पेड़ पर चढ कर उसे फ़ाड़ दिया और उसका सामान एक-एक करके उड़ाते रहे वह महिला सामान बिनती रही। उसके पर्स में रुपए भी थे उसे भी फ़ाड़ कर फ़ेंकते रहे। एक व्यक्ति ने भजनों की सीडी खरीदी थी, वह थोड़ा असावधान हुआ और उसके हाथ की सीडी ले उड़े। चाहे सामान उनके काम का हो या न हो व्यक्ति के असावधान होते ही हाथ मार देते हैं।

हमारे साथ की महिलाएं इन बंदरों से बहुत परेशान थी, काकी के ने आधा किलो सेव लिए थे, उसकी थैली हाथ में धरे थी कि कहीं बैठ कर खाई जाएगी। मंदिर कार्यशाला से आते हुए हम मणिराम दास की छावनी की ओर जाने वाले गली में जैसे ही मुड़े वहां 100 से अधिक बंदरों ने रास्ता घेर रखा था। महिलाएं उस रास्ते पर जाने से डर रही थी, मैने बंदरो को घुड़की दी, हाथ में ले रखी छड़ी से डराया तो पेड़ की डाल पर चढ गए, कोई मुंडेर पर बैठ गया, हम चौकन्ने होकर गली पार करने लगे। काकी ने सेव की थैली पीछे हाथ करके साड़ी में छिपा ली। पता नहीं कहां से एक छोटी सी बंदरिया आई और थैली पर झपट्टा मार कर भाग गयी। काकी देखते ही रह गयी। उसका ध्यान बड़े बंदर पर था पर कमाल छुटकी बंदरिया कर गयी। इनका गिरोह अपने इलाके में रहकर ही वारदात करता है। दुसरे के इलाके में जाने पर इनमें युद्ध भी होता है। कई बंदर तो हाथ-पैर भी गंवा चुके है। पर खाने के लिए उद्यम तो करना ही पड़ता है।

पान ठेले वाले ने बताया कि बंदरों की टोलियाँ पूरे नगर में घूमते रहती हैं। जिसका घर खुला दिखा तो पूरी सेना ही भीतर घुस कर उसे तहस नहस कर देती है। कपड़े भी बाहर सुखाना मुश्किल है। पता नहीं दुबारा मिलेगें कि नहीं। हड़काने पर काट लेते हैं, नोच लेते हैं। बंदरों ने बड़ा आतंक मचा रखा है। यही हाल फ़ैजाबाद नगर का भी है। वहाँ भी बंदरों के आतंक से लोग त्रस्त हैं। बताते हैं कि बंदरों के विरुद्ध 10 हजार शिकायत पत्र फ़ैजाबाद के डीएम के दफ़्तर में जमा हैं, इन शिकायत पत्रों से डीएम का दफ़्तर अटा पड़ा है। जिला अस्पताल में एक महीने में बंदरों द्वारा काटे जाने के सौ-दो सौ मामले आ जाते हैं। लगभग इतने ही मामले प्राईवेट अस्पतालों में जाते हैं। मंदिर-मस्जिद मुद्दे से अधिक बड़ा अयोध्या वासियों के लिए बंदरों से मुक्ति का मुद्दा है। इसके लिए जन अभियान चलाने जैसी योजना भी सामने आ रही है। बताते हैं कि इस इलाके में 20 हजार से अधिक बंदर हैं। इन्हे शहर से अलग बसाने के लिए अभ्यारण्य तैयार करने की मांग उठने लगी है।

भारत में बंदरों के साथ धार्मिक आस्था भी जुड़ी हुई है, इसलिए बंदरों को मारा नहीं जाता, कोई भी इन्हे हानि नहीं पंहुचाता, तभी बजरंग बली की यह सेना बेखौफ़ होकर नगर में लूट-पाट करते फ़िरती है। शहर के बीच-बाजार में कहीं पर भी फ़ल फ़्रूट की दुकान के पास आपको देख कर दांत किटकिटाते मिल जाएगें। स्टेशन पर लगी हुई टीन की चद्दरों पर धमाचौकड़ी करते हुए इनका दल यात्रियों को डराते-सहमाते रहता है। चलती गाड़ी के डिब्बों पर चढ कर करतब दिखाते हैं। यहाँ के निवासियों को तो बंदरों के कारनामे झेलने की आदत पड़ गयी है, पर बाहर से आने वाले दर्शनार्थियों से इनका मिलना त्रासदी पूर्ण ही है। कुछ लोगों की पेट रोजी ये बंदर ही चला रहे हैं। लोगो ने बंदरों का दाना बेचने की दुकाने खोल रखी हैं जहाँ से खरीद कर श्रद्धालु इन्हे भक्ति भाव से खिलाते हैं। पर बंदर आखिर बंदर ठहरे, अपनी आदतों से बाज नहीं आते। बंदरों को भी ब्लॉगरी मौज लेने की आदत पड़ गयी है। पहले तो चलते आदमी को छेड़ते हैं,फ़िर उसके खिसियाने पर पेड़ की डाल पर बैठ कर दांत निपोरते हुए मौज लेते हैं। यही सलाह है कि  बंदरों बच के रहें तभी सही है अन्यथा बंदर तो ...........।
Indli - Hindi News, Blogs, Links

पिशाच मोचन इमरती और लिट्टी-चोखा

हमें जो ऑटो वाला मिला था वह बहुत अच्छा आदमी था, उसने हमें भरत कुंड पहुंचाया, मैने उसे सबके लिए चाय बनवाने कहा और हम मंदिर दर्शन के लिए चल पड़े। मंदिर में पहुचने पर एक जगह लिखा था "भरत गुफ़ा" । बताया गया कि यहाँ भरत जी ने गुफ़ा में रहते थे। कहते हैं कि राम-भरत मिलाप के पश्चात भरत खड़ाऊं लेकर फैजाबाद मुख्यालय से 15 कि. मी. दक्षिण स्थित भरतकुंड नामक स्थान पर चौदह साल तक रहे। भरत कुंड एक ग्राम है जिसे नंदीग्राम कहा जाता है। इस मंदिर से लगा हुआ एक मंदिर और भी वहां भी भरत गुफ़ा बनी हुई  है। हमारे एक साथी ने दोनों गुफ़ाओं के विषय में पूछा तो पुजारी ने कहा कि कुछ नगद दिखाओगे तभी जानकारी बाहर निकलेगी। मुफ़त मे कुछु नही मिलेगा। पूछने वाला भी तेली था, न उसने नगद दिए और न पुजारी ने जानकारी उगली। तभी एक बोलेरो वाला मंदिर के गेट को ठोक कर सपाटे से भाग निकला। उसकी स्पीड इतनी थी कि वह कहीं भी दुर्घटना कर सकता था। उसके साथ बालाघाट के दर्शनार्थी थे, उनकी बोली से लग रहा था। 

भरत कुंड
यहां से लगा हुआ ही एक कुंड हैं जहाँ  हर साल चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को मेला लगता है। मान्यता है कि इस सरोवर में स्नान से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। कुंड कई एकड़ में फ़ैला हुआ है, जलकुंभी ने कुंड पर कब्जा कर रखा है, और बंदरों ने आतंक फ़ैला रखा है,  किसी के भी हाथ में जो कुछ दिखा उसे झपट्टा मार कर ले ही जाना है। हमारा इरादा पाप नष्ट करने का नहीं था, अभी कल ही तो सरयू स्नान कर सारे पाप धो लिए थे। पाप नाशक स्नान को मैं कम्पयुटर के एन्टीवायरस प्रोग्राम से ही जोड़ कर देखता हूं, एक बार स्केन याने स्नान कर लो फ़िर सारे पापरुपी वायरस का सफ़ाया हो जाता है। "न सौ काशी न एक पिचाशी।" इन्हीं किंवदंतियों के बीच नंदीग्राम का एतिहासिक पिशाची मेला चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को बदस्तूर जारी है। कुंड से वापस आकर हमने होटल में चाय पी, चाय पीने वाले कम थे और चाय अधिक हो गयी थी, होटल वाले ने 3 चाय वापस लेने से मना कर दिया, प्रताप ने दो चाय ली और मैने भी, मामला फ़िट हो गया।चाय वापस नहीं करनी पड़ी।

भरत कुंड के यात्री
नंदीग्राम भरतकुंड पिशाची के बारे में दो तरह की किंवदंतिया हैं पहली यह कि लंका में युद्ध के दौरान जब मेघनाद के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे तो हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने भेजा गया था। बूटी की पहचान न होने के कारण वह पहाड़ उठाकर ही लंका की ओर चल पड़े। जब वे अयोध्या के ऊपर से जा रहे थे तो कुछ देर के लिए समूचे क्षेत्र में अंधकार छा गया। आसमान की ओर देखने पर किसी दानव शक्ति द्वारा अयोध्या पर आक्रमण किए जाने की आशंका में भरत जी ने बाण चला दिया। बाण लगने के कारण हनुमान जी पर्वत समेत गिर गए थे। पुजारी हनुमान दास कहते हैं कि जिस स्थान पर हनुमान जी गिरे थे वहां कुंड बन गया था। उसी को पिशाच मोचन कुंड के नाम से जाना जाता है। दूसरी किंवदंती है कि लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ब्रह्मा हत्या के पाप से मुक्त होने से लिए पिशाच मोचन कुंड में स्नान किया। इस कारण पिशाच मोचन कुंड की मान्यता है कि न सौ काशी न एक पिशाची।

मणि पर्वत का शिलालेख
अब यहाँ से हम वापस चल पड़े अयोध्या की ओर, ऑटो चालक से पूछ कि बीच में और कुछ दर्शनीय स्थल हो तो वह भी दिखा दे। तो उसने बताया की रास्ते में मणिपर्वत मिलेगा। मैने कहा कि - मणिपर्वत चलो, वहीं तुम्हारा भाड़ा भी सकेल कर दे देगें। वह तैयार हो गया। हम मणिपर्वत पहुंचे। एक ऊंचा सा टीला है जिसपर मंदिर बना है, यहां के पुजारी ने बताया कि जब सीता जी जनकपुरी से वापस आई थी तब यहीं पर मणियों का पर्वत बना कर सीता जी झूले में झुलाया गया था। यहाँ प्रतिवर्ष सावन मेला लगता है, जिसमें अयोध्या के साते देवी देवता झूला झूलने आते हैं यह उत्सव 12 दिन चलता है। इस उत्सव के लिए प्रशासन सारी व्यवस्था करता है। मेले में लाखों श्रद्धालु सावन झूला पर्व मनाने  आते हैं। यह स्थान भारतीय पुरातत्त्व के संरक्षण में है। इस मंदिर में कई शंख रखे हैं, जिनमें एक शंख को पांच्जन्य शंख भी बताया गया है।

दीवारों पर वाल्मीकि रामायण
मणि पर्वत के दर्शन कर के हम मणिराम की छावनी पहचें। वाल्मीकी रामायण मंदिर भी खुल चुका था।  वाल्मीकी रामायण भवन का निर्माण मंहत नृत्यगोपाल दास जी ने कराया था। 1956 में प्रारंभ होकर दस वर्षों में इसका निर्माण 1966 में पूर्ण हुआ, यहां दुनिया का अनोखा रामायण बैंक है, यहां अभी तक 164 अरब से अधिक राम नाम जमा हो चुके हैं।इस बैंक का नाम है 'अंतरराष्ट्रीय श्री राम नाम बैंक।' इस बैंक में राम नाम जमा कराने पर ब्याज भले ही न मिलता हो मगर सच्चा आनंद अवश्य मिलता है। अंतरराष्ट्रीय श्री राम नाम बैंक की स्थापना वर्ष 1963 में अयोध्या में नृत्य गोपालदास महाराज द्वारा की गई थी। गाजियाबाद में इसकी शाखा की स्थापना प्रख्यात संत व कथावाचक डोंगरे जी महाराज ने घंटाघर स्थित रामलीला मैदान में आयोजित श्रीमद्‍भागवत कथा के दौरान की थी। आज इस बैंक की देश-विदेश में मिलाकर 125 से अधिक शाखाएँ हैं। गाजियाबाद के हनुमान मंदिर में इसकी 42वीं शाखा है।

पाञ्चजन्य शंख
बैंक में खाता खोलने के लिए किसी कागजात की नहीं बल्कि राम नाम की जरूरत है। बच्चे, युवा, बुजुर्ग, महिला या पुरुष कोई भी, किसी भी भाषा में सवा लाख सीताराम या राम नाम लिखकर बैंक में अपना खाता खोल सकता है। इतना ही नहीं, जो भक्त नियमित रूप से राम नाम लिखता है, वह बैंक का स्थायी सदस्य बन जाता है और उसे बैंक की तरफ से पास बुक व सदस्यता प्रमाण पत्र भी दिया जाता है। एक करोड़ राम नाम लिखने वाले भक्त को स्वर्ण पदक, पचास लाख राम नाम लिखने वाले को रजत पदक व 25 लाख राम नाम लिखने वाले को काँस्य पदक से सम्मानित किया जाता है। 25 वर्ष की आयु में ही 15 लाख नाम लिखने पर भी काँस्य पदक मिलता है। राम नाम लिखने के लिए वैसे तो बैंक से ही कॉपी मिलती है मगर निजी कापी या डायरी आदि में भी राम नाम लिखकर बैंक में जमा कराया जा सकता है। राम नाम लिखी कॉपियों को अयोध्या स्थित 'श्री वाल्मीकि रामायण भवन' में सुरक्षित रखा गया है। 

गरमा गरम इमरती
रामायण भवन से दर्शन करके हम पुन: उसी रास्ते पर निकल पड़े, रास्ते में एक दर्जी अंगरखा सील रहा था, एक साधु अंखरखे का ट्रायल ले रहा था, मेरे भी मन में एक अंगरखा डोरी वाला सिलाने की आई, लेकिन देर हो चुकी थी। अगर यह दर्जी सुबह दिख जाता तो शाम तक अंगरखा तैयार हो सकता था। अब समय नहीं था, अंगरखा सिलाने की अधुरी इच्छा को फ़िर कभी पर टाल कर आगे बढे, मुख्य मार्ग पर आने तब जोर की भूख लग चुकी थी। एक होटल में गर्मागरम इमरती बन रही थी। लालच आ ही गया, क्या करुं कंट्रोल ही नहीं होता। साथियों से पूछ कि नास्ता करना है क्या? सभी ने न में जवाब दिया, मैं होटल में पहुंचा, इमरती सौ रुपए किलो थी, होटल का नाम सौरभ होटल, एक पाव इमरती ली, एक पाव में 10-12 इमरतियाँ तो चढ गयी। तीना चार इमरतियाँ होटल में  ही खड़े-खड़े उदरस्थ की, बाकियों को थैली में बंद करके आगे बढे, मुझे इमरतियाँ लेते देख कर दो चार साथियों ने भी खरीदी। मैने सभी से खाने के विषय में पूछा तो उन्होने सभी का खाना गायत्री मंदिर में बनना बताया। सबको लेकर जब गायत्री मंदिर पहुंचा तो देखा कि वहां कुछ लोगों का ही खाना बन रहा है। अब मेरी बात न मानने की सजा भुगतो। कह कर मैं बिरला धर्मशाला की ओर बढ लिया।

गुगल सर्च इंजन पर ललित शर्मा
रास्ते में दो जगह लिट्टी चोखा मिल रहा था। एक जगह तली हुई बाटी थी, आलू के साग के साथ, दूसरी जगह भुनी हुई बाटी दिखाई दी। मैने दोनो ले ली। अब खाने की जरुरत नहीं थी इनसे ही काम चल जाएगा। रास्ते में सुबह वाला सायबर कैफ़े दिखाई दिया। फ़िर क्या था? घुस गए सायबर कैफ़े में। सायबर कैफ़े के संचालक ने आईडी मांगी। आई डी कार्ड सब मेरे बैग में पड़े थे, मैने कहा कि गुगल पर मेरा नाम सर्च के देखिए। जब उसने हिन्दी में "ललित शर्मा" सर्च किया तो 3 सेकंड में ढाई लाख से उपर लिंक दिखाई दिए और जैसे ही इमेज सर्च की तो सैकड़ो फ़ोटो मेरी सर्च इंजन ने निकाल कर धर दी। उसे देखकर संचालक ने कहा कि "अब आपकी आई डी की जरुरत नहीं है, आप तो गुगल में सर्वत्र व्यापक हैं। चलाईए इंटरनेट, ब्लॉगिंग का यह फ़ायदा हुआ। अब पहचान पत्र रखने की आवश्यकता नहीं है। हमारी पहचान गुगल पर स्थापित हो चुकी है। कैफ़े से मेल आदि चेक किए और ब्लॉग पर दो फ़ोटो लगा कर अपने रुम में पहुचा। पंकज का चेतन भगत से पीछा नहीं छूटा था, कह रहा था कि बड़ा बोरिंग उपन्यास है, उपन्यास का नाम मैं भूल रहा हूँ। दोनो ने लिटी चोखा खाया इमरती के साथ और मैं आम्रपाली के सपनों में खो गया।-- आगे पढें
Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, 5 जनवरी 2011

अब चल पड़े केरल की ओर--एक थके हुए युवक से मुलाकात -- केरल यात्रा ---1

उड़ कर केरल की यात्रा तो कई बार की । यहां के कई शहरों को देखा। लेकिन फ़्लाईट से केरल के सौंदर्य का मजा नहीं लिया जा सकता। इसलिए हमने तय किया कि अब ट्रेन के स्लीपर क्लास में सफ़र करना चाहिए। केरल के कोल्लम शहर में वहां के आर्टिसन वेलफ़ेयर कार्पोरेशन के चेयर मेन श्रीमान सरसप्पन जी रहते थे (अब दिवंगत हो गए हैं) उनसे मिलने का कार्यक्रम था और तिरुअनंथपुरम में एक कार्यक्रम में भी शरीक होना था। इस कार्यक्रम का निमंत्रण मुझ तक पहुंचा तो मैने सुमीत को भी केरल यात्रा के लिए तैयार किया। वह तैयार हो गया। बरसात के मौसम में ट्रेन से केरल का सफ़र इतना आनंद दायक होगा मुझे पता नहीं था। लेकिन अंदाजा था कि हरियाली देखने का स्वर्गिक आनंद मिलेगा।

हमने केरल की यात्रा कोचीन एक्सप्रेस से करने की ठान ली। रायपुर में कोचीन(Korba Tiruvananthapuram ) एक्सप्रेस हम रात साढे ग्यारह बजे रायपुर से रवाना हुए। हमारे एक मित्र टी एस कोंडल को दुर्ग से इसी ट्रेन से हमारे साथ चलना था। जब हम ट्रेन में सवार हुए तो 28 तारीख थी और दुर्ग पहुंचे तो 29 तारीख हो चुकी थी। आधा घंटे के फ़र्क से तारीख बदल गयी। ट्रेन की टिकिट लेने में कभी-कभी रात के समय बदलने के कारण बहुत लोचा हो जाता है। इसलिए समय का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। दुर्ग पहुंचने पर कोंडल जी मिल गए। उनके पुत्र ट्रेन में बैठाने आए हुए थे। अब एक सरदार भी हमारे साथ हो गया।

कुछ देर ट्रेन चलने के बाद एक दुबला-पतला 24-25 साल का केरलियन नौजवान नजर आया। उसकी हरकतें कुछ असामान्य थी। कभी अपनी सीट से उतरता था तो कभी डिब्बे में बड़बड़ाता हुआ चलता था। एक कोने से दूसरे कोने तक। मैने सुमीत को उसकी हरकतें बताई तो उसने भी ध्यान दिया। रात को कहीं चलती ट्रेन से गिर गया तो जान से जाएगा। अब हमारा ध्यान उसकी तरफ़ चला गया। सरदार जी अपनी बर्थ पर आराम फ़रमाने लगे। सुमीत ने उस लड़के से बातचीत शुरु की। तो पता चला कि वह इलेक्ट्रिकल इंजिनियर है और चांपा के पावर प्लांट में काम करता है। वर्क लोड अधिक होने के कारण उसे वर्क सिकनेश की बीमारी हो गयी है। उसके दिमाग पर काम का बोझ कुछ अधिक पड़ गया। इसलिए कम्पनी ने उसे रेस्ट करने के लिए छुट्टी दे दी है।

वर्तमान में ऐसे नौजवानों का बहुत शोषण हो रहा है। इंजिनियर और एम बी ए करने वालों की मांग अधिक है। कम्पनियाँ कैम्पस इंटरव्यु करके इन्हे लाखों के पैकेज में नौकरी देती हैं और मां बाप भी खुश हो जाते  हैं कि बेटे की नौकरी अच्छी कम्पनी में लग गयी और तनखा भी अच्छी है। लेकिन उस वेतन के पैकेज से प्रतिभा को बांध कर शोषण किया जाता है। चौबीस घंटो की नौकरी हो जाती है। बस लगातार उसे दौड़ते ही रहना है। अपने काम में खटते ही रहना है। उसकी अपनी जिन्दगी तो जैसे समाप्त ही हो जाती है। कम्पनी का चलता फ़िरता रोबट बन कर रह जाता है। बिना हाड़ मांस का हृदय विहीन नौकर बन जाता है। इससे उसके स्वास्थ्य और मनोमस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है जिससे वह अवसाद की स्थिति तक पहुंच जाता है। इसके बाद कम्पनियां उसे निकाल बाहर करती हैं। एक प्रतिभा का अंत इस तरह हो जाता है। इस नौजवान की स्थिति भी कमोबेश इसी तरह की थी। वर्क सिकनेश का शिकार होकर अपने घर जा रहा था। मैं सोते-सोते भी इसी के बारे में सोच रहा था।

हमारी सुबह बल्हारशाह स्टेशन पर होती है। स्टेशन पर भिखारियों की बाढ है। लेकिन यहां के भिखारी रुपए पैसे नहीं मांगते। ये सिर्फ़ खाने के लिए रोटी मांगते हैं सवारियों से। यह मैने बल्लारशाह में ही आकर देखा। साथ ही इस स्टेशन से ट्रेन में नर जैसी नारियाँ भी चढती हैं। ताली ठोंक कर सवारियों के सर पर सवार हो जाती हैं। बिना कुछ लिए जाती नहीं। ट्रेन के सफ़र में मैने देखा है कि इनको रोकने की हिम्मत कोई टी टी या पुलिस वाला नहीं करता। सवारियों को लुटते हुए देखते रहते हैं। शायद इनका भी कुछ हफ़्ता महीना इनसे बंधा रहता है। तभी इतनी निर्भिकता से ये ट्रेन में सवार हो जाते हैं।

बल्हारशाह से टेन आगे चली, थोड़ी देर बाद वातावरण में अजीब सी दुर्गंध फ़ैल गयी। मैने गन्ध पहचानी क्योंकि एक बार अमलाई भी जा चुका हूँ। यह सिरपुर कागजनगर था। यहां कागज का कारखाना है। जिसके कारण यहां बदबू आ रही थी। आगे रामागुंडम आने वाला था। इस मार्ग पर मैं खाना रामगुंडम में लेता हूँ। क्योंकि पत्तल में अरवा चावल के साथ रसम, सांभर, छाछ और सब्जी के अचार के साथ अच्छा खाना मिल जाता है। रामागुंडम में हमने खाना लि्या और खिड़की से नजारे देखते रहे प्रकृति के। बरसात नहीं थी। जुलाई का महीना चल रहा है। वातावरण में उमस भी बहुत थी। बरसात होने से कुछ राहत मिलती। हमारे साथ कोरबा के एस ई सी एल में काम करने वाले त्रिसुर निवासी एक यात्री भी थे। उनका नाम मुझे याद नहीं आ रहा। समय गुजारने के लिए हमने ताश खेलना शुरु किया। कोंड़ल जी भी  आ चुके थे। सुमीत ने उस इंजिनियर लड़के को भी सेट किया। अब हम चार हो चुके थे और बाजी जम गयी।रात ट्रेन चेन्नई पहुंची। रायपुर से चेन्नई के 24 घंटे लगते हैं। चेन्नई में हमने दोसा लिया नारियल चटनी के साथ। बहुमत ने कहा आराम किया जाए।

नोट- कुछ चित्र गुगल से साभार

Indli - Hindi News, Blogs, Links