मंगलवार, 14 जून 2011

राम झरना की सैर

एक गीत सुना था 'जाना था जापान पहुंच गए चीन, समझ गए ना' कुछ ऐसा भी हमारे साथ भी घटित होता है, हम गए थे पारीवारिक कार्य से खरसिया और पहुंच गए राम झरना। सक्ती, खरसिया होते हुए रायगढ बहुत बार जाना हुआ है कार से लेकिन रास्ते में सिंघनपुर की गुफ़ाएं भी हैं। इसका कभी भान नहीं रहा। खरसिया और रायगढ के मध्य में मांड नदी के पार सिंघनपुर आता है। सामने एक विशाल पर्वत दिखाई देता है और उसी में हैं सिंघनपुर की गुफ़ाएं जहाँ आदिम शैल चित्र हैं। जिसकी खोज एन्डरसन द्वारा 1910 ईं के लगभग की गयी थी।जिसकी तिथि लगभग ईसापूर्व ३० हज़ार वर्ष निर्धारित की है।इंडिया पेंटिग्स १९१८ में तथा इन्साइक्लोपिडिया ब्रिटेनिका के १३वें अंक में रायगढ़ जिले के सिंघनपुर के शैलचित्रों का प्रकाशन पहली बार हुआ था

कुछ वर्षों पूर्व इन गुफ़ाओं में शैलचित्रों को देखने गए एक डॉक्टर सैलानी की मृत्यु मधुमक्खी के हमले से हुई थी। तब सिंघनपुर एक बार सुर्खियों में आया था। इस जगह को देखने की तमन्ना मेरी वर्षों से थी जो इस यात्रा में भी पूरी नहीं हुई। खरसिया पहुंचने पर हमारे भतीजी जंवाई (आनंद बाबु) ने कहा कि वापसी के लिए ट्रेन आने में विलंब हैं तब तक नजदीक ही राम झरना देख कर आते हैं अच्छी जगह। इस तरह कहीं घूमने के आग्रह को मैं कभी टाल नहीं सकता। यदि मुझे किसी अन्य आवश्यक कार्य को भी छोड़ना पड़े तो सैर के लिए उसे भी त्याग सकता हूँ। मैने तुरंत हां कर दी और कार से भाई साहब (के सी शर्मा) के साथ चल पड़े राम-झरना की ओर।

खरसिया और रायगढ के बीच में मांड नदी पड़ती है। नजदीकि रेल्वे स्टेशन भूपदेवपुर है। नहर पाली के पास जिंदल ने मोनेट नाम से फ़ैक्टरी लगा रखी है। पहाड़ियों के बीच स्पंज आयरन के अन्य कारखाने भी लगे हैं। गाड़ी में चलते-चलते मैने राम झरना के ऐतिहासिक महत्व के विषय में जानने की चेष्टा की। लेकिन कुछ खास जानकारी प्राप्त नहीं हुई। अब सोचा कि वहीं चल कर पता करेंगे। सामने पहाड़ी मोड़ पर पहुंचे तो सिंघनपुर का यात्री प्रतीक्षालय नजर आया। अब मन में इच्छा हुई कि पहले सिंघनपुर ही चला जाए लेकिन आनंद बाबु ने बताया कि वहां जाने के लिए बहुत समय लगेगा। इसलिए सिंघनपुर जाने का इरादा त्याग दें तो अच्छा ही है और 4 बज रहे हैं, इतने कम समय में सिंघनपुर के से वापस नहीं सकते। हमने कहा फ़िर देखा जाएगा उसे।

थोड़ी ही देर बाद हम राम झरना के मुख्य द्वार पर थे। सड़क के किनारे से जंगल के बीच जाने लिए सुंदर दरवाजा बनाया गया है। साथ ही दो मंदिर भी नजर आए। एक मंदिर गेंरु से पुता हुआ हनुमान जी का था। तभी वहां पर बहुत सारे लाल मुंह के बंद दिखाई दिए। उसके साथ ही चेतावनी देता हुआ बोर्ड भी। जिस पर लिखा हुआ था कि बंदर को कोई भी खाने की वस्तु दें अन्यथा वे आपको घायल भी कर सकते हैं। राम झरना के मुख्यद्वार पर टिकिट खिड़की है। जहां पर प्रवेश की दरें लिखी हुई हैं। एक कोने में बने टिकिट घर में फ़ारेस्ट के कर्मचारी लखपति पटेल बैठ कर टिकिट काट रहे हैं। लेकिन हमारे से उन्होने 30 रुपए लिए और टिकिट नहीं दी और द्वार उन्मुक्त कर दिया। भीतर पहुंचने पर भी विभिन्न तरह के सूचना फ़लक लगाए हुए थे। जिसमें जानकारियाँ और आदेश लिखे हुए थे।

भीतर वन परिक्षेत्र में एक जगह हमें सिंघनपुर जाने के पहाड़ी रास्ते का इशारा करते हुए बोर्ड दिखाई दिया। लेकिन मन मसोस कर ही रह जाना पड़ा। अगर सुबह पता चल जाता तो हम सिंघनपुर की गुफ़ाओं के चित्र आप तक अवश्य पहुंचाते। आगे चलने पर रेस्ट हाऊस दिखा जहाँ 250 रुपए में रुम बुक किया जाता है। रुम बुक कराने के लिए वन विभाग के रेंजर से सम्पर्क करना पड़ेगा। फ़िर एक जगह चीतल होने की जानकारी मिली। कच्चे रास्ते के किनारे लोहे की बाड़ लगा रखी थी। बाड़ के भीतर हमें एक भी चीतल दिखाई नहीं दिया।  

आनंद बाबु ने बताया कि पहले बहुत सारे थे। लगता है कि धीरे-धीरे उन्हे उदरस्थ कर लिया गया। जंगल में कौन देख रहा है कि कितने चीतल गायब हो गए।स्वीमिंग टैंक बनाया हुआ है। स्वीमिंग पुल को तरण पुष्कर का नाम दिया गया है। यहाँ जल किलोल करने का चार्ज 5 रुपया घंटा है साथ में ठन्डे पानी का आनंद मुफ़्त में लिया जा सकता है। गर्मी के मौसम के लिए ठीक है। सर्दी के मौसम में तो 5 रुपए में कुल्फ़ी जम जाएगी। एकाध किलो मीटर चलने पर एक नाका फ़िर दिखाई दिया। एक खाखी वर्दीधारी गार्ड ने गाड़ी देखकर नाका खोला। हम राम झरना के निकट पहुंचे तो वहां बहुत सारी गाड़ियाँ खड़ी दिखाई दे रही थी। अर्थात लोग पिकनिक रत थे। इस जंगल में एक बड़े तालाब जैसा भी है जिसे लोग झील कहते हैं। आनंद बाबु ने बताया कि इस झील में एक बार आस-पास की 7 लड़कियाँ एक ही दिन डूब गयी थी। तब से लोग इस झील के किनारे कम ही जाते हैं।

राम झरना के विषय में किंवदन्ती है कि-"जब भगवान राम इधर आए तो सीता जी को प्यास लगी। सीता जी ने राम जी से कहा कि उन्हे प्यास लग रही है। तो राम जी ने इसी स्थान पर धरती में तीर मारा और जल धारा फ़ूट पड़ी सीता जी ने यहाँ अपनी प्यास बुझाई। तब से यहाँ पहाड़ी से पानी का झरना निकल रहा है।" इस तरह जनमानस के आस्था के केन्द्र बना हुआ है राम झरना। लोग यहाँ पिकनिक मनाने आते हैं। जल का प्राकृतिक स्रोत राम झरना के नाम से प्रवाहित हो रहा है। जो यहाँ की भूमि को भी सिंचित कर रहा है। वन्य प्राणियों को भी जल उपलब्ध करवा रहा है।  

इस झरने पास बंदर बहुत ज्यादा हैं लगभग सैंकड़ों बंदर तो मैने देखे हैं जो अपनी करतूतों से सैलानियों को भयभीत कर रहे थे।वन विभाग ने तो सैलानियों के देखने के लिए कई प्वाईंट चिन्हित कर रखे हैं। आप दिन भर का समय यहाँ वन में आराम से गुजार सकते हैं यह स्थान एक पिकनिक स्पॉट के रुप में स्थापित हो चुका है। शुरुवाती प्रवेश द्वार पर ईको पार्क राम झरना का बोर्ड लगा है। अंदर आकर देखा तो लोग झरने के पास ही गंदगी फ़ैला रहे हैं। वहीं खाना बना कर पत्तल इत्यादि फ़ेंक रहे हैं। पालीथिन जगह-जगह पड़ी हैं। कूड़ा-करकट ही सब तरफ़ फ़ैला हुआ है। समझदार कहाने वाले ही अधिक बेवकूफ़ी करते हैं।

भीतर एक व्यक्ति ने पान की दुकान लगा रखी है।  जिससे गुटखा के रैपर यत्र-तत्र फ़ैले हुए हैं। सुंदर प्राकृतिक रमणीय स्थान के चित्र को विकृत कर रहे थे। बोर्ड भर लगा देने से यह ईको पार्क नहीं बनने वाला इसके लिए आने वाले सैलानियों को अपनी जिम्मेदारी समझ कर इसे साफ़ एवं स्वच्छ रखने का प्रयास करना पड़ेगा।समयाभाव में हम सिंघनपुर नहीं जा सके। लेकिन हमारा प्रयास रहेगा कि आगामी यात्रा में सिंघनपुर अवश्य जाएगें। मुझे वहां पर एक लम्बी गुफ़ा के विषय में भी पता चला है जिसके ओर-छोर का पता नहीं है। कई लोग प्रयास कर चुके हैं भीतर जाकर लेकिन नाकाम रहे हैं। कभी वहाँ भी प्रकाश की व्यवस्था करके भीतर जाएगें नजारे देखने लिए। इस तरह हमने अल्प समय में राम-झरना देखने का आनंद लिया।
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बुधवार, 5 जनवरी 2011

अब चल पड़े केरल की ओर--एक थके हुए युवक से मुलाकात -- केरल यात्रा ---1

उड़ कर केरल की यात्रा तो कई बार की । यहां के कई शहरों को देखा। लेकिन फ़्लाईट से केरल के सौंदर्य का मजा नहीं लिया जा सकता। इसलिए हमने तय किया कि अब ट्रेन के स्लीपर क्लास में सफ़र करना चाहिए। केरल के कोल्लम शहर में वहां के आर्टिसन वेलफ़ेयर कार्पोरेशन के चेयर मेन श्रीमान सरसप्पन जी रहते थे (अब दिवंगत हो गए हैं) उनसे मिलने का कार्यक्रम था और तिरुअनंथपुरम में एक कार्यक्रम में भी शरीक होना था। इस कार्यक्रम का निमंत्रण मुझ तक पहुंचा तो मैने सुमीत को भी केरल यात्रा के लिए तैयार किया। वह तैयार हो गया। बरसात के मौसम में ट्रेन से केरल का सफ़र इतना आनंद दायक होगा मुझे पता नहीं था। लेकिन अंदाजा था कि हरियाली देखने का स्वर्गिक आनंद मिलेगा।

हमने केरल की यात्रा कोचीन एक्सप्रेस से करने की ठान ली। रायपुर में कोचीन(Korba Tiruvananthapuram ) एक्सप्रेस हम रात साढे ग्यारह बजे रायपुर से रवाना हुए। हमारे एक मित्र टी एस कोंडल को दुर्ग से इसी ट्रेन से हमारे साथ चलना था। जब हम ट्रेन में सवार हुए तो 28 तारीख थी और दुर्ग पहुंचे तो 29 तारीख हो चुकी थी। आधा घंटे के फ़र्क से तारीख बदल गयी। ट्रेन की टिकिट लेने में कभी-कभी रात के समय बदलने के कारण बहुत लोचा हो जाता है। इसलिए समय का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। दुर्ग पहुंचने पर कोंडल जी मिल गए। उनके पुत्र ट्रेन में बैठाने आए हुए थे। अब एक सरदार भी हमारे साथ हो गया।

कुछ देर ट्रेन चलने के बाद एक दुबला-पतला 24-25 साल का केरलियन नौजवान नजर आया। उसकी हरकतें कुछ असामान्य थी। कभी अपनी सीट से उतरता था तो कभी डिब्बे में बड़बड़ाता हुआ चलता था। एक कोने से दूसरे कोने तक। मैने सुमीत को उसकी हरकतें बताई तो उसने भी ध्यान दिया। रात को कहीं चलती ट्रेन से गिर गया तो जान से जाएगा। अब हमारा ध्यान उसकी तरफ़ चला गया। सरदार जी अपनी बर्थ पर आराम फ़रमाने लगे। सुमीत ने उस लड़के से बातचीत शुरु की। तो पता चला कि वह इलेक्ट्रिकल इंजिनियर है और चांपा के पावर प्लांट में काम करता है। वर्क लोड अधिक होने के कारण उसे वर्क सिकनेश की बीमारी हो गयी है। उसके दिमाग पर काम का बोझ कुछ अधिक पड़ गया। इसलिए कम्पनी ने उसे रेस्ट करने के लिए छुट्टी दे दी है।

वर्तमान में ऐसे नौजवानों का बहुत शोषण हो रहा है। इंजिनियर और एम बी ए करने वालों की मांग अधिक है। कम्पनियाँ कैम्पस इंटरव्यु करके इन्हे लाखों के पैकेज में नौकरी देती हैं और मां बाप भी खुश हो जाते  हैं कि बेटे की नौकरी अच्छी कम्पनी में लग गयी और तनखा भी अच्छी है। लेकिन उस वेतन के पैकेज से प्रतिभा को बांध कर शोषण किया जाता है। चौबीस घंटो की नौकरी हो जाती है। बस लगातार उसे दौड़ते ही रहना है। अपने काम में खटते ही रहना है। उसकी अपनी जिन्दगी तो जैसे समाप्त ही हो जाती है। कम्पनी का चलता फ़िरता रोबट बन कर रह जाता है। बिना हाड़ मांस का हृदय विहीन नौकर बन जाता है। इससे उसके स्वास्थ्य और मनोमस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है जिससे वह अवसाद की स्थिति तक पहुंच जाता है। इसके बाद कम्पनियां उसे निकाल बाहर करती हैं। एक प्रतिभा का अंत इस तरह हो जाता है। इस नौजवान की स्थिति भी कमोबेश इसी तरह की थी। वर्क सिकनेश का शिकार होकर अपने घर जा रहा था। मैं सोते-सोते भी इसी के बारे में सोच रहा था।

हमारी सुबह बल्हारशाह स्टेशन पर होती है। स्टेशन पर भिखारियों की बाढ है। लेकिन यहां के भिखारी रुपए पैसे नहीं मांगते। ये सिर्फ़ खाने के लिए रोटी मांगते हैं सवारियों से। यह मैने बल्लारशाह में ही आकर देखा। साथ ही इस स्टेशन से ट्रेन में नर जैसी नारियाँ भी चढती हैं। ताली ठोंक कर सवारियों के सर पर सवार हो जाती हैं। बिना कुछ लिए जाती नहीं। ट्रेन के सफ़र में मैने देखा है कि इनको रोकने की हिम्मत कोई टी टी या पुलिस वाला नहीं करता। सवारियों को लुटते हुए देखते रहते हैं। शायद इनका भी कुछ हफ़्ता महीना इनसे बंधा रहता है। तभी इतनी निर्भिकता से ये ट्रेन में सवार हो जाते हैं।

बल्हारशाह से टेन आगे चली, थोड़ी देर बाद वातावरण में अजीब सी दुर्गंध फ़ैल गयी। मैने गन्ध पहचानी क्योंकि एक बार अमलाई भी जा चुका हूँ। यह सिरपुर कागजनगर था। यहां कागज का कारखाना है। जिसके कारण यहां बदबू आ रही थी। आगे रामागुंडम आने वाला था। इस मार्ग पर मैं खाना रामगुंडम में लेता हूँ। क्योंकि पत्तल में अरवा चावल के साथ रसम, सांभर, छाछ और सब्जी के अचार के साथ अच्छा खाना मिल जाता है। रामागुंडम में हमने खाना लि्या और खिड़की से नजारे देखते रहे प्रकृति के। बरसात नहीं थी। जुलाई का महीना चल रहा है। वातावरण में उमस भी बहुत थी। बरसात होने से कुछ राहत मिलती। हमारे साथ कोरबा के एस ई सी एल में काम करने वाले त्रिसुर निवासी एक यात्री भी थे। उनका नाम मुझे याद नहीं आ रहा। समय गुजारने के लिए हमने ताश खेलना शुरु किया। कोंड़ल जी भी  आ चुके थे। सुमीत ने उस इंजिनियर लड़के को भी सेट किया। अब हम चार हो चुके थे और बाजी जम गयी।रात ट्रेन चेन्नई पहुंची। रायपुर से चेन्नई के 24 घंटे लगते हैं। चेन्नई में हमने दोसा लिया नारियल चटनी के साथ। बहुमत ने कहा आराम किया जाए।

नोट- कुछ चित्र गुगल से साभार

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शनिवार, 25 दिसंबर 2010

जान बची लाखों पाए -- लौट के पदयात्रा से घर को आए -- बाबा धाम यात्रा -- अंतिम भाग


हमने अपना सामान संभाला और धर्मशाला से बाहर निकले। देखा की मेरी लाठी गायब है। उसकी जगह कोई अपनी पतली सी लाठी छोड़कर चला गया था। मैनें वह लाठी सुईया पहाड़ के नीचे बह रही नदी में पायी थी। अच्छी मोटी लाठी थी,जो कि सफ़र में सहारा बनी हुई थी। मुझे लाठी न पाकर अफ़सोस हुआ कि चोरों की निगाह लाठी पर भी है। अगर कोई जरुरतमंद मांग लेता तो मैं दे देता। अब छड़ी से ही काम चलाना पड़ेगा सोचकर मैने छड़ी उठाकर यात्रा प्रारंभ कर दी। जब चलने लगा तो ऐसा लगा कि बहुत ही फ़ुर्ती आ गयी है। मैने देवी से कहा कि –“मैं आगे निकल रहा हूँ मेरे से धीरे नहीं चला जा रहा है। अगले स्टाप पर मिलता हूँ। मैं दौड़ता ही जा रहा था। कदम रुक ही नहीं रहे थे। इस तरह लगातार ढाई घन्टे चला।
एक धर्मशाला नजर आई, मुझे गोहाटी में एक सज्जन मिले थे और इस धर्मशाला में आने का विनम्र आग्रह किया था। इस आसाम की धर्मशाला को देख कर मुझे उनकी याद आ गयी। मैने जल रखा और धर्मशाला के अंदर गया। बहुत बड़ी जगह में धर्मशाला निर्माण किया गया था और अस्थाई टेंट लगा कर भी रुकने की व्यवस्था की गयी थी। मैने सोचा की सब लोग पीछे हैं तो थोड़ी रुक जाता हूँ। मैने पानी पीया ही था। तभी गेट की तरफ़ मेरी निगाह गई तो देवी जैसा कोई दिखाई दिया। मैने पानी का गिलास फ़ेक कर दौड़ लगाई तो देखा हमारे ही साथी थे। वे भी रफ़्तार से ही चल रहे थे। अगर मैं देख नहीं पाता तो उनसे पीछे रह जाता और हम बिछड़ जाते।
आठ बज रहे थे। अचानक मुसलाधार वर्षा होने लगी। हमें किसी भी तरह टनटनिया तक जाना था। हमने एक टैंट में शरण ली। मैं तख्त पर बैठा तो बैठा ही नहीं गया। पिंडलियों को हाथ लगाया तो वे पत्थर जैसी हो चुकी थी। देवी भाई ने जैसे ही मेरी पिंडली को दबाया तो दर्द के मारे आँख से आँसू निकल आए। बहुत ही अधिक दर्द था। बरसात रुकने लगी। बरसात रुकते ही हमने फ़िर से चलने का मन बना लिया। हम चल पड़े, जमीन ठंडी हो चुकी थी। हमने बिहार की सीमा से बाहर निकल कर झारखंड की सीमा में स्थित कलकतिया में रुकने का मन बनाया। लगभग 10/30 बजे कलकतिया पहुंचे और एक झोपड़ी में देरा लगाया। यहाँ पहुंच कर लगा कि अब हम बाबा धाम पहुंच गए हैं। रात को चावल और सब्जी खाई। सोने के समय न जाने कहां से मच्छर आ गए। ओडोमास का प्रयोग किया गया कि नींद आ जाए उसके बाद तो चाहे मच्छर उड़ा ही ले जाएं।
सुबह स्नान ध्यान के पश्चात 6 बजे हमने एक बार फ़िर चलना शुरु किया। यह हमारी यात्रा का अंतिम चरण था। 7 बजे मैं भूत बंगला पहुंच गया था। जहां से मंदिर सिर्फ़ 2 किलोमीटर दूर है। यहां रुक कर मैने साथियों का इंतजार किया। वे आधे घंटे विलंब से पहुंचे। नीनी महाराज गुस्सा हो रहे थे और कह रहे थे कि जितना हम मंजिल के नजदीक पहुंचते जा रहे हैं देवी की रफ़्तार कम होते जा रही है। हम धोबी तालाब का एक चक्कर लगा कर मंदिर के पास पहुचे। दर्शनिया से बोल बम की एक किलोमीटर लम्बी कतार लगी हुई थी। हम भी धीरे धीरे सरकते रहे उनके साथ। दो घंटे बाद हम मंदिर के दरवाजे तक पहुंचे। अंदर जाने पर देखा कि तीन मंजिल के प्लेट फ़ार्म पर रस्सीयाँ बांध कर भूल भूलैया जैसा बनाया गया है। बीच में दो चार ढोल बजाने वाले है और पुलिस वाले सभी को इन रस्सियों के बीच से दौड़ा रहे हैं। हम भी दौड़े तब कहीं जाकर बाबा के मुख्य दरवाजे तक पहुंचे।
मंदिर का मुख्य दरवाजा छोटा है और वहां पर पुलिस का पहरा। 50-60 कांवड़ियों के दल को एक साथ छोड़ा जाता है। मंदिर के अंदर पहुंच कर मैने जल चढाया और विग्रह को हाथ से छूने के लिए शिवलिंग के सामने बैठ गया। बैठते ही पंडो ने छड़ी चलानी शुरु कर दी। सिर पर छड़ी से मारने लगे। उठो उठो, मैने अपने हाथ में रखे 20 रुपए का एक नोट उसे दिया। तो दूसरे पंडे की छडी चलनी शुरु हो गयी। इसके बाद मैने उठने की कोशिश की। लेकिन लोगों के हूजुम ने मेरे कंधे दबा दिए। मैं उठ ही नहीं सका। पूरी ताकत लगाई फ़िर भी दरवाजे से आते हुई भीड़ मेरे कंधों पर ही आ पड़ती थी। फ़र्श गीला होने के कारण पैर जम नही पा रहे थे। उपर से छड़ी की मार असह्य हो रही थी। एक बार फ़िर ताकत लगाई तो उठ पाया और मंदिर के बाहर दौड़ कर निकला तब सांस ली। एक बारगी तो लगा कि जान ही निकल जाएगी।
बैद्यनाथ मंदिर का वास्तु शिल्प 7 वीं शताब्दी का और बलूए पत्थर से निर्मित है। इसके सामने आंगन के उस पार पार्वती माता का मन्दिर है। इस प्रांगण में बहुत भीड़ थी। सभी पंडों ने अपनी अपनी चौकियां लगा रखी थी। जिस पर बैठ कर अपने नए पुराने जजमानों की जेब ढीली कर रहे थे। हम लोग भी खाना खाकर आराम करने के लिए पंडे के घर चले गए। मैने दो घंटे आराम किया। नीनी महाराज और देवी घुमने चले गए थे। मै और उमाशंकर बाहर निकले, सेविंग कराई,चप्पल खरीदे, चाट खाई और पुन: मंदिर की ओर चल पड़े। उमाशंकर शयन आरती करना चाहते थे। तभी डॉक्टर का फ़ोन आया उसने पूछा कि हम कहां है? मैने बताया कि पंडे के पास बैठा हूँ मंदिर में यहीं आकर मिल लें। हम सब मंदिर में मिले। बिछड़े हुए एक दिन हो गया था।
रात को भोजन के पश्चात हम आटो से जस्सीडीह पहुंचे, जस्सीडीह लगभग 12 किलोमीटर है देवघर से। टिकिट हमारे पास ही थी, इसलिए दूसरे दल को हमारे पास ही आना था। रात को डेढ बजे साऊथ बिहार एक्सप्रेस आई। हम सबने अपनी-अपनी बर्थ संभाल ली। दोपहर तक सोते रहे। 12 बजे टाटानगर में इडली  का प्रसाद लिया। इडली लेते हुए टाटानगर में कहीं मेरी जेब से पैसे गिर गए। तो दिनेश से मुझे घर तक पहुंचने के लिए 30 रुपए लेने पड़े। 21 जुलाई की रात साढे नौ बजे हम रायपुर पहुंचे। स्टेशन पर रवि श्रीवास मौजुद थे। उन्होने मुझे स्टेशन से काली बाड़ी तक पहुंचाया। जहां से मुझे रात को जगदलपुर वाली बस मिली। घर पहुंच कर मुझे लगा कि एक बार फ़िर इस यात्रा पर चलना चाहिए। बहुत स्फ़ूर्ति दी इस यात्रा ने। एक असंभव सी लगने वाली पदयात्रा सम्पन्न करके मेरा रोम-रोम खुशी से भर उठा। एक बार फ़िर इस यात्रा को करने की तमन्ना है।
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