सोमवार, 2 अगस्त 2010

चलिए बाबा की नगरिया-पहला पड़ाव कलकत्ता---यात्रा1

सावन का महीना हिन्दू धर्म में बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस पूरे माह को भोले बाबा के नाम से अर्पित किया गया है। जगह-जगह कांवर यात्राएं चलती हैं। लोग नदियों से जल लेकर भोले बाबा को चढाते हैं और अपनी मनौती मानते हैं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध यात्रा पर हम चलते हैं सुल्तानगंज से बैजनाथ धाम(देवघर) तक। हम सब मित्र रायपुर से प्रतिवर्ष सावन के महीने में यात्रा करते हैं। बड़ा मजा आता है, एक रुट निर्धारित कर उसकी सर्कुलर टिकिट बनाई जाती है, फ़िर चल पड़ते हैं सब यात्रा में। इस वर्ष 11 जुलाई को हमारी यात्रा निर्धारित हुई। यात्रा के संयोजन का काम उमाशंकर अग्रवाल याने युएसए बखूबी संभालते हैं।यात्रा मार्ग निर्धारित करने के साथ टिकिट तक की व्यवस्था करते हैं। बहुत जिम्मेदार और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। इनका साथ आनंददायी रहता है।

मुझे इन्होने फ़ोन से बताया कि-“महाराज टिकिट हो गयी है और अपने को 11 जुलाई को शाम 4 बजे मुंबई हावड़ा मेल से चलना है। हमने अपनी तैयारी की, एक गांधी झोला, दो जोड़ी केसरिया कुर्ता-हाफ़पैंट,एक अंगोछा, दवाईयाँ,नारियल तेल की शीशी(ये मैने क्यों रखी?इसका विषय में आगे चल कर बताऊंगा)खाने का सूखा सामान, और अपना पहचान पत्र (पहचान पत्र-अत्यावश्यक है-इसे कभी न भूलें,नही तो कम से कम वोटर आई डी कार्ड ही रख लें)बस जितना कम से कम सामान से गुजारा हो जाए,उतना रख लिया था।(वैसे हमारे साथ एक डॉक्टर भी है, इसलिए दवाई रखने की जरुरत कम ही थी, फ़िर भी अपने हिसाब रख ही लिया।) क्योंकि कभी भी जरुरत पड़ सकती है।

जब मैं रेल्वे स्टेशन पहुंचा तो डॉक्टर श्रीधर राव, उमाशंकर अग्रवाल, निन्नी महाराज, देवी शंकर अय्यर, बबलु भाई, दिनेश मिश्रा, कमलकांत, रेल्वे स्टेशन पर मिले। गर्मजोशी से राम राम हूई। एक बंदे का और इंतजार था, रवि श्रीवास  का, लेकिन ये महाशय टिकिट बनने के बाद भी नहीं आए। अब हम बैजनाथ धाम जाने  के लिए तैयार थे। जहां सुल्तान गंज से बैजनाथ मंदिर तक 115 किलो मीटर पैदल चल कर जाना पड़ता है। मैं इस यात्रा के लिए उत्साहित था तथा इस बार संकल्प कर लिया था कि पैदल चल कर ही जाऊंगा। मैने 15 दिनों तक लगातार नगें पैर पैदल चल कर भी देख लिया था। मैं एक घंटे में 10 किलोमीटर नान स्टाप चल लेता था। इसका परीक्षण भी अच्छी तरह से कर लिया।

पहले भी हम लोग साथ आते थे, लेकिन ये सभी पहले ही मेरा मनोबल तोड़ देते थे। रास्ता बहुत खराब है, नहीं चल सकोगे यार, पैर में छाले हो जाते हैं, फ़िर तुम्हे कौन संभालेगा। यहां तो सब अपना-अपना देखते हैं। एक बार यात्रा शुरु होने के बाद कहीं बिछड़ गए तो मुस्किल हो जाएगी, नयी जगह है लूट-पाट भी हो जाती है कावंरियों के साथ, फ़लाने को पिछले साल कलकतिया के पास लूट लिया था,एक काम करना तुम बस से निकल जाना जल लेकर 3दिन में हम मिल लेंगे तुमसे देवघर में,इत्यादि नाना प्रकार की बातें करते थे। बस यह सुनकर हिम्मत जवाब दे जाती थी। लेकिन इस बार मैने इनकी बातों पर ध्यान ही नहीं दि्या।

यात्रा प्रारंभ होने से पहले एक बात बताता चलुं कि कुछ नियमों का पालन करना है। आपको पूरी यात्रा नंगे पैर करनी है, कांवर को जमीन पर नहीं रखना है, स्नान के समय तेल और साबुन का उपयोग नहीं करना है। कावंर को पीठ की तरफ़ से घुमाकर कंधा नहीं बदलना है, खाने,लघु शंका या शौचादि के बाद कपड़े सहित स्नान करना है, कुत्ते से बचकर चलना है, पीछे मुड़कर नहीं देखना है, किसी कावरिएं को ओवरटेक नहीं करना है, अगर करना है तो उसे संबोधित कर दो (जैसे-साईड बम बोलो) जिससे वह अपने-आप रास्ता दे दे। बोल बम का उद्घोष करते चलो, अपने साथी की आहट लेनी है तो उसका नाम लेकर बोल बम बोलो, अगर वह आपके पीछे होगा तो आपका नाम लेकर जवाब दे देगा। जिससे आपको पता चल जाएगा कि वह साथ ही है। जारी है-आगे पढें........
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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिलचस्प और कठिन यात्रा है. जारी रहिये, आनन्द आ रहा है.

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  2. धार्मिक श्रधा को सम्मान देती उम्दा पोस्ट ...

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  3. 'कुछ नियमों का पालन करना है। आपको पूरी यात्रा नंगे पैर करनी है, कांवर को जमीन पर नहीं रखना है, स्नान के समय तेल और साबुन का उपयोग नहीं करना है। कावंर को पीठ की तरफ़ से घुमाकर कंधा नहीं बदलना है, खाने,लघु शंका या शौचादि के बाद कपड़े सहित स्नान करना है, कुत्ते से बचकर चलना है, पीछे मुड़कर नहीं देखना है, किसी कावरिएं को ओवरटेक नहीं करना है, अगर करना है तो उसे संबोधित कर दो (जैसे-साईड बम बोलो) जिससे वह अपने-आप रास्ता दे दे। बोल बम का उद्घोष करते चलो, अपने साथी की आहट लेनी है तो उसका नाम लेकर बोल बम बोलो, अगर वह आपके पीछे होगा तो आपका नाम लेकर जवाब दे देगा। जिससे आपको पता चल जाएगा कि वह साथ ही है।'
    - कांवरिये देखे जरूर हैं, लेकिन उनके बारे में यह सब मालूम नहीं था.

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  4. बाऊ जी नमस्ते!
    पिताजी जाया करते थे कांवर लेने, लौंग के जोड़े और जल पर!
    बुरा ना मानियेगा, आज ये पवित्र यात्रा अराजक तत्वों का समागम बन गया है!
    बम बम बोल बम!

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  5. हम भी पांच बार कांवड ला चुके हैं। लेकिन अपने यहां नंगे पैर चलने की बाध्यता नहीं है। चाहे नंगे पैर चलो, या चप्पल पहनो, या जूते, कोई बात नहीं।

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