मंगलवार, 21 जून 2011

मणिधारी सर्प और सोनकुंड से बांधवगढ की ओर - यात्रा-1

र्षों की तमन्ना थी कि कभी बांधवगढ का किला देखा जाए। लेकिन वहाँ जाने का योग ही नहीं बन रहा था। 18 तारीख को सुबह सुमीत का फ़ोन आया कि-“ भैया बांधवगढ़ चलेंगे। मुझे मनचाही मुराद मिल गयी। मैने कहा कि-“कब चलना है? उसने बताया कि आज ही चलते हैं। मैं तुरंत तैयार हो गया। रात को लगभग 9 बजे हम लोग बांधवगढ की ओर चल पड़े। ड्रायवर को मिला कर हम तीन ही थे। पहला पड़ाव हमने पेंड्रारोड़ को बनाया। मैं तो खाना खाकर सो गया। पेंड्रारोड़ में हमने सुरभि लाज में रुम फ़ोन पर बुक कर लिया था। जब भी पेंड्रारोड़ आते हैं तो हम यहीं रुकते हैं। लगभग 3 बजे सुमीत ने जगाया कि-“उठो भैया पेंड्रारोड़ आ गया।“ आंखे मलते हुए देखा तो गाड़ी सुरभि लाज के सामने खड़ी थी। रुम में अंदर होते हैं बिस्तर में घुस गए। बहुत ठंड थी यहाँ पर।

सुबह 9 बजे तक सोते रहे। तब तक गुड्डु (शरद सरोरा) भी आ चुका था। साथ हमने चाय पी और तैयार होकर मरवाही ब्लाक में स्थित सोनकुन्ड की ओर चल पड़े। सोनकुंड मैं पहले भी गया हूँ। लेकिन इसके एतिहासिक महत्व पर कभी ध्यान नहीं दिया। यहां शोणभद्र और नर्मदा का मंदिर है। एक जल का कुंड और बाबा जी का धूना भी है। यहां एक बाबा जी निवास करते हैं और यहां मेला भी भरता है। हम सोनकुंड पंहुचे यहां हमें कुछ मित्रों से मिलना था। वे भी पहुंच चुके थे। चंद्रभान, शनिराम, फ़ूलचंद इत्यादि। तभी गुड्डु को एक पेड़ पर अमरुद दिख गए। वह उसे तोड़ने का प्रयास करने लगा। एक बाबा जी वहां पर थे उन्होने गुड्डु को और भी पेड़ बताए और कहा कि वहां से तोड़ लो। वे छोटे पेड़ हैं अमरुद हाथ आ ही जाएंगे।

मैने बाबा जी से इस स्थान के महत्व के विषय में चर्चा की तो उन्होने बताया कि यह स्थान मानस तीर्थ शोण भद्र का उदगम स्थल है इस स्थान को सोनकुंड कहा जाता है। इसी कुंड से उसका उदगम हुआ है। यह नदी नही उसका नर रुप नद है। मैने नदी के नर रुप में होने के विषय में ब्रह्मपुत्र (लोहित) को ही जाना था। लेकिन शोणभद्र के नद रुप होने की जानकारी पहली बार मिली। उन्होने बताया कि शोण राजा मैकल की पुत्री रेवा से विवाह करने के लिए अमरकंटक गए थे। अमकंटक के रास्ते में जोहिला नदी पड़ती है। वह रेवा की दासी रही है। खुबसूरत और चतुर होने के कारण उसने रेवा का रुप धर लिया और उसके कपड़े गहने पहन कर शोण को मोहित करके ब्याह करने के लिए चली आई।विवाह का पहला फ़ेरा ही हुआ था तभी रेवा को पता चला कि दासी जोहिला से शोण विवाह कर रहे हैं। वह विवाह स्थल पर चली आई।

रेवा ने शोण की तरफ़ क्रोधित होकर देखा, रेवा के क्रोध का सामना शोण नहीं कर सके उन्होने सिर झुका लिया। इसके घटना के बाद वह शोण से शोण भद्र कहलाने लगे। क्योंकि सिर का झुकना याने भद्र होना होता है। रेवा को भी अपनी गलती का अहसास होता है तो वह ग्लानिवश उल्टी दिशा (पश्चिम) की तरफ़ बहने लगती है। नर का मर्दन (अपमानित) करने के कारण रेवा का नाम नर्मदा पड़ा। वापस आकर शोण जी मानस कुंड से शोण भद्र के रुप में प्रवाहित होने लगे। जोहिला कुछ दूर तक प्रवाहित होकर लुप्त होकर शोण से मिल जाती हैं।शोण भारत की सबसे चौड़ा नद है। झारखंड सोनपुर और गढवा घाट पर 99 पाए का पुल 6 किलोमीटर लम्बा बना हुआ है। इस पुल पर सात मेल एक्सप्रेस एक साथ खड़ी हो सकती है।

पेन्ड्रा रोड़ से 13 किलोमीटर दूर एक गांव कारीआम है। इसका पुरातन नाम श्री गणेशपुरी कारी ग्राम है। पेन्ड्रागढी के मालगुजार लाल अमोल सिंह ने कालीग्राम मंदिर की माँ काली की मूर्ती को पेन्ड्रागढी में लाकर स्थापित कर दिया जिसके कारण उन्हे शापित होना पड़ा। उनका परिवार धीरे धीरे समाप्त होने लगा। राजा और रानी सोनकुंड में पूजा करने आते थे। तो उन्होने स्वामी एकनाथ जी को अपनी समस्या बताई। तो उन्होने कुंड एवं शिव जी का एक मंदिर बनाने को कहा। तब लाल अमोल सिह ने यहां कुंड एवं शिव का मंदिर बनाया। जिससे वे शाप मुक्त हुए।

यहां त्रिभुवन नाथ नामक शिव जी का विग्रह है जो निरंतर बढते ही जा रहा है।इसकी स्थापना स्वामी एकनाथ जी ने ही की थी। बाबा जी ने बताया कि 6 साल में शिव लिंग 6 इंच बढ चुका है। इस मंदिर की छत अस्थाई है जब शिवलिंग और अधिक बढा जाएगा तो छत हटाई जा सकती है। छत का निर्माण इसी हिसाब से किया गया है। यहाँ तरह तरह से सर्प भी हैं। बाबा जी कहते हैं कि उन्होने यहां मणिहारी सर्प भी देखा है। वह श्वेत रंग का है उनका दर्शन कभी कभी होता है। एक बड़ा नाग सर्प भी है जो आश्रम की चालिस जरीब जमीन भ्रमण करता है। राजा ने इस आश्रम को 70 एकड़ जमीन दी थी। जिस पर खेती होती है।गुरु पूजा पर्व पर यहां मेला भरता है और 20 क्विंटल धान कोठियों से निकाला जाता है। यह धान 6 वर्ष पुराना होता है। इस धान की खपत एक दिन में ही होती है। 

गुरु पूजा के अवसर पर 20 क्विंटल महुआ के लड्डु बनाए जाते हैं प्रसाद के रुप में भक्तों को वितरित करने के लिए। महुआ से दारु बनाते हुए तो देखा सुना था लेकिन महुआ के फ़ूल से लड्डु बनाए जाने की बात सुनकर कुछ उत्सुकता बढी कि यह लड्डु कैसे बनाए जाते हैं और उसका स्वाद कैसा होता है? बाबा जी ने महुआ से सिद्द करके बनाया हुआ प्रसाद खिलाया। बड़ा स्वादिष्ट था। उनसे महुआ का प्रसाद मांग कर मैं घर भी लेकर आया। एकदम चाकलेटी स्वाद लगा। इस महुआ प्रसाद  को बनाने का तरीका भी मैने बाबा जी से पूछा। उन्होने बताया कि पहले महुआ के फ़ूलों को कड़ाही में धीमी आंच पर भूना जाता है। जब फ़ूल चुटकी में लेने से फ़ुटने लगे तो उसे कूटा और पीसा जाता है। इसी तरह समान मात्रा में अलसी और तिल को भी भूना जाता है। महुआ फ़ूल,अलसी और तिल के चुर्ण को देशी घी में सिद्ध किया जाता है।

महुआ चुर्ण में काजु किसमिश बादाम इत्यादि मेवे भी डाले जाते हैं। इसमें थोड़ा सा गुड़ मिलाकर लड्डू बांध लिया जाता है। जिसे गुरु पूजा पर भक्तों को प्रसाद के रुप में दिया जाता है। यहां का धूना सैकड़ो वर्षों पुराना है जिसमें अनवरत अग्नि प्रज्जवलित हो रही है। धुने को शीश नवाने लोग आते हैं। बम बम भोले का चिलम प्रसाद भी यहां चलता है। चिलमची भक्त भी पहुंचते हैं। धुने पर एक भैरव (कुकुर देव) भी दिखे। ये हमेशा धुने पर ही बैठते हैं। तभी एक बिल्ली आकर मेरी गोदी में बैठ गयी। कुकुर और बिलाई दोनो साथ-साथ रह नहीं सकते। दोनो का बैर जग जाहिर है। लेकिन यहाँ दोनो एक साथ दिखाई दिए। साथ-साथ ही रहते हैं।
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रविवार, 19 जून 2011

भेड़ाघाट और धुंवाधार पर पनिहारिन से भेंट

कालबेल बजने से सुबह हूई और खटिया की चाय पहुंच गई। समय देखा तो आठ बज रहे थे। मिसिर जी याद आ गए कि जल्दी तैयार होना है। गुरुदेव खुमारी में थे,लेकिन भेड़ाघाट और धुंवाधार दर्शन के लिए तैयार होना ही था। जो प्राकृतिक सौंदर्य किताबों में पढा और चित्रों में देखा उसे प्रत्यक्ष देखने का उत्साह था। हम फ़टाफ़ट तैयार हो गए। मेरा नाश्ता करने का मन नहीं था। सिर्फ़ गोरस लिया और अवधिया जी ने नाश्ता किया विजय सतपती जी के साथ। नाश्ता करते करते मिसिर जी का फ़ोन आ गया कि वे पहुंच रहे हैं। गिरीश दादा को लेकर आते हैं। लेकिन दुश्मनो की तबियत नासाज हो गयी, गिरीश दादा को बुखार आ गया। रात ही कहा था कुछ ले लीजिए, स्वास्थ्य ठीक रहेगा। लेकिन बात न मानने की सजा भुगतनी पड़ती है। लग गयी न सर्दी,यही होता है बुजुर्गों की बात न मानने का नतीजा। ये आज कल के लड़के समझते कहां हैं किसी को?

सो मिसिर जी पहुंच गए लेकिन बवाल साहब के इंतजार में बवाल होता रहा। एक मुजरा याद आ रहा था " बड़ी देर से दर पे आखें लगी थी, हुजुर आते-आते बहुत देर कर दी"। इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुई बवाल साहब आ गए। जबलपुरिया पान का आनंद दुकानदार के अंदाज से कई गुना बढ गया। उसने पान बना कर अपने हाथों से खिलाया। मान गए भाई मनुहार का अंदाज गजबै ही था। ऐसा कहीं देखा नहीं। मौसम सर्द हो चुका था हमने भी कंधे पर सफ़ेद कमरी डाल ली, कहीं ठंड न लग जाए। चल पड़े धुंवाधार की ओर। रास्ते में मिसिर जी की शायरी की चर्चा हुई। देश में एक से एक धांसु शायर हुए लेकिन फ़ाड़ु शायर सिर्फ़ मिसिर जी ही निकले। इनके एक एक शेर में बब्बर शेर सी ताकत होती है और दार्जलिंग जी चाय जैसी खुश्बु के साथ ताजगी। एक बानगी देखिए -- मेरे प्यार को तू झूठी तोहमत न लगा, मेरे जैसा यार तुझे जन्नत में न मिलेगा. आगे देखिए -- जब जर्द पत्ते खूब हवा देने लगे है ,जीने की दुआ..... दुश्मन देने लगे है, गम हद से गुजर कर आने लगे है, उदासी से मंजिल का पता देने लगे है. बस युं ही हंसी के ठहाके लगते रहे और कारवां बढता रहा।

पहुच गए धुंवाधार, दूर से ही उड़न खटोला दिखाई देने लगा। उड़न खटोले पर ही पार चलते हैं धुंवाधार के। हवा में लटक कर प्रकृति का नजारा देखेगें। जो कहीं नहीं देखा वो यहां हुआ, लघु शंका पर भी एक रुपए का टैक्स है। अगर रेजगारी नहीं है तो पेट पकड़े खड़े रहिए। उड़न खटोले की आने और जाने की टिकिट प्रति व्यक्ति 60 रुपए है। मिसिर जी ने टिकिट लिया और हम बैठे उड़न खटोले पर। विजय सतपती, अवधिया जी, हम, मिसिर जी, बवाल साहब उड़ लिए। उड़न खटोले से धुवांधार की  फ़ोटो ली गयी। पार उतरे जाकर, धुंवाधार के नजदीक पहुंचे, लेकिन बरगी डैम में पानी रोक दिए जाने के कारण धुंध नहीं बन रही थी। पर्यट्कों की नासमझी के कारण इस स्थान को काफ़ी नुकसान पहुंचा है। झरने के पास से ही मार्बल खोदा जा रहा है जिससे झरने के प्राकृतिक स्वरुप को नुकसान पहुंच रहा है।पानी की तेज धार ने चट्टानों को छेद कर शानदार कलाकृतियों का निर्माण किया है। यहां  आकर पता चलता है कि प्रकृति से बड़ा शिल्पकार कोई नहीं।

लौट चले अब भेड़ा घाट की ओर तभी बवाल साहब को कूंए पर पानी भरती कुछ पनिहारिने नजर आई और उन्होने ड्रायवर को गाड़ी वापस मोड़ने का हुक्म दिया। बहुत ही मनोरम दृश्य था। एक  पनिहारिन पनघट से सिर पर दोघड़ रखे आगे आ रही थी।  जब से नलके लग गए गांव में तब से ही पनघट की  रौनक खतम हो गयी। पता नहीं इसी पनघट ने कितनों को कवि शायर बनाया। कितने कवि यहां से उर्जा पाते थे। गांव की गोरी और पनघट का सीधा संबंध है। लेकिन नलकों ने पनघट को बर्बाद कर दिया। अब तो कूंए की मुंडेर पर कौआ भी नहीं बैठता। पनघट पर पहुंचते ही बवाल साहब ने “माटी की गागरिया” नामक कविता सुनाई। सही मौके पर सही चोट। फ़िर क्या कहने थे। शब्द शब्द अंतरमन तक उतर गए। हम अंतर में ही तैरते रहे।

ये कंकाल मन के साथ जुड़ा है और मन यार के साथ जुड़ा है। यार और मन का मिलन हो गया। कंकाल कहीं पीछे छूट गया। बुराईयों की जड़ कंकाल में है, मन के साथ बुराईयां भी चली आती है कंकाल की, लेकिन यार की चलनी में सब छन जाता है।कूड़ा ठिकाने लग जाता है, निर्मल मन ही वहां तक पहुंच पाता है। तभी यार से मिलन हो पाता है। बस आनंद ही आनंद पनघट से गागर में भर कर मैं चल पड़ा। कब पंचवटी आई पता ही नहीं चला। भेड़ाघाट पहुंच कर नर्मदा जी के दर्शन हुए। विशाल जल राशि नर्मदा का बहता हुआ पानी, बस एक ही आवाज निकली नर्मदे हर, नर्मदे हर।

बवाल भाई ने नाव तय की 400 रुपए में। मिसिर जी को कल से बुखार था। बवाल भाई दिल पर हाथ रखे बैठे थे, दिल की बीमारी जो है, दिल लगा बैठे हैं उस यार से। बस रुहानी अंदाज में ही गाते हैं। हमारे कहने पर चल पड़े भेड़ाघाट में नर्मदा जी की सैर में। सैर नहीं, मां नर्मदा की गोद में किलोल करने। नाव चलते जाती है, संगमरमर का अद्भुत सौंदर्य सामने आता है, मल्लाह कहता जाता है और हम सुनते जाते हैं। एक जगह पहुंच कर बोला- “यह मगरमच्छ की खोह है। एक फ़ैमिली रहती है, हम दो हमारे दो, दो बड़े दो बच्चे, देखना है किसी को? तो एक मित्र ने कहा देखना है। तो वह बोला – “ एक को फ़ेंक दो बाकी को दिख जाएगा। हा हा हा” कितना उम्दा तरीका बताया मगरमच्छ देखने का।

 
एक जोड़ी चप्पु चल रहे हैं नाव आगे बढती जा रही है। मैं सोचता हूं कि अगर किनारे बैठा रहता तो इस अद्भूत मरमरी सौंदर्य के दर्शन नहीं कर पाता। ईश्वर ने आंखें सौंदर्य देखने के लिए दी हैं और इसे देखने के लिए गहरे ही उतरना पड़ता है। एक स्थान ऐसा आता है कि जहाँ पहुंचते ही लगता है कि अब यहीं रम लिया जाए। इस स्थान पर भगवान दत्तात्रेय की साधना स्थली एक खोह के रुप में है। यह वह स्थान हैं जहां पुण्यात्माओं ने साधना करके उपस्थान को पा लिया। नि: संदेह समाधि लग जाती होगी। अगर कोई जुता जुताया खेत हो तो उसमें भरपूर फ़सल होने की संभावना रहती है। रास्ते में एक भूल भूलैया के बाद हम बंदर कूदनी तक पहुंचते हैं। यहां पर दोनो पहाड़िया आपस में मिली हूई इतनी नजदीक है कि नर्मदा के आर पार बंदर कूदा करते थे। यहां वापस मुड़ गए, एक स्थान पर मोक्ष बिंदु है, जहां से लोग जान देने के लिए नर्मदा में छलांग लगा देते हैं। पुर्णिमा की चांदनी में संगमरमर की चमक वैसे भी 600 फ़िट पानी में कूदने के लिए मानव मन को आन्दोलित करती होगी है।

यहां पर कई फ़िल्मों की शु्टिंग भी हुई है, जिसमें “जिस देश में गंगा बहती है” बस अब एक गीत सुनने की इच्छा हुई, बवाल भाई ने गाया, “ मेरा नाम राजु घराना अनाम, बहती है नर्मदा जहाँ मेरा धाम।“ संगमरमरी वादियों ने भी सुर में सुर मिलाया। खूब मेला जमा माँ नर्मदा की गोद में। अद्भुत और बहुत ही अद्भुत इसके आगे आकर शब्द सामर्थ्य खो जाता है। बस अपलक निहारता रहा सौंदर्य को। प्रकृति ने संगमरमर पर कई तरह ही अद्भुत शिल्पकारी दिखाई है, कहीं कार, कहीं कमल, कही तपस्यारत योगी, कहीं भालु, कहीं ब्रह्मा विष्णु महेश दिखाई देते हैं। आप जो भी ढुंढना चाहे मिल जाएगा। भाई बवाल के गीत वादियों में गुंज रहे हैं साथ ही मेरे कानों में भी। वापसी पर खाने का समय हो चुका था।

सुबह मैने गोरस ही लिया था इसलिए पेट में चूहे कूदने लगे, इसलिए हम गक्कड़ भर्ता खाने ग्वारी घाट पर चल पड़े, बवाल साहब साथ थे इसलिए लाल साहेब का फ़ोन नहीं आया। ग्वारी घाट में अग्रवाल होटल में जमकर गक्कड़ भर्ता खाए, भूख भी जोरों की लगी थी। कलाकंद भी लिया। भर्ता की सौंधी सौंधी खुश्बु अभी तक साथ है। यहां से होटल सुर्या आ गए, गक्कड़ों ने असर दिखाना शुरु किया, आलस छाने लगा। मिसिर का फ़ोन आया कि वे कैमरा कहीं भूल आए हैं। हम तो उनकी फ़ोटुओं के भरोसे ही थे। हमने ग्वारी घाट होटल में भूल आने का कयास लगाया। जो कि सही था, लेकिन लगता है होटल वाले ने दबा दिया। मिसिर जी का नुकसान हो गया। मिसिर जी कैमरा ढूंढते रहे।
5 बजे दीपक की गाड़ी आ गयी, अवधिया जी बाटलियाँ खाने की जुगत में लग गये।
हम दीपक के साथ 1904 में स्थापित गन कैरिज फ़ैक्टरी देखने चले गए। पास में ही हनुमान जी का मंदिर है विशाल प्रांगण में। महाबली के दर्शन किए, इनके बिना तो हमारा काम ही नहीं चलता। एक अर्जी लगाते ही अच्छे-अच्छों को सुधार देते हैं। यहां से दन्डवत कर, स्टेशन चौराहे पर सांई मंदिर में गए। इस मंदिर को एक जोसेफ़ एन्थोनी नामक इसाई ने बनवाया है उसका नाम पत्थर पर खुदा है। यह देखना अच्छा लगा। हमारी ट्रेन रायपुर के लिए साढे नौ बजे थी। भोजन के पश्चात दीपक ने स्टेशन छोड़ दिया, वहां अवधिया जी मिल गए। ट्रेन लेट आई। ठंड भी बढ गयी थी। टीचर्स की गर्मी भी काम नहीं आ रही थी। कांगड़ी होती तो कुछ ठंड का मुकाबला भी करती। ट्रेन चल पड़ी अंधेरे को चीरते हुए गंतव्य की ओर…………सलाम नमस्ते।
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गुरुवार, 16 जून 2011

जाबालिपुरम यात्रा-1

अथ राष्ट्रीय ब्लागर कार्यशाला जबलपुर कथा:-- जाबाला की नगरी जबलपुर जहां नित्य ही नर्मदे हर का उद्घोष होता है वहां ब्लागिंग पर राष्ट्रीय कार्यशाला के आयोजन का संदेश मुझे समीर दादा और गिरीश दादा से प्राप्त हुआ। उस समय मैं अत्यावश्यक कार्य उत्तर भारत से दक्षिण भारत की यात्रा पर था। मैने वचन दिया कि किसी भी हालत में जिन्दा या मुर्दा कार्यशाला में शामिल होने के लिए समय पर पहुंच जाऊंगा। 29 तारीख की रात 15 दिनों की लगातार यात्रा के बाद घर पहुंचा और 30 तारीख की रात को अवधिया जी को साथ लेकर अमरकंटक एक्सप्रेस से जबलपुर रवाना हो गया।

बिलासपुर स्टेशन में अरविंद झा जी तैनात थे, वे अपनी नयी कृति "माँ ने कहा था" कि कुछ प्रतियां लेकर उपस्थित थे। इनकी इच्छा तो जबलपुर के कार्यक्रम में उपस्थित होने की तो बहुत थी पर विभागीय व्यस्तता की वजह से नहीं जा पा रहे थे। अवधिया जी तो रात होते ही सोम के नाथ हो गए और हम धान के देश में जाड़े से ठिठुरते रहे। अरविंद के आने से सर्दी में कुछ गर्मी का अहसास हुआ। इनके साथ शंकर पांडे भी थे। गाड़ी ने सीटी बजाई और बिलासपुर से अब हम जबलपुर रवाना हो चुके थे। रायपुर की अपेक्षा जबलपुर में कुछ जाड़े का असर होने लगा था यह रास्ते में महसूस हुआ। हमारी ट्रेन एक घंटा विलंब से जबलपुर पहुंची। 

पूर्व में समाचार मिल चुका था कि हमें होटल सुर्या के कमरा नम्बर 120 में बुक होना है। भोर में ही ऑटो से होटल पहुंचे। कुछ देर के विश्राम के पश्चात स्नानादि से निवृत होकर मेजबानों का इंतजार करने लगे।थोड़ी देर के बाद गिरीश भाई का फ़ोन आया और वे गुनगुनाए "ठाड़े रहियो ओ बांके यार"। ओ छोरे तेरे क्या कहने? मजा आ गया, अवधिया जी ने उठकर आईना देखा, हमने भी सुर मिलाया। शायद गिरीश दादा ने मजाक किया हो। पता चला गया कि बांकपन तो अभी भी बाकी है। 

दोपहर को गिरीश दादा सशरीर उपस्थित हो गए और अवधिया जी के साथ गहन विचार विमर्श में लीन हो गए। दोपहर का भोजन हमने साथ में लिया। शाम 5 बजे जबलपुर बी एस एन एल रीजन (सी जी एम) मुख्य महाप्रबंधक जमुना प्रसाद जी ने अपना रथ भेज दिया हमारे लाने। हम उनसे मिलने चल पड़े। कई महीनों के पश्चात आमने-सामने की मुलाकातों ने कई यादें ताजा कर दी। एक घंटे के पश्चात कार्यशाला प्रारंभ होने वाली थी। जमुना प्रसाद जी स्वयं हमें होटल तक छोड़ कर गए। उनकी सहृदयता के हम आभारी हैं।

तभी दीपक (डी पी ओ) रेल्वे जबलपुर का भी फ़ोन आ गया कि आगामी शाम उनके घर पर ही रहना है। मैने अगले दिन दीपक के घर पहुंचने का वादा किया। हैदराबादी विजय सतपती भी पहुंच चुके थे। फ़िर धीरे धीरे सभी आ गए। कार्यशाला प्रारंभ हूई। जिसकी अधिकारिक रपट मिस फ़िट पर लग चुकी है।  कार्यशाला की समाप्ति के पश्चात कमरा नम्बर 120 में लाल और बवाल सहित कुछ मित्रों के साथ हमने लाल की गजल और बवाल की गायकी का रसपान किया। नि:संदेह बवाल काफ़ी अच्छा गाते हैं, हारमोनियम पहले से ही तैयार था। बस अब सुरों की महफ़िल जम गयी। अवधिया जी को गुजरा जमाना याद आ गया, आईना जो देखे थे। उन्होने इतने पुराने गीतों की फ़रमाईश कर दी कि जो हम बरसों से भूल बैठे थे। लेकिन बवाल साहब के भी क्या कहने उन्होने निराश नहीं किया और अवधिया जी को वह गीत सुना ही दिया। मैं तो उसके बोल भी भूल गया हूँ।

कार्य शाला में अविनाश जी और खुशदीप भाई भी फ़ोन के माध्यम से उपस्थित थे,विजय सतपती भी पुराने गीत अच्छे से गुनगुना लेते हैं। कुछ गीतों की याद ये भी करते रहे। रात 2 बजे तक शमा जलते रही और बवाल होते रहा। लाल भी मजे से सुनते रहे। हम इनका रचना पाठ सुनने से वंचित रह गए। जब ये रायपुर पहुंचेगे तो छोड़ेंगे नहीं सुन कर ही मानेंगे। रात महेन्द्र मिसिर जी ने बता ही दिया था कि सुबह धुंवाधार जल प्रपात एवं भेड़ाघाट जाना है एवं चेताया भी था कि सुबह 9 बजे तैयार हो जाना है। अब सभी ने गले लग कर विदा ली और हम भी निद्रा रानी के आगोश में चले गए।

जारी है............

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