शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

चले बाबा की नगरिया-हम पहुंच गए कलकत्ता--यात्रा 2

यात्रा प्रारंभ से पढें---ट्रेन आ चुकी थी, हमने अपनी-अपनी सीटें संभाल ली, देवी भैया इटली लेकर आए थे। बैठते ही सब की इच्छा से उनकी इटली पर हाथ साफ़ किया। क्योंकि इटली को ज्यादा देर रखना ठीक नहीं था। खराब हो सकती थी,आपस में हंसी मजाक चलती रही। दे्वी भैया से पू्छा गया कि कुछ लेने का इरादा है क्या? अभी तो सावन नहीं लगा है। थोड़ी देर में वह तैयार हुए,कुछ सज्जनों ने मना कर दिया, देवी भैया और मैने मन बना लिया था, आगे रायगढ़ आने वाला था। मैने विजय भाई साहब को फ़ोन करके फ़रमाईश बता दी। वे सब इंतजाम करके स्टेशन पहुंच गए मिनरल वाटर की बोतल में।

पहले मैने देवी भैया को दिया, तो उन्होने पहले श्रध्दा से बोतल को सिर में लगा कर प्रणाम किया, सब सवारियां उनकी हरकत को देख रही थी, लोग सोच रहे थे कि ये पानी को प्रणाम करके क्यों पी रहा है। मैं भी हंस रहा था कि जिन मंगाने का कोई मतलब ही नहीं निकला, इसने सारी पोल तो खोल ही दी। सभी मित्र उनकी इस भोली हरकत पर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। आधी बोतल खत्म करने के बाद उन्होने मेरी ओर बढाई, मैने उसे कम्पलीट कर दिया। अब सारी सवारियों में हम दोनो पहचाने गए। अब खा पीकर अपनी-अपनी सीटें सीधी कर ली। उड़ीसा में प्रवेश कर रहे थे। इसके बाद बिहार और बंगाल आने वाला था।

एक बात और बताता चलुं, जो कि मैने इतने सफ़र में महसूस की। मुझे सफ़र में विभिन्न प्रातों , भाषाओ और संस्कृतियों के लोग मिले। सबसे मेरी बातचीत होती है, और सफ़र के साथी होने के कारण कभी किसी सहयोग की आवश्यकता पड़ी तो उन्होने सहयोग भी किया है। लेकिन बंगाली लोग इस कसौटी पर खरे नहीं उतरे। वे सफ़र में आपका कोई सहयोग नहीं करेंगे, ये मान कर चलिए, क्योंकि मैने कई बार आजमा कर देख लिया है। आपको बैठने के लिए सीट नहीं देगें, भले ही पूरी सीट खाली पड़ी हो। बंगाली में बात-चीत शुरु कर देंगे जिससे आपकी समझ में नहीं आए, अकेले रहे तो बिना बोले ही 1000-2000किलो मीटर का सफ़र तय कर लेंगे। मेरा तो यही अनुभव रहा है,हो सकता है किसी का अनुभव अच्छा रहा हो।

सूर्योदय हुआ तो हम खड़गपुर के पास पहुंच चुके थे। हम जितना पूर्व की तरफ़ जाएगें सूर्योदय जल्दी ही होगा। चारों तरफ़ बरसात का पानी खेतों में भरा हुआ था। हरियाली ही हरियाली के दर्शन हो रहे थे। हम हावड़ा पहुंचने वाले थे। वैसे हमारा ट्रेन को हावड़ा सुबह 6-7 बजे पहुंच जाना था। लेकिन विलंब होने के कारण 9 बजे हावड़ा स्टेशन पहुंचे। हावड़ा में वर्षा हो रही थी। स्टेशन के सामने प्रसिद्ध हावड़ा ब्रिज दिखाई दे रहा था। बड़ा अद्भुत दृश्य था। हावड़ा ब्रिज सामने ही था।

 अब यहां हमें रुकना था। सोचा कि आगे कि यात्रा करनी है इसलिए स्टेशन में ही रिटायरिंग रूम ले लिया जाए, रिटायरिंग रुम 8 आदमियों के लिए तो होना चाहिए। सभी को एक साथ ही रुकना है।  हमने रिटायरिंग रुम ले लिया और नहा धोकर एक टैक्सी 1800 रुपए में किराए की। स्टेशन के बाहर निकलते ही टैक्सी वाले पीछे पड़ गए थे। एक टाटा सूमो वाले से मामला पट ही गया। 10/30 बजे हम गंगा सागर चल पड़े। कलकत्ता बहुत पूराना शहर है बहुत भीड़ भरा है, हमने ट्राम देखी जो शहर के बीचों बीच चल रही थी, रेल की पटरियों पर चलती हुई बस जैसी लग रही थी। आगे पढें
ललित शर्मा
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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढिया यात्रा वृतांत .. आप सफर में हर क्षेत्र के लोगो से मिल चुके हैं .. यदि बंगाल के लोगों की यह प्रवृत्ति हो .. तो उन्‍हें इसपर गंभीरता से सोंचना चाहिए .. अगली कडी की प्रतीक्षा है !!

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  2. @ उड़ीसा में प्रवेश कर रहे थे। इसके बाद बिहार और बंगाल आने वाला था।
    उडीसा में प्रवेश कर रहे हैं। बिहार कहां से आने वाला है? कब की बात है भाई? दस साल से पुरानी है क्या?
    @ आपको बैठने के लिए सीट नहीं देगें, भले ही पूरी सीट खाली पड़ी हो। बंगाली में बात-चीत शुरु कर देंगे जिससे आपकी समझ में नहीं आए
    बिल्कुल सही कह रहे हो जी। अपने यहां से तो एक ट्रेन गुजरात की निकलती है। गुजराती भी ऐसा ही करते हैं।
    इस मामले में राजस्थानी बढिया लगे। ले भाई, हम बैठे हैं, तू भी बैठ ले।

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  3. मूंछ वाले बाउजी,
    नमस्ते!
    ई ट्रेन तोहार.... पंजाब में आऊगी के नाहीं?
    भोले बाबा का परसाद साथ लेके चले हैं!

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  4. बढिया यात्रा वृ्तान्त शुभकामनायें

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  5. साइकिल को ट्राम ओवरटेक करते देखा कि नहीं?

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