गुरुवार, 17 जून 2010

"चलती का नाम गाड़ी" से चलिए तुरतुरिया-लव कुश की जन्म भूमि

मित्रों, पाठकों की मांग पर हमने 'चलती का नाम गाड़ी' नामक यह ब्लाग प्रारंभ किया है, आपको यहां यात्राओं से संबंधित वृतांत पढने मिलेंगें। इसी के शुभारंभ की कड़ी में चलिए आज तुरतुरिया चलते हैं.बरसात हुयी है, मौसम ठंडक है. ऐसे में इस प्राचीन स्थल का भ्रमण करना लाभ दायक होगा. रायपुर से लग भग १५० किलो मीटर दूर वारंगा की पहाड़ियों के बीच बहने वाली बालमदेई  नदी के किनारे पर स्थित है तुरतुरिया. यहाँ जाने के लिए रायपुर से बलौदा बाजार से कसडोल होते हुए एवं राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर सिरपुर से कसडोल होते हुए भी जा सकते हैं. इसका एतिहासिक, पुरातात्विक, एवं पौराणिक महत्त्व है. तुरतुरिया का बारे में कहते हैं कि श्री राम द्वारा परित्याग करने पर वैदेही सीता ने यहाँ पर वाल्मीकि आश्रम में आश्रय लिया था. उसके बाद लव-कुश का जन्म यहीं पर हुआ था. रामायण के रचियता महर्षि वाल्मीकि का आश्रम होने के कारण यह स्थान तीर्थ स्थलों में गिना जाता है.

सन 1914 में तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एच.एम्.लारी ने इस स्थल का महत्त्व समझने पर यहाँ खुदाई करवाई थी. जिसमे अनेक मंदिर और सदियाँ पुरानी मूर्तियाँ प्राप्त हुयी थी. पुरातात्विक इतिहास मिलने के बाद इसके पौराणिक महत्व की सत्यता को बल मिलता है.यहाँ पर कई मंदिर बने हुए है. जब हम यहाँ पहंचते हैं. तो हमें सबसे पहले एक धर्म शाला दिखाई देती है जो यादव समाज ने बनवाई है.कुछ दूर जाने पर एक मंदिर है. जिसमे दो तल हैं, निचले तल में आद्य शक्ति काली माता का मंदिर है. दुसरे तल में राम जानकी मंदिर है. जहाँ संगमरमर की मूर्तियाँ हैं. साथ में लव कुश एवं वाल्मिकी की मूर्तियाँ हैं. मंदिर के नीचे बांयी ओर एक जल कुंड है. जल कुंड के ऊपर एक गौमुख बना हुआ है. जिसमे डेढ़ दो इंच मोटी जलधारा तुर-तुर-तुर की आवाज करती हुयी लगातार गिरती रहती है. शायद इसी कारण इस जगह का नाम तुरतुरिया पड़ा है.

माता गढ़ नामक एक अन्य प्रमुख मंदिर है. जहाँ पर महाकाली विराजमान हैं. नदी के दूसरी तरफ एक ऊँची पहाडी है. इस मंदिर पर जाने के लिए पगडण्डी के साथ सीडियां भी बनी हुयी हैं.माता गढ़ में कभी बलि प्रथा होने के कारण बंदरों की बलि चढ़ाई जाती थी. लेकिन अब पिछले 15 -20 सालों से बलि प्रथा बंद है. अब यहाँ सिर्फ सात्विक प्रसाद चढ़ाया जाता है. माता गढ़ में एक स्थान पर वाल्मिकी आश्रम तथा आश्रम जाने के मार्ग में जानकी कुटिया है. यह एक लोक मान्यता है.

यहाँ प्रति वर्ष पौष की पूर्णिमा के दिन मेला भरता है. कवि वाल्मिकी की कर्म भूमि.बौद्ध साधकों की तपोभूमि और शाक्तों की साधना भूमि के भाव त्रिकोण , धर्म, काम, मोक्ष  के पुरुषार्थ त्रय के दिव्य त्रिकोण और शैल शिखरों से निर्मित सहज प्राकृतिक भूमि क्षेत्र दर्शनीय है. मेला भरने के समय हजारों श्रद्धालुओं का तुरतुरिया आगमन होता है. धार्मिक एवं पुरात्रत्विक महत्त्व के साथ यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य की भी छटा निराली है. चारों ओर गहन जंगल है और इसमें मोर, चीतल, सांभर, बराह, तेंदुआ, बाघ, भालू इत्यादि वन्य प्राणी भी निवास करते है. कुल मिला कर दर्शनीय स्थल है. यहाँ पर आकर देखें साक्षात् प्रकृति सौंदर्य का लाभ मिलता है.       
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7 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी शुरुआत है. में यहाँ बार बार आना चाहूँगा. अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा.

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  2. हाँ इस जगह के विषय मैं मैंने भी सुन रखा है. लेकिन कभी जाने का मौका नहीं मिला. लेकिन अब कभी वक़्त निकाल कर जाना ही पड़ेगा. सुंदर पोस्टिंग के लिए बधाई. एक विनम्र अनुरोध है, यात्रा वृतांत का मज़ा तो फोटो से ही है. इसलिए अबकी बार अधिक से अधिक फोटो हम देखना चाहिंगे.

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  3. अच्छी जानकारी......
    कभी आना हुआ तो निश्चय ही आपके लेख काम आयेंगे.....

    शुभकामनाएं.

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  4. इस जगह के बारे में पहले नहीं सुना था।

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