सोमवार, 23 अगस्त 2010

चल पड़े गोहाटी की ओर-----यात्रा 6

हम हावड़ा पहुंच चुके थे, हमारे साथी काली घाट जाना चाहते थे लेकिन मेरा मन नहीं था। काफ़ी थकान महसूस हो रही थी। शाम को 4/30 पर हमारी ट्रेन गोहाटी जाने लिए थी। मैने देवी भाई को बहुत मनाया कि रुक जाओ लेकिन वे भी नहीं रुके, ये सब काली घाट चले गए, मैं रेल्वे की कैंटीन में बैठ गया। सोचा कि एकाध नींद की झपकी ले ली जाए, बाहर मुसलाधार वर्षा हो रही थी। खाना खाने के काफ़ी देर बाद मित्र लोग 4 बजे हावड़ा पहुंचे हमने जल्दी से रुम चेक ऑउट किया और स्टेशन पर सरायघाट एक्सप्रेस पकड़ने के लिए पहुंच गए। अब हमें गोहाटी जाना था। ट्रेन आने पर हमने अपनी-अपनी सीट संभाली और चल पड़े गोहाटी की ओर।

इस रास्ते में सबसे पहले जाने पहचाने नाम का स्टेशन बोलपुर मिला, जिसको सोमनाथ चटर्जी के कारण जाना जाता है, यह बरसों से उनका संसदीय क्षेत्र रहा है। इस इलाके में चाय बगान भी है। यहां 36 गढ और उड़ीसा से बरसों पूर्व काम की तलाश में आने वाले लोग भी रहते हैं। उन्हे यहां के लोग आदिवासी कह के सम्बोधित करते हैं। लेकिन आदिवासियों की सूची में उनका नाम नहीं है। यहां के काफ़ी लोग मुझे दिल्ली में जार्ज फ़र्नांडीज के यहां मिले थे, मैं उनकी इस समस्या से वहीं पर रुबरु हुआ था। यहां के आदिवासियों के विषय में मैं पूर्व से ही जानता था।

अगले स्टेशन पर जब ट्रेन पहुंची तो यह भी जाना पहचाना लगा। एक समय में यह स्टेशन अखबारों की सूर्खियाँ बना रहता है, इसका नाम है कोकराझार। यह उल्फ़ा के हमलों के कारण हमेशा चर्चा में बना रहता था। अगले स्टेशन मालदा पहुंचते तक हमें जोर की भूख लग चुकी थी। घर का बना सूखा खाना भी खत्म हो चुका था, इसलिए बाहर के खाने की ओर रुख करना पड़ा। मालदा स्टेशन पर पहुंच कर खाना ढुंढा तो वहां मैदा की रोटियाँ बनी हुई थी और आलु का साग। चावल भी नहीं था। मजबूरी में मैदा की रोटी खानी पड़ी, बड़ी मुस्किल से दो रोटियाँ खाई, यहां रसगुल्ला सस्ता मिल रहा था। एक रुपए में एक रसगुल्ला। मैने पांच रसगुल्ले खाए मनाही होते हुए भी। भूख जो शांत करनी थी। बाकी साथियों ने भी रसगुल्ले खाए। न्यु जलपाई गुड़ी आने से पहले हम लोग खर्राटे भरने लगे।

उत्तर-पूर्व में सुबह जल्दी होती है, एटानगर से जब मेरे मित्र आचार्य तेजनारायण आर्य मुझे फ़ोन करते थे तो यहां सुबह का 4 बजे रहता था, हमारे यहां सुबह 5-6 बजे होती है जबकि अरुणाचल में सुबह 4 बजे ही हो जाती है। इस हिसाब से यहां 4/30 के आस पास दिन निकल आया था। हम जाग चुके थे। लेकिन कुछ कुम्भकर्ण अभी भी सोए हुए थे। मैने जाग कर प्रकृति का नजारा लिया। अद्भुत मनोरम दृश्य था। बरसाती सुबह थी, नदी नाले भरे हुए थे, चारों तरफ़ हरियाली थी, पहाड़ों पर बादल चक्कर काट रहे थे। सूरज कि किरणे चोटियों पर पड़ रही थी। कभी सूरज बादलों में छुप जाता था और छांया हो जाती थी। पहाड़ों की तराई में अंधेरा हो जाता था। खेतों में किसान पहुंच चुके थे। हल चल रहा था। हल में बैलों के साथ भैंसे की जुताई भी होती है। बहुत ही मनमोहक वातावरण था।

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7 टिप्‍पणियां:

  1. इत्मीनान से और हौले हौले यात्रा चल रही है ,कलकतिया रसगुल्लों की याद से मुंह में पानी आ जाता है !

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  2. बोलपुर , कोकराझार से लेकर मालदा और एटानगर तक का परिचय देते हुए बढिया यात्रा विवरण !!

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  3. कोकराझार....... अच्छा याद दिला दिया.. आकाशवाणी के समाचारों में सुनते थे इस जगह का नाम

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  4. रक्षाबन्धन के पावन पर्व की हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ

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  5. रक्षाबन्धन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.
    पोस्ट पढती हूं अभी दोबारा आ के.

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  6. हां, इसी तरह आराम आराम से मजा लीजिये और हमें भी दीजिये।

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