रविवार, 19 जून 2011

भेड़ाघाट और धुंवाधार पर पनिहारिन से भेंट

कालबेल बजने से सुबह हूई और खटिया की चाय पहुंच गई। समय देखा तो आठ बज रहे थे। मिसिर जी याद आ गए कि जल्दी तैयार होना है। गुरुदेव खुमारी में थे,लेकिन भेड़ाघाट और धुंवाधार दर्शन के लिए तैयार होना ही था। जो प्राकृतिक सौंदर्य किताबों में पढा और चित्रों में देखा उसे प्रत्यक्ष देखने का उत्साह था। हम फ़टाफ़ट तैयार हो गए। मेरा नाश्ता करने का मन नहीं था। सिर्फ़ गोरस लिया और अवधिया जी ने नाश्ता किया विजय सतपती जी के साथ। नाश्ता करते करते मिसिर जी का फ़ोन आ गया कि वे पहुंच रहे हैं। गिरीश दादा को लेकर आते हैं। लेकिन दुश्मनो की तबियत नासाज हो गयी, गिरीश दादा को बुखार आ गया। रात ही कहा था कुछ ले लीजिए, स्वास्थ्य ठीक रहेगा। लेकिन बात न मानने की सजा भुगतनी पड़ती है। लग गयी न सर्दी,यही होता है बुजुर्गों की बात न मानने का नतीजा। ये आज कल के लड़के समझते कहां हैं किसी को?

सो मिसिर जी पहुंच गए लेकिन बवाल साहब के इंतजार में बवाल होता रहा। एक मुजरा याद आ रहा था " बड़ी देर से दर पे आखें लगी थी, हुजुर आते-आते बहुत देर कर दी"। इंतजार की घड़ियाँ खत्म हुई बवाल साहब आ गए। जबलपुरिया पान का आनंद दुकानदार के अंदाज से कई गुना बढ गया। उसने पान बना कर अपने हाथों से खिलाया। मान गए भाई मनुहार का अंदाज गजबै ही था। ऐसा कहीं देखा नहीं। मौसम सर्द हो चुका था हमने भी कंधे पर सफ़ेद कमरी डाल ली, कहीं ठंड न लग जाए। चल पड़े धुंवाधार की ओर। रास्ते में मिसिर जी की शायरी की चर्चा हुई। देश में एक से एक धांसु शायर हुए लेकिन फ़ाड़ु शायर सिर्फ़ मिसिर जी ही निकले। इनके एक एक शेर में बब्बर शेर सी ताकत होती है और दार्जलिंग जी चाय जैसी खुश्बु के साथ ताजगी। एक बानगी देखिए -- मेरे प्यार को तू झूठी तोहमत न लगा, मेरे जैसा यार तुझे जन्नत में न मिलेगा. आगे देखिए -- जब जर्द पत्ते खूब हवा देने लगे है ,जीने की दुआ..... दुश्मन देने लगे है, गम हद से गुजर कर आने लगे है, उदासी से मंजिल का पता देने लगे है. बस युं ही हंसी के ठहाके लगते रहे और कारवां बढता रहा।

पहुच गए धुंवाधार, दूर से ही उड़न खटोला दिखाई देने लगा। उड़न खटोले पर ही पार चलते हैं धुंवाधार के। हवा में लटक कर प्रकृति का नजारा देखेगें। जो कहीं नहीं देखा वो यहां हुआ, लघु शंका पर भी एक रुपए का टैक्स है। अगर रेजगारी नहीं है तो पेट पकड़े खड़े रहिए। उड़न खटोले की आने और जाने की टिकिट प्रति व्यक्ति 60 रुपए है। मिसिर जी ने टिकिट लिया और हम बैठे उड़न खटोले पर। विजय सतपती, अवधिया जी, हम, मिसिर जी, बवाल साहब उड़ लिए। उड़न खटोले से धुवांधार की  फ़ोटो ली गयी। पार उतरे जाकर, धुंवाधार के नजदीक पहुंचे, लेकिन बरगी डैम में पानी रोक दिए जाने के कारण धुंध नहीं बन रही थी। पर्यट्कों की नासमझी के कारण इस स्थान को काफ़ी नुकसान पहुंचा है। झरने के पास से ही मार्बल खोदा जा रहा है जिससे झरने के प्राकृतिक स्वरुप को नुकसान पहुंच रहा है।पानी की तेज धार ने चट्टानों को छेद कर शानदार कलाकृतियों का निर्माण किया है। यहां  आकर पता चलता है कि प्रकृति से बड़ा शिल्पकार कोई नहीं।

लौट चले अब भेड़ा घाट की ओर तभी बवाल साहब को कूंए पर पानी भरती कुछ पनिहारिने नजर आई और उन्होने ड्रायवर को गाड़ी वापस मोड़ने का हुक्म दिया। बहुत ही मनोरम दृश्य था। एक  पनिहारिन पनघट से सिर पर दोघड़ रखे आगे आ रही थी।  जब से नलके लग गए गांव में तब से ही पनघट की  रौनक खतम हो गयी। पता नहीं इसी पनघट ने कितनों को कवि शायर बनाया। कितने कवि यहां से उर्जा पाते थे। गांव की गोरी और पनघट का सीधा संबंध है। लेकिन नलकों ने पनघट को बर्बाद कर दिया। अब तो कूंए की मुंडेर पर कौआ भी नहीं बैठता। पनघट पर पहुंचते ही बवाल साहब ने “माटी की गागरिया” नामक कविता सुनाई। सही मौके पर सही चोट। फ़िर क्या कहने थे। शब्द शब्द अंतरमन तक उतर गए। हम अंतर में ही तैरते रहे।

ये कंकाल मन के साथ जुड़ा है और मन यार के साथ जुड़ा है। यार और मन का मिलन हो गया। कंकाल कहीं पीछे छूट गया। बुराईयों की जड़ कंकाल में है, मन के साथ बुराईयां भी चली आती है कंकाल की, लेकिन यार की चलनी में सब छन जाता है।कूड़ा ठिकाने लग जाता है, निर्मल मन ही वहां तक पहुंच पाता है। तभी यार से मिलन हो पाता है। बस आनंद ही आनंद पनघट से गागर में भर कर मैं चल पड़ा। कब पंचवटी आई पता ही नहीं चला। भेड़ाघाट पहुंच कर नर्मदा जी के दर्शन हुए। विशाल जल राशि नर्मदा का बहता हुआ पानी, बस एक ही आवाज निकली नर्मदे हर, नर्मदे हर।

बवाल भाई ने नाव तय की 400 रुपए में। मिसिर जी को कल से बुखार था। बवाल भाई दिल पर हाथ रखे बैठे थे, दिल की बीमारी जो है, दिल लगा बैठे हैं उस यार से। बस रुहानी अंदाज में ही गाते हैं। हमारे कहने पर चल पड़े भेड़ाघाट में नर्मदा जी की सैर में। सैर नहीं, मां नर्मदा की गोद में किलोल करने। नाव चलते जाती है, संगमरमर का अद्भुत सौंदर्य सामने आता है, मल्लाह कहता जाता है और हम सुनते जाते हैं। एक जगह पहुंच कर बोला- “यह मगरमच्छ की खोह है। एक फ़ैमिली रहती है, हम दो हमारे दो, दो बड़े दो बच्चे, देखना है किसी को? तो एक मित्र ने कहा देखना है। तो वह बोला – “ एक को फ़ेंक दो बाकी को दिख जाएगा। हा हा हा” कितना उम्दा तरीका बताया मगरमच्छ देखने का।

 
एक जोड़ी चप्पु चल रहे हैं नाव आगे बढती जा रही है। मैं सोचता हूं कि अगर किनारे बैठा रहता तो इस अद्भूत मरमरी सौंदर्य के दर्शन नहीं कर पाता। ईश्वर ने आंखें सौंदर्य देखने के लिए दी हैं और इसे देखने के लिए गहरे ही उतरना पड़ता है। एक स्थान ऐसा आता है कि जहाँ पहुंचते ही लगता है कि अब यहीं रम लिया जाए। इस स्थान पर भगवान दत्तात्रेय की साधना स्थली एक खोह के रुप में है। यह वह स्थान हैं जहां पुण्यात्माओं ने साधना करके उपस्थान को पा लिया। नि: संदेह समाधि लग जाती होगी। अगर कोई जुता जुताया खेत हो तो उसमें भरपूर फ़सल होने की संभावना रहती है। रास्ते में एक भूल भूलैया के बाद हम बंदर कूदनी तक पहुंचते हैं। यहां पर दोनो पहाड़िया आपस में मिली हूई इतनी नजदीक है कि नर्मदा के आर पार बंदर कूदा करते थे। यहां वापस मुड़ गए, एक स्थान पर मोक्ष बिंदु है, जहां से लोग जान देने के लिए नर्मदा में छलांग लगा देते हैं। पुर्णिमा की चांदनी में संगमरमर की चमक वैसे भी 600 फ़िट पानी में कूदने के लिए मानव मन को आन्दोलित करती होगी है।

यहां पर कई फ़िल्मों की शु्टिंग भी हुई है, जिसमें “जिस देश में गंगा बहती है” बस अब एक गीत सुनने की इच्छा हुई, बवाल भाई ने गाया, “ मेरा नाम राजु घराना अनाम, बहती है नर्मदा जहाँ मेरा धाम।“ संगमरमरी वादियों ने भी सुर में सुर मिलाया। खूब मेला जमा माँ नर्मदा की गोद में। अद्भुत और बहुत ही अद्भुत इसके आगे आकर शब्द सामर्थ्य खो जाता है। बस अपलक निहारता रहा सौंदर्य को। प्रकृति ने संगमरमर पर कई तरह ही अद्भुत शिल्पकारी दिखाई है, कहीं कार, कहीं कमल, कही तपस्यारत योगी, कहीं भालु, कहीं ब्रह्मा विष्णु महेश दिखाई देते हैं। आप जो भी ढुंढना चाहे मिल जाएगा। भाई बवाल के गीत वादियों में गुंज रहे हैं साथ ही मेरे कानों में भी। वापसी पर खाने का समय हो चुका था।

सुबह मैने गोरस ही लिया था इसलिए पेट में चूहे कूदने लगे, इसलिए हम गक्कड़ भर्ता खाने ग्वारी घाट पर चल पड़े, बवाल साहब साथ थे इसलिए लाल साहेब का फ़ोन नहीं आया। ग्वारी घाट में अग्रवाल होटल में जमकर गक्कड़ भर्ता खाए, भूख भी जोरों की लगी थी। कलाकंद भी लिया। भर्ता की सौंधी सौंधी खुश्बु अभी तक साथ है। यहां से होटल सुर्या आ गए, गक्कड़ों ने असर दिखाना शुरु किया, आलस छाने लगा। मिसिर का फ़ोन आया कि वे कैमरा कहीं भूल आए हैं। हम तो उनकी फ़ोटुओं के भरोसे ही थे। हमने ग्वारी घाट होटल में भूल आने का कयास लगाया। जो कि सही था, लेकिन लगता है होटल वाले ने दबा दिया। मिसिर जी का नुकसान हो गया। मिसिर जी कैमरा ढूंढते रहे।
5 बजे दीपक की गाड़ी आ गयी, अवधिया जी बाटलियाँ खाने की जुगत में लग गये।
हम दीपक के साथ 1904 में स्थापित गन कैरिज फ़ैक्टरी देखने चले गए। पास में ही हनुमान जी का मंदिर है विशाल प्रांगण में। महाबली के दर्शन किए, इनके बिना तो हमारा काम ही नहीं चलता। एक अर्जी लगाते ही अच्छे-अच्छों को सुधार देते हैं। यहां से दन्डवत कर, स्टेशन चौराहे पर सांई मंदिर में गए। इस मंदिर को एक जोसेफ़ एन्थोनी नामक इसाई ने बनवाया है उसका नाम पत्थर पर खुदा है। यह देखना अच्छा लगा। हमारी ट्रेन रायपुर के लिए साढे नौ बजे थी। भोजन के पश्चात दीपक ने स्टेशन छोड़ दिया, वहां अवधिया जी मिल गए। ट्रेन लेट आई। ठंड भी बढ गयी थी। टीचर्स की गर्मी भी काम नहीं आ रही थी। कांगड़ी होती तो कुछ ठंड का मुकाबला भी करती। ट्रेन चल पड़ी अंधेरे को चीरते हुए गंतव्य की ओर…………सलाम नमस्ते।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. कई बार ग्वारी घाट गया पर गक्कड़ भर्ता कभी नही खा पाया अब पक्का याद रहेगा ।

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  2. जबलपुर के भेड़ाघाट और धुवांधार पर यात्रा वर्णन प्रभावित कर गया. नर्मदा के सौन्दर्य का आपने इतना सजीव चित्रण किया कि मन कर रहा अभी हो आऊँ आपके जबलपुर. काश ! देख पाता.

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  3. भाई, किताब आयेगी तो दीजियेगा, तभी निपटा पाउंगा !!

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