गुरुवार, 29 जुलाई 2010

110 कैमरा, नारनौल, जल महल एवं बीरबल का छत्ता--और मैं ---------- ललित शर्मा

यात्राएं तो लगातार चलती रहती हैं जीवन ही यात्रा का नाम है,चलते रहना ही जीवन है। अब चलते हैं एक और यात्रा पर। सन् 1985 में मुझे हरियाणा के नारनौल जाने का मौका मिला।बात पुरानी है लेकिन स्मृतियों में ताजा है।उस समय रायपुर से एकमात्र 36 गढ एक्सप्रेस एकमात्र ट्रेन थी जो सीधे दिल्ली तक पहुंचाती थी। नहीं तो बीच में बीना आदि स्टेशन पर एक गाड़ी बदलनी पड़ती थी। 36 गढ एक्सप्रेस रात को लगभग 8 बजे दिल्ली पहुंचाती थी। रात नौ बजे नागपुर पहुचती थी पान्ढुर्णा के बाद सभी स्टेशनों पर रुकती थी। सुबह 5-6 बजे भोपाल पहुंचाती थी, यह मेरी दुसरी लम्बी यात्रा थी। उस समय टिकिट मैन्युअली बनती थी और हमारे यहां की छोटी गाड़ी में जाने वाले टी टी की अगले दिन 36  गढ एक्सप्रेस में ड्युटी लगती थी। मतलब सीट मिल जाती थी मामला फ़िट हो जाता था।

110 छोटा कैमरा
नारनौल में पापा के दोस्त जैन साहब रहते थे। दिल्ली से रात को चलकर नारनौल पहुंचना ठीक नहीं था। कहां किसे उठाया जाए रात को जाकर। इसलिए मैने रात्रि दिल्ली के स्टेशन के यात्री निवास में ही आराम किया और सुबह की मुद्रिका बस पकड़ कर अजमेरी गेट बस स्टैंड पहुंचा, वहां से नारनौल की बस पकड़ी किराया बहुत कम ही था। शायद 15 रुपए ही लिए होगें। रास्ते में गुड़गांव पड़ा, एक गांव ही था उस समय, बस गुड़गांव शहर के अंदर नहीं गयी और सवारियों को इसने बायपास पर भी उतार दिया। बायपास एक दम सुनसान था। आज के गुड़गांव और तब के गुड़गांव की तस्वीर अलग ही थी। मेरे पास उस समय वन टेन कैमरा था, जो एक रील में 25-26 फ़ोटुएं लेता था। फ़ोटोग्राफ़ी भी उस समय मंहगा शौक ही था। रास्ते में रेवाड़ी, अटेली मंडी होते हुए नारनौल पहुंचे।

कैमरा रोल 120 रुपए का आता था उस समय
नारनौल एतिहासिक शहर है, इसका नाम इतिहास में प्रसिद्ध है, औरंगजेब के शासन काल में यहां सतनामियों के साथ युद्ध का उल्लेख है जिनसे औरंगजेब की सेना हार चुकी थी और उसके सेना का मनोबल गिर चुका था। उसकी सेनाएं सतनामियों से पुन: युद्ध लड़ना नहीं चाहती थी। उनमें यह भ्रम फ़ैल गया था कि सतनामियों को जादु टोना आता है जिससे उनमे गैबी ताकते हैं और हम युद्ध पुन: हार जाएंगे। औरंगजेब ने सेना का डर मिटाने के लिए सबके हथियाओं में एक-एक ताबीज बंधवाया और कहा कि अब युद्ध लड़ो, यह ताबीज तुम्हारी गैबी ताकतों से रक्षा करेगा। इसके बाद उसकी सेना में दुबारा युद्ध लड़ा और सतनामियों पर विजय पाई, इस युद्ध का उल्लेख बीए इतिहास प्रथम वर्ष की किताब में है।

जल महल --शाम होने को थी 1985
नारनौल पहुंच कर मुझे वहां के एतिहासिक स्थलों की जानकारी की अभिलाषा थी। मैं इस शहर को घुमना चाहता था। बब्बु के साथ मैं दो दिनों तक पूरा नारनौल घुमा। पुराना शहर होने के कारण यहां बहुत सारी इमारतें पुरानी है। सबसे पहले मैं और बब्बु जलमहल देखने गए, उस समय बब्बु को भी इसके इतिहास के विषय में इतनी जानकारी नहीं थी। वह भी बी कॉम प्रथम वर्ष में ही पढता था। उसने बताया कि यह जल महल अकबर के के विश्राम करने के लिए बनाया था लेकिन हकीकत में जलमहल बहुत खूबसूरत है। महल की दीवारों पर लिखे शिलालेखों के अनुसार इसका निर्माण 1591 ई. में शाह कुली खान ने कराया था। यह महल एक तालाब के बींचो-बीच बना हुआ है। लेकिन अब यह तालाब पूरी तरह से सूख चुका है। शाम हो रही थी मैने बब्बु से कुछ फ़ोटु लेने को कहा।  वे फ़ोटु अभी तक मेरे पास थी।

1985 के चित्र में स्वयं-हां ऐसा ही था
नारनौल में बीरबल का छत्ता नामक एक जगह हैं, इसके विषय में किवदंती है कि यहां से एक सुरंग दिल्ली तक जाती है। इस सुरंग की  जानकारी लेने के लिए एक बारात अंदर गई थी जो फ़िर वापस नहीं आई। इसलिए इसके अंदर कोई जाता नहीं है। मैनें बीरबल का छत्ता भी देखा। इसके उपर बनी हुई ईमारतें खंडहर हो चुकी है। लोग इसका इस्तेमाल कचरे फ़ेंकने एवं शौच के लिए करते दिखे,  बीरबल का छाता पांच मंजिला इमारत है और यह बहुत खूबसूरत है। पहले इसका नाम छाता राय मुकुन्द दास था। इसका निर्माण नारनौल के दीवान राय-ए-रायन ने शाहजहां के शासन काल में कराया था। प्राचीन समय में अकबर और बीरबल यहां पर ठहरे थे। उसके बाद इसे बीरबल का छाता नाम से जाना जाने लगा। इसकी वास्तुकला बहुत खूबसूरत है। देखने में यह बहुत साधारण लगता है क्योंकि इसकी सजावट नहीं की गई है। इसमें कई सभागार, कमरों और मण्डपों का निर्माण किया गया है। कथाओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इसके नीचे चार सुरंगे भी बनी हुई हैं। यह सुरंगे इसको जयपुर, दिल्ली, दौसी और महेन्द्रगढ़ से जोड़ती हैं।

इसके बाद हम नारनौल शहर में बने एक मकबरे पर गए, जो कि बहुत ही सुंदर बना है। उस मकबरे पर अरबी में कुछ लिखा था। मुझे तो अरबी आती नहीं थी। इसलिए एक मुल्ला जी को पकड़ा कि पढकर बताईए इसमें लिखा क्या है। वे मुझे पढ के बताने लगे, किसी ने मुझे बताया था कि यह शेरशाह सूरी का मकबरा है लेकिन बाद में पता चला कि यह शाह कुली खान का मकबरा है। लेकिन है बहुत खुबसूरत, इसके निर्माण में सलेटी और लाल रंग के पत्थरों का प्रयोग किया गया है। यह मकबरा आठ कोणों वाला है। इसके वास्तु शास्‍त्र में पठान शैली का प्रयोग किया गया है। मकबरे में त्रिपोलिया द्वार का निर्माण भी किया गया है। इस द्वार का निर्माण 1589 ई. में किया गया था। मकबरे के पास खूबसूरत तालाब और बगीचे भी हैं। तालाब और बगीचे का निर्माण पहले और मकबरे का निर्माण बाद में किया गया था। यह बगीचा बहुत खूबसूरत है। इसका नाम अराम-ए-कौसर है। जारी है.....................!

कैमरे के चित्र गुगल से साभार Indli - Hindi News, Blogs, Links

लातों के भूत बातों से नहीं मानते--यात्रा--हनुमानगढ

भटनेर का किला
कहानी 1984-85 की चल रही है, अभी तो काफ़ी बदलाव आ गया है,नारनौल से घुम घाम कर हम वापस रिवाड़ी पहुंचे, रिवाड़ी में भी एक दिन आवारागर्दी की। बस युं ही चक्कर काटते हुए, काठ मंडी, गोकलगेट, मुक्तीवाड़ा, नाई वाली, कतोपर, इत्यादि घुमे। इसके बाद हनुमानगढ जाने का कार्यक्रम बनाया। रिवाड़ी से दो गाड़ियाँ हनुमान गढ के रुट पर जाती थी। जोधपुर मेल और बीकानेर मेल। बात अब बहुत पुरानी है, इसलिए इनका समय कुछ रात के 11बजे के आस पास का था। 

भटनेर का किला
नवम्बर का आखरी सप्ताह था। ठंड बहुत थी, मैने एक लेदर की जैकेट,मंकी कैप और दस्ताने पहले ही खरीद लिए थे। अब स्टेशन की ओर चल पड़े। स्टेशन पहुंचकर देखा कि बीकानेर मेल पहले आने वाली थी और आई भी, लेकिन भीड़ इतनी थी कि पैर रखने की जगह ही नहीं थी। हमने यह ट्रेन छोड़ दी। उसके बाद जोधपुर मेल का भी हाल यही था। लेकिन अब तो ट्रेन में चढना मजबूरी थी। नहीं तो वहीं प्लेटफ़ार्म पर पड़े रह जाते। ट्रेन में चढने के बाद थोड़ी जगह दरवाजे के पास मिली, ठंड ज्यादा होने के कारण अपना कंबल ओढकर बैठ गए, बैठते ही नींद आ गयी। हमें सादुलपुर में छोटी लाइन की ट्रेन पकड़नी थी हनुमानगढ के लिए। सोते रहे।

जैसे ही सादुलपुर आया तो किसी ने हमें जगाया, देखा सादुलपुर आ गया, हम सामान समेत ही नींद में ट्रेन के बाहर कूद पड़े। इधर ट्रेन भी चल पड़ी थी। नहीं तो बीकानेर पहुंच कर नींद खुलती। यहां से हमने हनुमानगढ वाली ट्रेन पकड़ी। सुबह 8-9 बजे के आस-पास हनुमानगढ पहुंचे। वहां स्टेशन में उतरे तो सतपाल अंकल पहुंच गए थे, हमे लेने के लिए। उसके बाद हम उनके घर पहुंचे। स्नानादि से कुछ थकान दूर हुई लेकिन नींद आ रही थी। अब इरादा था हनुमानगढ टाउन घुमने का। उस समय टीवीएस50 का चलन था। हीरो मैजेस्टिक के बाद यह एक अच्छी बाईक आई थी। पिकअप भी बहुत बढिया था। यह बाईक मेरे हवाले हो गयी। बस इसी पर मैं घुमता रहा। दो दिन तक पूरा हनुमानगढ शहर घुमा। आगे श्री गंगानगर और सुरत गढ जाने का इरादा था लेकिन समयाभाव के कारण नहीं जा सका।

हनुमानगढ राजस्थान का मुख्य सरहदी जिला है। इसका क्षेत्रफ़ल 9656.09 वर्ग कि.मी. है। यहां कपास का अच्छा व्यवसाय होता है। मैने जगह-जगह कपास के ढेर लगे देखे। मैने सज्जन गढ का किला भी देखा। इस यात्रा के चित्र मेरे पास उपलब्ध नहीं हैं, बच्चे कहीं रख कर भूल गए है, मिलने लगाऊंगा, हनुमानगढ  में स्थित एक किला "भटनेर का किला"  के नाम से जाना जाता है। यह प्राचीन किला घाघर नदी के किनारे पर स्थित है, जिसे जैसलमेर के राजा भाटी के बेटे भुपत ने सन् 295 में बनवाया था।सन् १८०५ में बीकानेर  के  महाराजा सुरत सिंह  ने  राजा भाटी को हराने के बाद भटनेर पर कब्जा कर लिया। उनकी जीत मंगलवार के दिन हुई थे।(भगवान"हनुमान" का दिन), इस कारण से भटनेर का नाम हनुमानगढ़ कर दिया गया।

पहले दिन यहां आया तो शाम हो चुकी थी,इसलिए पुरा नहीं घुम पाया इसलिए दुसरे दिन फ़िर सुबह आया और पुरा किला देखा। मुझे प्राचीन इमारतें देखने का बहुत शौक है। राजस्थान में हर शहर में कोइ न कोई किला है और हवेली है। कई जगह तो ये अच्छी तरह संरक्षित हैं कई जगह इनकी देख-भाल न होने से खंडहर में तब्दील हो गयी हैं। धरोहरों का नाश हो रहा है। इनका पूर्ण संरक्षण होना चाहिए। अब हनुमानगढ से वापसी का समय हो चुका था। रात को फ़िर वही गाड़ी पकड़नी थी।रात को लगभग 10 बजे हम स्टेशन पहुंचे तो बहुत सर्दी हो चुकी थी। ठंड ज्यादा लग रही थी। बहुत सारे फ़ौजी भी बाडर से छुट्टियां मनाने अपने घर जा रहे थे। स्टेशन फ़ौजियों से भरा हुआ था। हमने सोचा चलो अब इनके साथ बातचीत करते सफ़र कट जाएगा।
रेलवई टेसन

ट्रेन आ चुकी थी। देखा कि लोगों ने दरवाजे लॉक कर रखे हैं। आवाज देने और दरवाजा ठोकने के बाद भी कोई खोलने को तैयार नहीं है। सब आराम से एक-एक सीट पकड़ कर कंबल रजाई ओढे सोये हैं। ट्रेन का छुटने का समय हो रहा था। सारे फ़ौजी भी हलाकान थे हम भी अपना सामान लिए खड़े थे कि कोई दरवाजा खोले तो अंदर घुसें। फ़िर एक फ़ौजी बोला-"दरवाजा तोड़ डालो, और इन्हे थोड़ा सुधार भी दो। बस फ़िर क्या था, फ़ौजियों के बूटों की ठोकर और कंधें के धक्कों से लॉक टूट गया। अंदर घुसते ही फ़ौजियों ने बेल्ट निकाल कर दो चार को तो अच्चे से सुधार दिया। पूरी बोगी में एक एक सीटों पर लम्बे पडे हुए सब उठकर बैठ गए और बैठिए साहब, बैठिए साहब करने लगे। कहां तो वे दरवाजा खोलने को तैयार नहीं थे। इसे ही कहते हैं लातों के भूत बातों से नहीं मानते। फ़ौजियों के साथ दिल्ली तक का सफ़र अच्छे से कट गया। उनके किस्से भी बड़े मजेदार थे। इस तरह हमारी हनुमानगढ यात्रा पूरी हुई।

चित्र -गुगल से साभार
Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

बहुत हुई रावण की बकवास- यात्रा का अंतिम भाग

रावण की बकवास
प्रारंभ से पढें-------शाम को सोकर उठे तो प्लान किया कि कल सुबह नागपुर से निकला जाए। नीरज कहने लगा कि यहां किसी अच्छे अस्पताल में शरीर का जनरल चेकअप करवा लेते हैं। मैने मना कर दिया कि रायपुर में करवा लेंगे। अब समय था रिफ़्रेशमेंट का। बहुत फ़ालतु चक्कर काट लिए 5 दिन। हाईवे पर कार दौड़ाते रहे। पूरी प्लानिंग चौपट हो गयी थी। अगर एक फ़ोन नहीं करता तो गोवा से लौट रहे होते, मौज मेल्ले ले के। लेकिन शायद किस्मत को यही मंजुर था। एक बढिया बार देखकर पहुंच गए तीनों रिफ़्रेशमेंट के लिए। बीयर का आनंद लेते हुए गपशप करते रहे। मैं फ़िल्में बहुत कम देखता हूँ क्योंकि आजकल की फ़िल्में मुझे पसंद ही नहीं आती। नयी फ़िल्में कोई एकाध देखी होगी। नीरज कहने लगा खाना खाकर रात को फ़िल्म देखने चलते हैं आईनॉक्स में। मैं होटल में क्या करता? मैने भी कहा ठीक है। नीरज आईनॉक्स टिकिट लेने चला गया और मैं होटल में आ गया।

जब तक नीरज टिकिट लेकर आता तब तक मैं लैपटॉप का उपयोग करने लगा। एक पोस्ट पर पाबला जी की टिप्पणी दिखी कि हो सके तो कल हम भी नागपुर में होंगे। मैने उसके बाद पाबला जी को खुब फ़ोन लगाया,लेकिन फ़ोन ही नहीं लगा। रात के खाने में बिरयानी मंगाई गयी। नीरज नानवेज नहीं लेता,इसलिए उसने सादा खाना मंगवाया। अगर आप नानवेजिटेरियन है और कभी नागपुर आएं तो यहां जमजम की बिरयानी का स्वाद अवश्य लें। बहुत ही लजीज बिरयानी मिलती है। यह रेस्टोंरेंट सेंट्रल एवेन्यु पर ही है। बिरयानी ने तो आनंद ला दिया। मजा आ गया। अब प्लानिंग बन गयी कि यहां से होटल चेक आउट करके ही चलते हैं। फ़िल्म देखकर वहीं से रायपुर के लिए निकल लेंगे। हम होटल चेक आउट करके अपना सामान लेकर फ़िल्म देखने चले गये और वह फ़िल्म थी रावण।

बहुत शोर सुना था पहलु में दिल का,चीरा तो एक कतरा खुन न निकला। रावण के विषय में उसके गाने को लेकर बहुत दिनों से हल्ला मचा हुआ था। लोग कह रहे थे कि फ़िल्म में कुछ दम है और इसके गाने को नक्सलियों ने अपना नक्सल गान बना लिया है। जब फ़िल्म शुरु हुई तो अभिषेक बच्चन, एश्वर्या राय, और गोविंदा समझ में आए। अभिषेक बच्चन राबिन हुड बना हुआ था और पुलिस अधिकारी की पत्नी एश्वर्याराय का हरण करके जंगल में ले जाता है और पुलिस वाला अपनी बीबी को ढुंढते रहता है। बस यही कहानी है फ़िल्म की।
रावण की बकवास

फ़िल्म के सीन अवास्तविक लगे। एश्वर्या का इतनी ज्यादा उंचाई से नदी में कूदना और पेड़ की डाल पर अटकना। उसके पीछे पीछे अभिषेक का भी पानी में छलांग लगाना। फ़िर लताओं के सहारे उसे पहाड़ी पर चढाना। फ़िर गाना शुरु हो जाता है जैसे दोनो में इश्क हो गया हो। पुलिस वाला बैठा बैठा हलाकान होता रहता है। बीबी उधर जंगल में गाना गाती है। गोंविन्दा पगलैट बना घुमता है। यह सब वाहयात आईटम देखकर मुझे तो नींद आने लगी। इंटरवल होते ही मैं तो सो गया। जब फ़िल्म खत्म हुई तो नीरज ने जगाया कि चलिए फ़िल्म खत्म हो गयी। मैने कहा है कि यह तो मेरे लिए बहुत पहले ही खत्म हो गयी थी। क्या  यार एक दम फ़्लाप फ़िल्म दिखाने ले आया। पूरा टैम भी खराब किया।

एक बजे हम रायपुर के लिए निकल लिए। कार विक्की चला रहा था। मैं पिछली सीट पर सोया। रात को ये गाड़ी चलाते रहे। किसी जगह इन्होने ढाबे में रात को बैठकर फ़िर बीयर पी और थोड़ी बहुत गाड़ी चला कर आगे किसी ढाबे में पड़ गए। सुबह 5बजे मेरी आंख खुली तो ये ढाबे में सोए हुए थे। इन्हे जगाया और चलने को कहा। चाय पीकर एक बार फ़िर चल पड़े। रास्ते में पानी गिरने से सड़क के किनारे की मिट्टी कट गयी थी और कीचड़ काफ़ी हो गया था। रायपुर से नागपुर सड़क के चौड़ी करण का काम हो रहा है, मुझे याद है इसे चलते हुए लगभग 10साल हो गए लेकिन अभी तक पूरा नहीं हुआ है। अंजोरा के पास एक ढाबे में आलु के पराठे खाए। भिलाई पहुंचने पर एक बार मन में ख्याल आया कि संजीव तिवारी जी फ़ोन लगाया जाए। लेकिन देर होने का खतरा सोच कर फ़ोन नहीं लगाया सीधे ही निकल लिए।

19 जून से चले हुए 26 जून को 12 बजे घर पहुंचे। बिना प्लानिंग की आवारागर्दी करके। बस दिन रात सड़क ही नापते रहे। रुपयों की भी वाट लगाई और कुछ हासिल भी नहीं हुआ। बस शनि सिंघणापुर और वर्धा ही गए। अचानक आधी रात को उठकर निकलने के यही परिणाम होते हैं। अगर दो चार दिन पहले ही योजना बना लेते ठंडे दिमाग से तो आनंद ही कुछ और रहता। यात्रा का आनंद लेना है तो अपनी गाड़ी से जाने की बजाए, ट्रेन या फ़्लाईट जो सुविधा जेब सह सकती है उससे जाए और इच्छित स्थान पर जाकर टैक्सी किराए कर लें तो वही बेहतर होता है। मुझे यात्रा वही पसंद है जो एक स्थान पर दो चार दिन रुक कर आराम से देखा जाए। भाग-दौड़ और समय की कमी वाली यात्राएं न ही करें तो बेहतर है। यह यात्रा यहीं पर सम्पन्न होती है। पुन: आते हैं अन्य यात्रा स्मरण के साथ।

युद्ध दो मिनट का-विजय दिवस पर विशेष

Indli - Hindi News, Blogs, Links